मेरा आठवाँ प्रकाशन / MY Seventh PUBLICATIONS

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शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

वार


 वार

तुम नजरों ही से बोला करो,
तुम्हारे जुबाँ की फितरत,
कुछ और होती है,
नजरों से बयाँ करने की अदा,
जुबाँ में नहीं मिलती.

जुबाँ से किया हुआ वार,
अश्लीलता की बौछारें लिए आता है,
और नजरों की कटारी का मारा वार भी,
तुम्हारी अदाओं पर मर जाता है.

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

बिछना - बिछाना


बिछना - बिछाना.

जमाना बदल रहा है.
काफी बदल गया है.
लेकिन बिछने की आदत अभी कायम है.
पहले आँखें बिछाते थे,
नजरें बिछाते थे,
फिर कालीने बिछने लगीं ,
लोगों को फख्र महसूस होता था,
लोगों को हर्ष महसूस होता था,
जब किसी प्रतिभावान स्त्री- पुरुष के समक्ष,
साष्टांग प्रणाम करने,
बिछ जाने को,
कतार लगती थी,

अब भी लोगों को फख्र महसूस होता है,
अब भी लोगों को हर्ष महसूस होता है,
लेकिन अब नजारा और है,

कि अब हम न ही बिस्तर बिछाते हैं,
न ही हम कालीनें बिछाते हैं,
न ही नजरे इनायत बिछाई जाती है,
हम बिछाने में विश्वास नहीं करते ....

हम तो खुद ही बिछ जाते हैं.


एम.आर.अयंगर.
09425279174.

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

हिंदी- राष्ट्रभाषा (national Language) or/या राजभाषा (Official language)


रविवार, 9 अक्टूबर 2011

लाल बहादुर शास्त्री जी.


03102011
लाल ( बहादुर शास्त्री )

गीता को अपनाना, फिरसे
जिसको तुमने सिखलाया,
किसानों औ जवानों का,
जहाँ किया था जयकारा,

इक आवाज के दम पर तेरे,
सारे देसवासियों ने, हफ्ते
तेरह भोजन स्वीकारा,
एक कम किया अन्न बचाने,
भूखा रहकर बेचारा.

“जय जवान – जय किसान”
नारा, आज भी दिल को छूले,
उसी जगह हम आज तुम्हारा,
जनम दिवस भी भूले.

ताशकंद में अगर न होती,
हावी तुम पर काल,
आज न होता भारत का ,
जैसा अब है हाल.
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2 अक्तूबर को इनका भी जन्म दिन था।।।
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एम.आर.अयंगर.

सोमवार, 26 सितंबर 2011

रंग बिरंगी


रंगबिरंगी सृष्टि

ब्रह्मा ने बीज सृष्टिके लाए थे छाँटकर,
पर मिल गए अंजाने में वे सारे एक संग,
बो तो दिए थे बीज सारे सोच-सोच कर,
देखें ये चमत्कार भी होगा किस तरह ?

कारण यही के चल पड़े हैं सुख-दुख भी संग-संग,
काँटे औ’ फूल लग गए हैं एक डाल पर,
छाया, बिना उजाला होती कभी नहीं,
अच्छे बुरे को देखते हैं संग-संग सभी.

नारी पुरुष हैं जान में सभी के, जान तू,
यह जिंदगी अजीब है इसको सँभाल तू,
सृष्टा के इस प्रयोग का तू ना विनाश कर,
भोग जिंदगी को हरेक श्वास पर.

विज्ञान है विनाश तो वरदान भी यही,
इंसान है शैतान तो भगवान भी यही,
है श्वास हवा से तो आँधी से तबाही,
लौ से है रोशनी तो लौ से ही राख भी.

जीवन मरण है चक्र इस अविरत जहान का,
जीने के बाद क्या पता नाम औ’ निशान का,
जो जी रहा है उसका कोई खैरियत नहीं,
कौन जाने अंत शब्द इस जुबान का.

भूख पेट के लिए सब कुछ है बिक रहा,
मिल जाएगी हर चीज जरा ढ़ूंढ़ लो मंडी,
इंसानियत कहीं तो कहीं ईमान की मंडी,
ये सृष्टि बन पडी है कितनी रंगबिरंगी.

ठठठठठठठठठठठठठठठठठठठठठठठठठठठठ

एम.आर.अयंगर. 09425279174