मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.

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शनिवार, 4 मार्च 2017

एहसान


एहसान

मेरे दोस्त,
तेरे बहुत एहसान हैं मुझ पर,
बस एक और एहसान करना,
कल सुबह मेरे घर आकर
मेरी लाश ले जाना,

बस एक रात और
अकेला छोड़ दो,
शाँति से मरने को भी
एकांत चाहिए ना.
कर देना फोन
उन देहदान वालों को ,
और उस अंगदान के मोहन को,
और बस फर्स्ट कम फर्स्ट सर्व,
जो पहले आएगा ले जाएगा.
यदि मोहन पहले आ जाए तो,
बची देह में जठराग्नि लगा देना,
कर देना खाक ए सुपुर्द,
और राख वह उड़ जाएगी हवा में,
चिंता मत करना.
यदि मिट्टीमें ही मिल गई
तो धन्य समझूँगा
थोड़ी और उर्वरक हो जाएगी
जो भी आस पास श्वास लेंगे
उन्हें कुछ समय के लिए ही सही
मेरी महक आएगी...
फिर सब सामान्य हो जाएगा.
हमेशा की तरह.
बस यह एहसान कर देना
एक और मेरे दोस्त.
खुदा हाफिज.
***

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

माली



माली

उस दिन एक चिड़िया
मेरे बगीचे में कोई बीज गिरा गई.
पता तो तब चला जब बाग में 
सिंचाई से वह अंकुरित हो उठा ।

नन्हीं कोंपलें कितनी
प्यारी लग रहीं थीं,
कैसे बखान करूँ शब्दों में।

इसे मेरी अन्यमनस्कता कहें,
या मेरा लाड़ - प्यार,
बाग की सिंचाई के कारण
अंकुर धीरे - धीरे बढ़ते हुए
पौधा बना, फिर पेड़
और अब महावृक्ष है ।

पहले इसे मैं कई दिनों तक
देख भी नहीं पाया था.
जब से आँख पड़ी तब से
कुछ दिन इसे खोजना पड़ता था।

कभी मिल जाती,
तो कभी दिखती ही नहीं थी.

पौध का रूप धरने के बाद तो
हर दिन सिंचाई में नजर आती थी.
रोज मुलाकात होती थी
एक दूसरे की खैर - खबर होती थी।

मेरी नजर जो शुरुआत में
जमीन में गड़ जाती थी,
उसे देखने के लिए
धीरे - धीरे ऊपर उठती गई,
और बराबरी पर आ गई थी।

उसके यौवन में
उसे देखने के लिए
नजर ऊपर उठानी पड़ती थी.
जब वह पूरे शबाब पर आई
तो गर्दन ही उठाना पड़ जाता था।

अब मुझे भी लगने लगा था
कि बीज से अंकुरित पौधा
मुझसे बड़ा हो चुका है।।

मैंने, झुकना स्वीकारा
पर यह क्या?
पेड़ ने तो
बाग को ही त्यागना चाहा।

पानी समय से न पड़ा तो नाराज
पहले पड़े तो गुस्सा
देर से मिले तो गुस्सा,
ज्यादा हो जाए तो गुस्सा,
कम पड़ जाए तो गुस्सा।

हर बार यही धमकी
कि मैं बाग छोड़ जाऊँगा।

किंकर्तव्यविमूढ़ मैं सोच रहा हूँ
कि क्या किया जाए,
एक माली अपने बाग के 
पेड़ को कैसे छोड़े।

सोचते ही आँखों में पानी की जगह खून दौड़ता है
कोई बताए कि बाग के पेड़ को माली कब छोड़ता है?

.........