मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.

मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल  मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.
मन दर्पण

मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

जीने का हक.

जीने का हक.

बर्फ जमी थी दिल में जो अब पिघल पिघल कर आती है,
तड़पते दिल में जगह न पाकर, वह नयनों से झरती है.
आंखें भी मजबूर है कितना, रोक न पाएँ झरने को,
रोते मन का राग यही है,  नयनों से भाषा कहने को.

दानव जो मानव में देखो, मानव को ही भून दिया
सुअर के पिल्ले भी प्यारे, इंसा का क्यों खून किया ?
जो इंसाँ, इंसाँ का ना हो, वह आखिर फिर किसका है ?
कहूँ दरिंदा इसे अगर मैं,  ऐतराज किस  किस का है ?

बॉस से सुनकर ऑफिस, में जो बीबी को डाँटा करता,
गर्ल फ्रेंड को ताने सुनकर, बहनों पर चाँटा धरता,
इससे भी ज्यादा बुझदिल हैं, नरकगामी ये आतंकी,
लेते हैं बच्चों की जान से, सेना का बदला, नरभक्षी.

कायरता की इससे बढकर, क्या उपमा हो सकती है,
निर्ममता की इससे बढ़कर, क्या घटना हो सकती है,
कहते हैं आतंकी हैं हम, सीने पर करते वार न क्यों ?
इस धरती पर जीने का हक, हम इनको दें, तो दें ही क्यों ?
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एम आर अयंगर.
23.12.14
पेशावर स्कुल पर आक्रमण पर प्रतिक्रिया.

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

हिंदी की वर्तनी के परिवर्तन

हिंदी की वर्तनी के परिवर्तन

(http://www.hindikunj.com/2014/12/the-spelling-of-hindi.html)
(5.12.2014 को हिंदी कुंज में प्रकाशित)



आज की हिंदी वर्णमाला निम्नानुसार है.


चित्र -1

इन वर्णमालाओं में अ,आ,ओ,औ,अं,अः,ख,छ,ण,ध,भ अक्षरों पर गौर कीजिए, आज इन्हें उसी तरह लिखा जाता है. पुरानी हिंदी की वर्णमाला कुछ भिन्न दिखाई देती है. थोड़ा बहुत फर्क तो ल,श,त्र में भी दिखता है. दो तरह से लिखने की रीत से भ्रांति होती है और कुछ वर्णों में जैसे - म व भ तथा घ व ध में शिरोरेखा के जुड़जाने से दुविधा होती है.

कुछेक वर्ण हिंदी में प्रयोग किए जा रहे हैं किंतु अधिकारिक तौर पर उन्हें वर्णमाला में शामिल नहीं किया गया है. कुछेक सुधारों की तरफ भी ध्यान देना होगा. पंचमाक्षर अनुस्वार नियम में वर्गेतर वर्णों के लिए अनुस्वार तय नहीं किया जाना संदेह का कारण बन पड़ा है. हिमांशु को कैसे सही लिखा जाए.. हिमाम्शु या हिमान्शु. सही की पहचान कैसे हो ?  वैसे ही श+=श्र हुआ और श+=शृ हुआ. अब प्रचलन में सिंगार के रुप शृंगार को श्रृंगार लिखा जाता है. सोचिए यह कितना उचित या अनुचित है.


पहले कभी हिंदी वर्णमाला कुछ इस तरह होती थी. (संदर्भ 5)




चित्र 2


साधारणतः भारतीय भाषाओं में अक्षर के मस्तक पर लगी स्वर की मात्राओं का उच्चारण अक्षर के बाद होता है. लेकिन अनुस्वार व रेफ इसमें अपवाद है. अनुस्वार जिस अक्षर के ऊपर लगता है उसके बाद ही उच्चरित होता है. वैसे भी वह अगले अक्षर के वर्ग का पंचमाक्षर (पञ्चमाक्षर) होता है. रेफ की तरह अनुस्वार भी पहले उच्चरित करने से अगले अक्षर पर लग सकता है जिससे अपवाद नहीं रहेगा. जैसे मयन्क को मयंक न लिख कर मयकं लिखा जाए और साधारण नियमानुसार अनुस्वार का उच्चारण क के पहले आए तो यह मयंक सा ही पढ़ा जाएगा. लेकिन अब यह अपवाद बनकर रह गया है. कुछ भारतीय भाषाओं (खासकर दक्षिणी भाषाओं में अनुस्वार को अक्षर के बाद ही लिखा जाता है वहाँ मस्तक पर अनुस्वार लगाने की प्रथा नहीं है. इसी कारण रेफ व अनुस्वार के प्रयोग में विद्यार्थी (खासकर दक्षिणी) गलतियाँ कर जाते हैं.   व्यंजन अक्षरों की मात्राएं जो अक्षरों का ही अंश होती हैं , उच्चारण की श्रेणी में ही लिखे जाते हैं. जहाँ दक्षिण भारतीय भाषाओँ में व्यंजन वर्ण अक्षरों के नीचे लिखे जाते हैं और बाद मे उच्चरित होते हैं .

प्रारंभ में देवनागरी लिपि में भी शिरोरेखा नहीं थी. किंतु अक्षरों के जुड़ने से उनके मस्तक, शिरोरेखा के रूप में उभरी (संदर्भ 6). हिंदी के कुछ और पुराने वर्ण चित्र 3 व चित्र 4 में देखिए.



चित्र 3



चित्र 4

इस चित्र 4 में लृ अक्षर व मात्रा पर भी गौर फरमाएँ. बड़ी ऋ पर भी गौर फरमाएँ. जो आज हिंदी वर्णमाला में लुप्त हो चुकी हैं.   

अब कुछ विवेचना करें.

जिस तरह –
क् = क्ष
त् =  त्र
ज् += ज्ञ   -  हैं

वैसे ही
द् +   =  द्य     (विद्यालय)
+ = क्त      (नुक्ता)
प् +   =   प्र      (प्रमाण)
+   =   श्र      (श्रम)  भी हैं.
इनको भी संयुक्ताक्षर के रूप में स्वीकार कर वर्णमाला में स्थान दे देना चाहिए. हिंदी के सरलीकरण के तहत कई जगहों से हलन्त का प्रयोग हटा लिया गया है. जैसे महान् को अब महान लिखा जाने लगा है. वैसे ही विसर्ग (:) का भी हाल है. दुःख को अब दुख ही लिखा जाता है और यह मान्य भी है. वैसे ही छः को छै भी लिखा जा रहा है
अब तक प्रस्तुत भिन्नताओं को एक जगह एकत्रित करने का प्रयास किया गया है जो नीचे प्रस्तुत है.
अब तक प्रस्तुत भिन्नताओं को एक जगह एकत्रित करने का प्रयास किया गया है जो नीचे प्रस्तुत है.

चित्र- 5

उर्दू का नुक्ता अभी भी पूर्णरूपेण हिंदी में नहीं समाया है. फिर भी कुछ लोग इसका प्रयोग कर रहे हैं. इन छोटे छोटे समाहितों से हमारी भाषा बहुत समृद्ध हो जाएगी. भाषाविदों से अनुरोध है कि वे इस तरफ ध्यान दें एवं विचारें.

अभी भी हिंदी में अपनाने के लिए कई बातें है. जैसे गुरुमुखी का द्वयत्व, मराठी का ळ, दक्षिण भारतीय भाषाओं में उपलब्ध ए व ऐ एवं ओ और औ के बीच के स्वर  (तेलुगु भाषा के ఐ, ఒ ఔ), ऍ का स्वर, इनमें से कुछ हैं. इन्हें अपनाने से बहुत तरह की ध्वनियों को हिंदी में भी लिखा जा सकेगा जिन्हें अभी हिंदी में लिखना उपलब्ध वर्णमाला से संभव नहीं हो पा रहा है

इंटरनेट के कुछ पोर्टलों में हिंदी अक्षरों में इन उच्चारणों को दर्शाया जा रहा है, किंतु किसी वर्णमाला में अब तक इनका समावेश नहीं है. नीचे की तालिका देखें. इसमें ए - ऐ व ओ - औ के बीच के उच्चारण के अक्षर दिखाए गए हैं, किंतु वर्णमाला में इनको दिखाया नहीं जाता.



चित्र 6


चित्र 7

इनके अलावा कम्प्यूटरों के आने से  लिप्यंतरण की सुविधा भी उपलब्ध हो गई है. अंग्रेजी वर्णमाला के प्रयोग से हिंदी लिखने की नीचे दिए गई सुविधा उपलब्ध है. (संदर्भ 2). इसके लिए आप ekalam.raftaar.in  देख सकते हैं.

लिप्यंतरण ( Transliteration)
मात्राएं
􀇔      
aa     i      ee     ii     u    uu  oo     e    ai     o     au      n      h     r
स्वर
 ई  उ  अं अः
a   aa   i   ee  ii   u   uu e  ai   o   au    n   h    r      r

व्यंजन
 ग   ङ  च   छ   ज  ट  ड  ढ
ka  kha ga gha nga  cha chha ja jha ya  ta tha da dha na
 थ  द  न  प  ब  भ  म  य  ल  श
ta  tha da dha na  pa pha ba bha ma ya  ra  la va  sha
 स  ह  ळ क्ष  त्र  ज्ञ  लृ  ॡ
sha sa  ha  xa ksha tra ga   L   LL  स्क्रीन में हलन्त (क्)बना है।

इस तालिका में देखा जा सकता है कि दक्षिण भारतीय भाषाओं के ए,ऐ व ओ, औ के उच्चारणों के बीच के अक्षर हिंदी वर्ण माला में अभी आए नहीं हैं. वैसे ही सिंधी वर्णमाला में का और कि के बीच दो वर्ण हैं जिनका स्वरूप हिंदी में अनुपलब्ध है. हिंदी के कम्प्यूटरी करण से एक खास लाभ यह हुआ है कि अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षरों के समन्वय में परिवर्तन किए बिना वही उच्चारण सभी भारतीय भाषाओं में लिखा जा सकता है. इससे आपसी भाषाई लिपि के फर्क उजागर हुए हैं. जिनसे सुधार या उन्नति संभव है.

संदर्भ 6 में कम्प्यूटर पर दी जाने वाली हिंदी की बोर्ड उपलब्ध है

चित्र 8

इस इनस्क्रिप्ट की बोर्ड में सभी भारतीय भाषाओं को टाईप करने की सुविधा है. इसकी खासियत है कि यह फोनेटिक है और आवाज के आधार पर टाईप किया जाता है. इससे दक्षिण भारतीय भाषाओं को भी टाईप किया जा सकता है.

इंटरनेट के कुछ पोर्टलों से हिंदी के पुराने व नए लिपियों की छाप लेने की कोशिश की गई है. मुख्यतः निम्न पोर्टलों से सामग्री का प्रयोग किया गया है. अतः मैं इनके लेखकों के प्रति अपना सहृदय आभार प्रकट करता हूँ.

एम रंगराज अयंगर.
08462021340

 आभार –

1.  मुक्त शिक्षाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय ( प्र पत्र 15 ) पृष्ठ 9 – वर्तनी और लिपि की मीनकीकरण डॉ. मीनाक्षी व्यास.
2. सर्च एंजिन रफ्तार http://www.raftaar.in/help.htm से ट्रान्सलिटेरेशन कैसे करें.
3.  Latest Hindi Alphabet from,.
4. लेखमिक विश्लेषण क्रमाँक 1 व 2, पृष्ठ 240,हिंदी भाषा की संरचना – द्वारा श्री भोलानाथ तिवारी.
5. http://www.omniglot.com/writing/devanagari.htm for old form of  Hindi letters
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बुधवार, 10 दिसंबर 2014

राजभाषा हिंदी के प्रचार प्रसार में कम्प्यूटर का योगदान

राजभाषा हिंदी के प्रचार प्रसार में कम्प्यूटर का योगदान
(http://www.hindikunj.com/2014/11/hindi-computer.html#.VG8b3tKUf6E)
(21 नवंबर 2014  को प्रकाशित)

राजभाषा (हिंदी) समाहित कम्प्यूटर, लोगों के स्वाभिमान को सवाँरने में काफी सहयोगी हुआ है. अपनी भाषा में काम करना एक अलग ही खुशी देता है.

राजभाषा वाले संगणक से हिंदी जानने वाले बहुत लोंगों  को उनके बहुत से सवालों का जवाब मिल गया. उनके लिए हिंदी में कंप्यूटर पर काम करना बहुत ही आसान हो गया. साथ ही बहुतों के बहुत सारे बहाने छूट गए. फिर शुरु करना पड़ेगा या टाईप करना सीखना पड़ेगा – सब धरे रह गए. हिंदी प्रेरको का नारा - आप शुरु तो कीजिए, सीख जाएंगे – सामने आ गया. सही नारा है, यदि आप हिंदी लिख पढ़ लेते हैं और कोशिश करने से परहेज नहीं करते, तो हिंदी टाईपिंग के लिए हाथ साफ करने में आपको एक सप्ताह और ज्यादा से ज्यादा एक पखवाड़ा लगेगा. अब रफ्तार की बात करेंगे, तो निर्भर करेगा कि आप कितना अनुभव प्राप्त कर पाते हैं. राजभाषा विभागों ने कई जरूरी वाक्याँशों व टिप्पणियों को संगणक में सँजो रखा है. कॉपी-पेस्ट समेत समस्त संगणक (कम्प्यूटर) तकनीक राजभाषा के साथ है.

राजभाषा के पैकेज आकृति, अक्षर, लीप कुछ ज्यादा चले. आप जिस भारतीय भाषा को लिख – पढ़ - बोल लेते हो, लीप-ऑफिस पेकेज में उसी में टाईप करो और फिर चुनकर किसी भारतीय भाषा में बदल लो. इस ध्वनि-आधारित पैकेज में भाषा बदलने पर उच्चारण नहीं, केवल लिपि बदलती है. जहाँ कुछ भी नहीं हो पा रहा था, वहाँ यह बहुत बड़ी सुविधा है ? एक ही पन्ने पर आप कई भाषाएँ लिख सकते हैं. लीप ऑफिस सबसे शक्तिशाली हिंदी पैकेज है. नीचे एक उदाहरण देखिए.

অনূপ কুমার বোললো - मैं picture  में  देखा  నాకు తేలుగు రాదు -  ਅਸਿ ਭਾਂਗਡਾ ਪਾ ਨਹੀੰ ਸਕਤੇ ਸੀਗੇ.

इस ऊपरी वाक्य में बंगला, हिंदी, अंग्रेजी, तेलुगु एवं पंजाबी भाषाएं लिखी गई हैं.

संगणक में राजभाषा लिखने के बहुत तरीके हैं. हिंदी की-बोर्ड से कतराने वाले फोनेटिक ट्रान्सलिटेरेशन अपनाएं. टाईप अंग्रेजी में और पटल पर देवनागरी लिपि - यह बहुत सुविधाजनक व सरल है. Ekalam.raftaar.in से आप आसानी से ट्राँसलिटेरेशन (लिप्यंतरण) की जानकारी पा सकते हैं.  IME Indic पैकेज में तो ड्रॉपड्राऊन मीनू झलक जाते हैं. आपको चयन भर करना है कि आपको कौन सा अक्षर या शब्द समुच्चय चाहिए. विस्तृत जानकारी के लिए नीचे के लिंक पर क्लिक करें.


यदि लिंक पढ़े नहीं जा रहे हों तो इस लिंक पर बहुत सारे लिंकमिल जाएँगे.


राजभाषा विकास परिषद के ब्लॉग पर भी इसकी सूचना है. पर लिंक यहाँ लगाने के लिए जो संदेश भेजा था, उसका अभी तक कोई जवाब नहीं मिला इसलिए नहीं लगा पा रहा हूँ.

समय समय पर हिंदी के पेकेज बदलते रहने की वजह से कुछ परेशानियाँ हुई. लेकिन साथ ही साथ कुछ ही समय में परेशानी को दूर करने के तरीके भी सामने आ गए. जरूरत ने नए - नए आविष्कारों को जन्म दिया. सबसे बड़ी परेशानी रही - पुराने फॉँट नए पेकेज में या तो चलते ही नहीं थे या फिर गलत - सलत पढ़े जाते थे. आज भी ऐसे पेकेज हैं जिसमें लिखने पर अक्षरों के पहले लगने वाली मात्राएं अक्षरों के बाद दिखती और छपती हैं. कुछ फाँट तो नए पेकेज में पढ़े ही नहीं जाते और वहाँ कुछ अजीब से चिन्ह (आस्की) नजराते हैं.

हाल ही में ekalam.Raftaar.in में फाँट बदलने की सुविधा आ गई है. इससे सारे पुराने फाँट की रचनाएं या रिकार्ड नए फाँट में बदले जा सकते हैं. इसमें कुछ सीमा तक सेवा निशुलक है - प्रतिदिन करीब हजार शब्दों का फाँट मुफ्त में बदला जा सकता है. उसके बाद खर्च करने से प्रतिदिन 5000 या उससे अधिक शब्दों के फाँट बदलने का भी प्रावधान है. ऐसी बहुत सी आवश्यक सुविधाओं ने हिंदी में काम करने को अत्यंत आसान बना दिया है. गूगल पर ऐसे और पोर्टल खोजे जा सकते हैं

एम एस ऑफिस के नए पैकेजों में हिंदी कंप्यूटरों के साथ आ रही है. कम्प्यूटर पर हिंदी (राजभाषा) के लिए यूनिकोड की मात्र एक ही लिपि मंगल पर सरकार की मोहर है. अभी यूनिकोड में हिंदी के बहुत कम फाँट हैं. हिंदी वालों को इस पर ध्यान देते हुए कुछ और फाँट विकसित करवाने चाहिए. कंप्यूटर के – इनस्किप्ट - की बोर्ड पर हिंदी आसानी से टाईप किया जा सकता है. वैसे पुराने टाईपराईटरों के की बोर्ड भी कहीं कहीं प्रयोग में लाए जाते हैं. जो लोग टाईपराईटर पर काम करते थे उनके लिए यह सुविधाजनक है. इनस्क्रिप्ट में की स्ट्रोक्स कम लगते हैं, भाषा बदलने के लिए केवल चुनाव कर लीजिए - लिपि बदलती रहेगी – स्ट्रोक्स वही रहेंगे, तो उच्चारण भी वही रहेगा. बहुत अच्छी स्पीड से काम होता है. एक ही मंगल फॉंट में टाईप किया जाए तो अलग-अलग कार्यालयों में एडिटिंग की जा सकेगी, फिर टाईप नहीं करना पड़ेगा.

लीप ऑफिस जैसे पेकेज से एक और फायदा यह हुआ कि भारत की एक भाषा में आने वाले शब्दों के उच्चारण को लिखने के लिए दूसरी भाषा में भी नए वर्ण आ गए. जैसे दक्षिण भारतीय भाषाओं में ए व ऐ ( तथा  और औ ) के बीच की ध्वनियों के लिए हिंदी में विकल्प आ गए हैं किंतु अब तक उन्हें वर्णमाला में जगह नहीं मिली है.

करीब सभी सामाजिक पोर्टलों पर सुविधा के कारण राजभाषा में बहुत कुछ हो रहा है और भी होगा. हिंदी के पोर्टल, ई-पत्रिकाएं, किताब और ब्लॉग्स खुले हैं. जो कुछ कभी अंग्रेजी में ही होता था, अब हिंदी में भी (साथ ही सभी भारतीय भाषाओं में) हो सकता है और हो भी रहा है. इन सबके बावजूद भी आज हिंदी में स्पेल-चेक व सॉर्टिंग की सुविधा नहीं है. इसकी कमी को पूरा करने के लिए शायद कुछ और वक्त लगेगा.

संगणकों में राजभाषा की सुविधा से बार बार की टाईपिंग बंद हो गई. केवल परिवर्तन मात्र फिर करने पड़ते हैं. संप्रेषण (मास कम्यूनिकेशंस) की बहुत बड़ी सुविधा उपलब्ध हो गई है, जिससे कम समय में काम और निर्णय हो पाते हैं. लोग एक ही मिसिल पर बिना कागजात भेजे काम कर पाते हैं. कागज की बचत होती है और पर्यावरण सुधरता है. पुराने सुरक्षित रिकार्ड तुरंत उपलब्ध हो जाते हैं और बार-बार प्रिंट किया जा सकता है. यहाँ तक कि इन संप्रेषण सुविधाओं के कारण मैं एक शहर में बैठकर लिखा चिट्ठा अपने महकमे के किसी दूसरे शहर के कंप्यूटर विशिष्ट पर छाप सकता हूं ताकि उस व्यक्ति को यह तुरंत प्राप्त हो जाए.

हो सकता है कुछ समय बाद यह सुविधा इंटरनेट पर भी आ जाए कि ईमेल भेजने की तरह आप कोई पत्र मुझे बताकर मेरे प्रिंटर पर सीधा भेज दें जिसे हस्ताक्षर कर मैं उचित जगह जमा कर सकूँ. कम समय  में ही ऐसी सुविधाएं मिलने लगेंगी. अब हिंदी में काम करने वाले भी ऐसी सुविधाओं का फायदा ले सकेंगे.

जैसे अतर्राष्ट्रीय संगठनों में ऐसे अनुवादक मशीने लगाई जाती हैं जिसमें बोलने वाला अपनी भाषा में बोलता है और सुनने वाला उसे अपनी भाषा में सुनता है. इसी तरह ऐसी कंप्यूटर की भी भविष्य में कल्पना की जा सकती है कि मैं यहाँ से हिंदी मे लिख कर एक पत्र प्रेषित करूं और उसे चाईना में मंडारिन भाषा में देखा या छापा जा सके. मैं एक हिंदी पत्र का प्रिंट अपने कार्यालय से देता हूँ जो पोलेंड के किसी कार्यालय में उनकी भाषा में छापा जा सकेगा. इस तरह की सुविधाएं सारे विश्व को संपन्न करेंगी

सर्वोत्तम उपलब्धि है कि आज अंग्रेजी नहीं जानने वाले भी मुख्य धारा में समाहित होकर अपना सहयोग दे पा रहे हैं. सारा इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम राजभाषा के लिए भी उपलब्ध है.  सारे रास्ते खुल गए हैं. सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं. कईयों ने अपनाया भी है. इसके कारण लोग कम्प्यूटर चलाना सीख रहे हैं.

इन सुविधाओं का लाभ उठाकर यदि अपने देश की भाषाओं और विदेशी भाषाओं में उपलब्ध ज्ञान को हिंदी में उपलब्ध कराने का कोई ठोस प्रयास सरकार करे या करने वालों को सहारा दे, तो हिंदी की प्रगति कई गुना बढ़ जाएगी और हिंदी राष्ट्रभाषा ही नहीं विश्व भाषा बनने के ख्वाब भी बखूबी देख सकेगी . लेकिन इसके लिए बहुमुखी व बहु-आयामी प्रयास और सहयता की बहुत जरूरत होगी.

अब हम पर निर्भर है कि इसका कितना सदुपयोग करते हैं.

एम. आर. अयंगर.


सोमवार, 1 दिसंबर 2014

गुरुजन

                                                                                                                गुरुजन
                  (http://www.rachanakar.org/2014/11/blog-post_694.html)
                                                     के तहत rachanakar.org में प्रकाशित


सुनील जब हाई स्कूल में दाखिल हुआ तो जाना कि शहर के रेल्वे क्षेत्र के सभी स्कूलों के अग्रणी छात्र इसी स्कूल में आ गए हैं. सुनकर एक तरफ तो बड़ी खुशी हुई कि यहाँ की पढ़ाई बहुत अच्छी होती होगी, तभी तो सारे स्कूल के छात्र यहां आ गए हैं. लेकिन मन के अंदर एक डर भी था कि यदि पढ़ाई में ढिलाई हुई तो कक्षा के प्रथम तीन में स्थान प्राप्त करना आसान नहीं होगा. इसी डर के कारण मन ही मन धीरे - धीरे निश्चय बढ़ने लगा कि मन लगा कर पढ़ाई करनी पड़ेगी और करनी है. आईए सुनते हैं आगे की बात - सुनील के मुख से. 

वह दिन मुझे याद है जब कक्षा 7 वीं की मार्कशीट (अंकतालिका) देख कर पिताजी ने कहा था, - पिछले बरस भी तुम्हें इतने ही प्रतिशत अंक मिले थे. अब भी वही हैं, तो तुमने क्या प्रगति की ?” मैंने बड़े शान से कहा था कि वह कक्षा छः की पढ़ाई थी और यह कक्षा 7 की पढ़ाई हैं. यदि मेरे अंक प्रतिशत कायम हैं, तो मैंने कक्षा को स्तर के अनुपात में ही प्रगति की होगी, अन्यथा अंक प्रतिशत कम हो जाते. पिताजी उससे आगे कुछ बोल नहीं पाए या बोले नहीं. किंतु अब लग रहा था कि इतना काफी नहीं है – अब होड़ बढ़ गई है और प्रतिशत कायम रखने से नहीं चलेगा, इसे बढ़ाना पड़ेगा ताकि अन्यों की ललकार को चुनौती देते हुए, उनसे आगे रहा जा सके. इसी निश्चय के साथ हाई स्कूल में पढ़ाई शुरु हुई.

यह वही दौर था, जब भारतीय क्रिकेट टीम में मंसूर अलीखान पटौदी, सलीम दुर्रानी, दिलीप सरदेसाई अपने अंतिम पड़ाव पार कर रहे थे. जब भारत ने हालेंड को हराकर विश्व कप हॉकी पर कब्जा किया था. अजीत वाड़ेकर की कप्तानी में सुनील गवास्कर क्रिकेट खेलने भारतीय टेस्ट टीम नें शामिल किए गए थे. विश्व चेम्पियन मुक्केबाज कैसियस क्ले (मोहम्मद अली) पहली बार जो-फ्रेज्रियर से मात खाए थे. इसके बाद ही भारत की बदनाम इमर्जेंसी आई थी.

उम्र भी कुछ इसी पड़ाव पर थी. अंजाम यह हुआ कि खेलों में रुझान बढ़ गया. स्वाभाविकतः पढ़ाई में इसका असर झलका. मुझे वह दिन भी याद है जब एक फुटबॉल टूर्नामेंट में मैं सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुना गया था. पुरस्कार स्वरूप दो कापियाँ व एक पेंसिल दी गई थी. सेमी फाइनल में दो गोल दागने के कारण खुश एक दर्शक ने 25 पैसे इनाम दिए थे जिसका हम सब खिलाड़ियों ने चूईंग गम खरीद के खा लिया था.  उन दिनों 25 पैसे की बहुत कीमत होती थी. चार बन्द-रोटियाँ मिल जाते थे. वो दिन मुझे आज भी याद है कि 40 किलो चावल का मोल भाव 1रु. 1पैसे व 1रु. 2पैसे के बीच फंसकर तय हो नहीं पाया था. आज के बालक ऐसी बातें सुनकर उनका मजाक उड़ाएंगे. सेमी फाईनल में खेलते हुए मेरे दाहिने पैर के अंगूठे का नाखून उखड़ गया था. किक मारते ही खून का फव्वारा निकलता था. गोलकीपर ने बॉल पकड़ते समय उस पर खून देखा. तहकीकात हुई और लोग जान गए, किंतु मैने ग्राउंड छोड़ना मुनासिब नहीं समझा. आखिर हम जीत गए. फाईनल में भी ऐसी ही हालत में खेला. हम फाईनल भी जीते और मैं टूर्नामेंट का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी घोषित किया गया था.

बात बहक सी गई है.  इसके चलते इधर स्कूल में सब जान गए कि खेलों में मेरा मन लग गया है. हमारे  आदरणीय गणित के सर श्री राधे श्याम सिंह जी को यह बिलकुल नहीं भाया. उनने बुलाकर जोरदार शब्दों में हिदायत दी कि इसी तरह गेंदा खेलता रहेगा तो दसवीं पास नहीं कर पाएगा. आए दिन वे मुझे देखते ही कहते या बुला भेजते यह कहने को कि सुनील, तुमने गेंदा खेलना कम नहीं किया है. कक्षा की खिड़की से, मैं अपने क्लास के दौरान, तुमको खेलते देखता हूँ. बेटा बात मान ले, ऐसे खेलने से परीक्षा पास नहीं कर पाओगे. बोर्ड की परीक्षा है. मैं उन्हें हामी दिलाता कि नहीं सर मैं खेलों के साथ पढ़ भी रहा हूँ. पास तो हो ही जाऊंगा और प्रथम श्रेणी भी कायम रहेगी,. वे कहते नहीं इतने से काम नहीं चलेगा. तुमको प्रतिशत बढ़ाना है. क्लास में और स्कूल में भी प्रथम आना है. मैं उन्हें आश्वासन देता कि आपकी हर बात पर खरा उतरूंगा, किंतु उनका मन है कि मानता ही नहीं. वे अपनी बात पर कायम रहते.

श्री सिंह अपने काम पर समर्पित थे. 104-5 की बुखार में भी वे कंबल ओढ़कर कक्षा में उपस्थित रहते और कोई सवाल देकर हल करने को कहते. फिर कक्षा के किसी छात्र से वे ब्लेक बोर्ड पर बनवाते. बाकियों से पूछते यह ठीक है? और नहीं तो किसी और से उसे ठीक करने को कहते. खुद सब कुछ देखते रहते और हिदायतें देते रहते. पता नहीं क्यों ? इतने ताप पर भी उन्हें घर बैठना भाता ही नहीं था. इससे हमें तो लगता था कि हम बच्चों से उन्हे इतना प्यार .या कहिए लगाव था कि अपनी तबीयत को भी वे हमारी खातिर नकार जाते थे.

गुरुजी के बार - बार कहने का असर मुझपर यह हुआ कि मुझे डर सा लगने लगा कि सर इतनी बार ऐसा क्यों कह रहे हैं ?  फिर सोचता शायद मैं जो सोच रहा हूँ सही नहीं है, उधर खेलों में दिलचस्पी बढ़ने लगी. अंततः मन में भरे डर के कारण मैंनें खेलों के साथ - साथ पढ़ाई पर और जोर लगाया. मुझे इस बात का तो आभास था कि मेरे साथी छात्र भी तो जी तोड़ कोशिश कर रहे होंगे कि वे क्लास और स्कूल में प्रथम आएं. परीक्षा नजदीक आती गई और पढ़ाई की तरफ रुझान बढ़ता गया. एक समय खेलों का दौर रुक सा गया. मन में डर लगा था कि यदि मैं कहीं गुरुजी को दिया वचन निभा न पाया तो ? लेकिन ऐसा होने नहीं दिया जा सकता था.  बात गुरुजी को दिए गए जुबान की थी, वो भी उनको जो मुझे बहुत मानते थे. बस लग गए जी पढ़ाई करने.

बोर्ड की हर परीक्षा के दिन एक बार तो कम से कम सर आते और पूछते – सुनील पेपर कैसा है ? सवाल बन रहा है ना ? जब हम बच्चों से हामी सुनते तो उनको आनंद होता था. अपने विषय के दिन तो वे दो - तीन बार कक्षा में धूमें. बार - बार पूछ रहे थे, जैसे उनको शक हो गया हो कि हम बच्चों से सवाल शायद हल नहीं हो पाएंगे. परीक्षा के बाद बाहर जाते समय रोकते और पूछते – कितने नंबर के प्रश्नों के जवाब लिखे, कितने मार्क्स मिल जाएंगे इत्यादि सवाल, जैसे परीक्षा हमारी नहीं उनकी हो रही है. कभी - कभी तो ऐसा लगता कि परीक्षा की चिंता, मुझे व मेरे अभिभावकों से ज्यादा गुरुजी को है. जिस दिन परीक्षाएं पूरी हुई उस दिन तो सर ने सवालों की झड़ी लगा दी. मैंने तुमसे कहा था ना कि गेंदा कम खेला करो, तुम रहे ढीठ, माने ही नहीं. अब देखना नतीजा – फर्स्ट क्लास आ जाए तो बहुत है. कितने नंबर मिलेंगे ? कितने प्रतिशत मिलेंगे ? बेहद डरा दिया था. बार - बार लगता था, सर ऐसे क्यों टोक रहे हैं ? मैंने पेपर तो ठीक ही किए हैं, नंबर भी अच्छे आएँगे. किंतु गुरुजी के विश्वास के सामने मुँह खोलने की हिम्मत हो, तब ना कुछ कहेंगे.

हम सब अपने - अपने घरों को रवाना हो गए. गर्मी की छुट्टियाँ मनाई. फिर आया, परीक्षा परिणाम का दिन. सब सुबह सुबह अखबार पाने के लिए स्टेशन वाली दुकान के पास, स्टेशन के सामने अखबार वाले के पास अलग - अलग अखबार खरीद कर, अपने - अपने रोलनंबर की तलाश में लग गए. अपना नंबर प्रथम श्रेणी में देखने के बाद साथियों का – जिनसे तुलना थी या कहे होड़ थी – नंबर देखते. सब प्रथम श्रेणी में पास हो गए हैं. अब आया प्रतिशत का खयाल. 60 प्रतिशत से ऊपर तो सभी प्रथम श्रेणी में हैं. पर कौन कितना ऊपर है, यह तो मार्क शीट ही बताएगा. परीक्षा की अंकतालिका दूसरे – तीसरे दिन स्कूल से मिलती थी. इसलिए स्कूल के चक्कर फिर शुरु हो गए. हर विद्यार्थी चाहता था कि मेरे अंक सबसे पहले मुझे ही पता चलें. इसलिए हर कोई स्कूल जाता था. तीसरे दिन सबह जब स्कूल पहुँचा तो देखा सिंह सर गेट के पास ही खड़े हैं.

पहुँचते ही पहला सवाल दागा –
कौन सा डिविडन लाए हो...
मैंने जवाब दिया सर पहला.
कितने प्रतिशत आए हैं.
सर पता नहीं मार्क शीट मिलेगा तो पता चलेगा.
बोले - जा मार्क शीट लेकर आ..देखते हैं.
मैंने पूछा - सर क्या मार्क शीट आ गई है ?
सर ने कहा - हाँ लेकिन प्रिंसिपल सर खुद बाँट रहे हैं.

मेरी हवा ही खिसक गई. प्रिंसिपल सर पिताजी को अच्छे से जानते थे. कहीं रिजल्ट के बारे पिताजी को बता दिया हो तो?

किसी तरह हिम्मत बाँध कर प्रिंसिपल सर के कमरे तक पहुचा. जैसे शायद वे मेरा ही इंतजार कर रहे हों, तुरंत पुकार कर बोले –आओ सुनील, आओ, अंदर आओ. मैं सहमें कदम सर की तरफ बढा.

पूछे - रोल नंबर क्या है ?
मैने बताया.

फाईल के पत्ते पलटते हुए, उनने मेरा मार्कशीट निकाला और बोले यहाँ दस्तखत कर दो. दस्तखत करते ही, मेरा मार्क शीट पकड़ाते हुए बोले  देखें तो कैसे मार्क्स आए हैं. थोड़ी देर देखा फिर बोले - गुड़ 78 प्रतिशत.

अब मार्क शीट देखने की बारी मेरी थी. मैंने देखा प्राप्तांक 400 में से 312 थे. यानी 78 प्रतिशत.. दिल धक कर गया. 314 वाले को मेरिट स्थान मिला था. लगा काश दो अंक और मिल गए होते. पर अब क्या होना था.  शहर के ही अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में एक लड़की को 314 अंक मिले थे.

बाहर निकला तो चेहरे पर खुशी के बदले मायूसी थी. गेट पर सर अब भी खड़े थे. पूछ पड़े – कितने आए. मैंने कहा 78 प्रतिशत. फिर पूछे दूसरों के कितने आए. मैन सिर हिला दिया – पता नहीं के अंदाज में. उनने मेरे मार्क शीट को गौर से देखा और बोले – शाबास सुनील – तुमने जो बोला कर दिखाया. मैंने सबका मार्क शीट देखा है. स्कूल में तुम्हारे ही सबसे ज्यादा नंबर आए हैं. लेकिन गेंदा नहीं खेलते होते तो तुम आज मेरिट में होते. मैंने सोचा शायद इन्हें ही शिक्षक कहते हैं जो कभी भी शिष्यों से संतुष्ट होने का भाव प्रकट नहीं करते ताकि उन्हें संतुष्ट करने के लिए शिष्य और भी मेहनत करें.

मार्क शीट लेकर आदतन मैं सीधे घर पहुँचा. घर पर सभी मेरे मार्क शीट का इंतजार कर रहे थे. सबसे पहले पिताजी को दिखाया.

कितना परसेंटेज है...
78.
मेरिट का लास्ट क्या है.
जवाब – 314.
थोड़ा दिल लगाते, मेहनत कर लेते तो तुम भी मेरिट में होते. शहर में सबसे ज्यादा किसके – कितने मार्क्स है.
अंग्रेजी माध्यम के एक लड़की के 314.
क्या – दो नंबर के लिए तुम एक लड़की से हार गए ?

पिताजी ने एकाध मिनट के लिए उस पर नजर दौड़ाई और फिर मार्क शीट लौटा दी. न ही शाबासी, न ही मुबारक बाद बस – तुम एक लड़की से हार गए. मन मसोस कर रह गया कि इनकी खुशी कब झलकेगी.

जब पढ़ाई पूरी हो गई और नौकरी करने लगा – तब बातों बातों में पता चला कि पिताजी ने मेरे इस सफलता पर ऑफिस में मिठाई बाँटी थी. लेकिन खुशी हम पर जाहिर इसलिए नहीं किया कि बरखुरदार कहीं संतुष्ट होकर न रह जाएं कि इतनी मेहनत बहुत है. अभी आगे की पढ़ाई भी करनी है.

तब कहीं जाकर दिल को चैन मिला कि मेरे पिता व गुरु ने एक ही रास्ता अपनाया कि शिष्यों पर अपनी संतुष्टि उन्हें जाहिर मत करो वरना उनकी संतुष्टि के काऱण आगे की प्रगति अवरुद्ध हो जाएगी. अब लगता है कि कितनी मुश्किल से उनने अपनी खुशी जाहिर करने से अपने आप को रोका होगा. कितना बड़ा त्याग – बच्चों को लिए, शिष्यों के लिए.

ऐसा ही हुआ इंजिनीरिंग की परीक्षा पास करने पर. मैंने फोन पर खबर दी कि मैं फर्स्ट डिविजन में पास हो गया हूँ. जवाब आया थेंक्स. मैने दोबारा बताया और दोबारा वही जवाब. समझ नहीं आ रहा था कि उधर से कहना क्या चाह रहे हैं. मुलाकात पर मैने सीधे पूछ लिया. मैं आपको पास होने की खबर दे रहा हूँ और आप हैं कि थेंक्स कहे जा रहे हैं, न शाबासी, न ही मुबारकबाद, ऐसा क्यों ? जवाब मिला – तुम्हें हॉस्टल में रखकर पढ़ाने के लिए जो रुपए भेजता था, उससे कुछ की जिंदगी में कोई कमी तो आई ही होगी. तुम्हें भले इसका भान और ज्ञान न हो. पर सच्चाई तो यही है. मैंने थेंक्स इसलिए कहा कि तुमने परिवार वालों के उस त्याग का सही इस्तेमाल किया और उसे बेकार नहीं जाने दिया. तुम्हारे इस सहायक पूर्ण कार्य के लिए मैंने तुम्हें धन्यवाद दिया. मुझे लगा कि तुम्हारा इंजिनीयर बन जाने से बड़ा गुण यह है कि तुमने दूसरों के त्याग को सही अपनाया और उसका सफल प्रयोग किया. यह गुण तुम्हें जिंदरृगी में बहुत साथ देगा.  दूसरों की सहयता को कभी भी बेकार न जाने देना.

आज भी, जब किसी के भी परीक्षा में अच्छे नंबरों से पास होने की बात आती है तो आँखें उन्हें याद करके नम हो जाती हैं. बस सबके सामने, हर जगह आँसू ढल नहीं पाते लेकिन आँखों में घूमते रहते हैं. आँखें नम तो हो ही जाती हैं.

इतना कहते ही उसकी आँखें नम हो गई वह रुआँसा सा हो गया. साथ में बैठा मैं अपने आपको रोक नहीं पाया , मेरी मी आँखे नम हो गई.
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अयंगर
26.11.2014. कोरबा.