मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.

मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल  मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.
मन दर्पण

बुधवार, 15 जून 2011

दोहरा यम


दोहरा यम

बरसों से चरितार्थ हो रही ,
जिसकी लाठी, उसकी भैंस,
हाथ मेरे तलवार आ गई,
और रह गया अब क्या शेष ?

अपने परिजन की लाशों पर ,
मैं भी महल बनाऊंगा,
जल क्यों अब मैं खून पिऊंगा,
माँस भून कर खाऊँगा.

कीचड़ में मैं सना हुआ हूँ,
पंकज से मैं क्या कम हूँ ?
ब्रह्मा, विष्णु, महेश समझ ना !!!
मैं तो बस दोहरा यम हूँ.

एम.आर.अयंगर.
09907996560.

रविवार, 12 जून 2011

जी...... हाँ.... जी...


जी...हाँ...जी...

यदि आप नौकरी पेशे वाले हैं तो आपकी तमन्ना जरूर होगी कि आप भी एक दिन कार्यालय में बॉस की पद पर आसीन हों. यह जरूरी भी है, नहीं तो आप अपने ध्येय – यानी तरक्की के लिए काम नहीं कर पाएंगे. इससे स्वाभाविक है कि आपके साथी आपसे आगे निकल जाएंगे और अचरज नहीं कि किसी दिन व आपके बॉस ही बन बैठें.

इस लिए आपको चाहिए कि अपनी तमन्नाओं को ध्यान रखकर उस दिशा में कार्यरत हों, ताकि आपका ध्येय हासिल किया जा सके. मुंबई से हावड़ा की ट्रेन में सफर पर निकलकर, आप चेन्नई नहीं पहुँच सकते. यदि चेन्नई पहुँचना है तो बीच राह, कहीं न कहीं आपको राह बदलनी पड़ेगी.

साल भर की मेहनत के बाद या यों कहिए कि सालों भर की मेहनत के बाद एक दिन आता है जब तरक्की मिलती है. यदि आप दौड़ में शामिल ही नहीं होंगे तो जीतेंगे कैसे और ईनाम कहाँ से मिलेगा. ऐसे में आपको तो इसकी उम्मीद होनी ही नहीं चाहिए. दौड़ में भी सभी दौड़ाकों को तो इनाम नहीं मिलता. केवल उनको ही मिल पाता है जो पहले, दूसरे या तीसरे नंबर पर ठहरते हैं. देखिए हर बार आप प्रथम भी नहीं आ सकते. यह एक होड़ है. सभी कोशिश करते हे. इसमें आप कहां टिकते हैं, यह तो निर्णय होने पर ही तो पता चलेगा. हाँ यदि किसी ने दौड़ने की कोशिश की, पर किसी कारण स्टेप्स बिगड़ गए - सो जीत नहीं सका, उसे तकलीफ होना तो लाजमी है. पर उसे भी दिल नहीं हारना चाहिए, न ही निराश होना चाहिए. क्योंकि यह दौड़ तो सनातन है, निरंतर है, आज  नहीं तो कल सही. फिर कोशिश करें – कभी न कभी सफलता आपके कदम चूमेगी. अगर रुक गए तो... मन के हारे हार है... सोचिए दुनियाँ दौड़ रही है और आप रुके हुए है. जब दौड़ कर आगे नहीं आ पाए तो क्या रुक कर आगे आ जाएँगे ???

तरक्की की दौड़ में सफलता के लिए आजकल शारीरिक सौष्ठव ही सबकुछ नहीं है. यह कई साधनों में एक साधन है. कई नए आयाम सामने आते हैं.

सबसे पहले ध्यान रहे कि आप कंपनी के लिए काम करते है और इस काम का आपके तरक्की से कोई संबंध नहीं है. इसके लिए कंपनी आपको तनख्वाह दे रही है. कंपनी में तरक्की का सीधा मतलब है प्रमोशन. तरक्की के लिए कंपनी आपका (और सबका भी) मूल्यांकन करवाती है. मूल्यांकन करता है आपका बॉस. यह बात अलग है कि आपके बॉस के बढ़िया मूल्यांकन मात्र से आपकी तरक्की निश्चित नहीं हो जाती, लेकिन बॉस के गलत मूल्यांकन से तरक्की का न होना – निश्चित है. करोड़ों में कोई ऐसा (सौ) भाग्यवान होगा, जिसकी बॉस द्वारा गलत मूल्यांकन के बाद भी तरक्की हो जाती है. क्या आप इतने भाग्यशाली है ???

इस तरह यह जाहिर होता है कि अगर आप तरक्की चाहते हैं तो इस तरह के इंतजामात कीजिए कि आपके बॉस आपका बढ़िया से बढ़िया मूल्यांकन करें क्योंकि इसी मूल्यांकन पर आपकी प्रगति निर्भर है. आपका सर्व प्रथम ध्येय आपके बॉस से बढ़िया मूल्यांकन करवाना, होना चाहिए.

इसके लिए कई तरीके है. निर्णय कीजिए आपको कौन सा रास्ता या तरीका सुहाता है. सोचिए किन किन पहलुओं पर ध्यान देना होगा. बहुत कम ऐसे बॉस मिलते हैं जिन्हें केवल काम करके ही खुश रखा जा सकता है. अक्सर बॉस तो अन्य विधाओं से ही खुश किए जा सकते है. आपको अपने बॉस को पढ़कर समझकर जानना होगा , निर्णय लेना होगा कि बॉस किस तरह से खुश किया जा सकता है. यह पूर्णरूपेण आपकी ही जिम्मेदारी है.

जैसे प्यार और वार (war) में सब जायज है, वैसे ही बॉस को खुश करने की होड़ में भी, सब कुछ जायज है. कोई तरीका गलत या नीच किस्म का नहीं होता.

महाभारत के समय जब अर्जुन और दुर्य़ोधन दोनों श्री कृष्ण के पास सहायता मांगने पहुंचे, कृष्ण आराम फरमा रहे थे. दोनों ने उन्हें आराम करने दिया. जब श्रीकृष्ण की तंद्रा भंग हुई तब उनने अर्जुन से सवाल किया कहो कैसे आना हुआ. इस पर दुर्योधन ( शायद यह समझकर कि अर्जुन श्री कृष्ण की सारी सेना न मांग ले) कहने लगे – कान्हा, पहले मैं आया हूं इसलिए प्रथम अवसर मुझे मिलना चाहिए. अर्जुन ने भी इसका समर्थन किया . लेकिन श्रीकृष्ण ने फिर भी अपने तर्क लगाकर कि मैंने अर्जुन को पहले देखा है, अर्जुन को प्रथम अवसर देने की बात कही. अर्जुन (नर), श्रीकृष्ण (नारायण) को प्रिय थे.  श्रीकृष्ण स्वयं नारायण हैं उन्हें इन तर्कों की आवश्यकता क्यों आन पड़ी ??? तर्क और कहावतों की यह बड़ी विशेषता है कि अपने सुविधानुसार कहीं भी फिट कर लीजिए.

प्यार और वार जहाँ एक जगह पूर्ण सहमति और दूसरी जगह पूर्ण असहमति निश्चित है – सब चल जाता है.

सबसे पहली जरूरी बात है कि बॉस खुश रहे. अगली बात कि इसके लिए क्या क्या जरूरी है. यानी खबर लीजिए – चाहे जैसे हो सके- कि बॉस किन किन चीजों से, खबरों से , सुविधाओं से खुश रहते है. ताकि उन सुविधाओं को उपलब्ध करवा कर आप बॉस को खुश कर सकते हैं. इन सबकी खबर मिलने के बाद आता है – इन सुविधाओं के इंतजामात का. कोई खाकर खुश हे तो कोई पीकर. खाने पीने के भी अपने अपने तौर तरीके और लेवल होते हैं. पता कीजिए आपका बॉस किस लेवल पर है. ताकि उसी लेवल का इंतजाम कर सकें.

ध्यान रहे कि आपके बॉस केवल आपके ही बॉस नहीं हैं . इसलिए केवल आप ही बॉस को खुश रखने की नहीं सोच रहे हैं – सारे मातहत इसी कोशिश में लगे होंगे. इसके अलावा उनके सगे संबंधी, यार दोस्त अपने तरीके से उन्हें खुश रखने की जायज कोशिश कर रहे होंगे. आपको इन सबके साथ होड़ करना है और अपनी साख दिखानी है, ताकि बॉस मूल्यांकन के समय आपका (कम से कम-  at least) सही मूल्यांकन करें. यदि सही से ज्यादा करा सकें तो यह आपकी जीत या आपका सौभाग्य कहा जा सकता है.

बॉस के खुश रहने के लिए कार्यालय व परिवार का माहौल भी जिम्मेदार होता है. यह भी एक पहलू है, जहाँ आप की कोशिश रंग ला सकती है. किसी तरह से यदि आप माहौल को इस प्रकार ढ़ाल दें, कि बॉस खुश हो जाए तो यह आपकी खासियत होगी. कार्यालय में उड़ती खबरों को, बॉस के विरुद्ध षड़यंत्रों की खबरों को, स्ट्राईक इत्यादि की खबरों को समय रहते बॉस के पास पहुँचाना एक बड़ी खासियत होती है... क्योंकि इससे औरों द्वारा पकड़े जाने का खतरा रहता है. जो खतरे मोल कर भी बॉस का काम करे वह बॉस का खास तो होगा ही ना. बॉस की परेशानियाँ कम करने का यह एक अति उत्तम उपाय है.

कभी कभी पारिवारिक परेशानियाँ भी हो जाती हैं – जैसे मेडम को राखी पर घर जाना है और साहब बढ़िया खाना के शौकीन हैं. होटल मँहगे हो रहे है. ऐसे में आप उन दिनों किसी तरह से घर पर बढिया खाना पहुँचा दिया करें. 

मेडम की अपनी परेशानियाँ भी तो साहब की ही परेशानियाँ हैं ना. इसलिए मेडम के संपर्क में रहिए और उन्हें परेशान होने से बचाएँ. बजार में अच्छी सब्जियाँ नहीं मिल रही हैं और मेडम परेशान हैं...आप किसी बड़े बाजार से या पड़ोस के शहर से अच्छी सब्जियाँ मँगा दीजिए.

बॉस के यात्रा के दौरान  रिहाईश के लिए अच्छे होटल का इंतजाम, अतिरिक्त सुविधाओं का होटल के बिल में समागम, अच्छे चालक के साथ बढ़िया परिवहन इन सबका इंतजाम भी साहब को कॉफी खुश रखता है. आपका इन विधाओं पर विशेष ध्यान होना जरूरी है अन्यथा कोई और बाजी मार जाएगा.

खास ध्यान रहे कि आज का जमाना प्रबंधन  ( management) का है,  जिसमें केवल रिजल्ट देखा जाता है. आप किस तरह उसे पा रहे हैं, इससे कोई सरोकार नहीं होता. आपके बड़ों ने, बुजुर्गों ने, या फिर बाप दादों ने आपको जो तहजीब   ( Manners / Etiquettes ) सिखाए, अब वह केवल किताबी रह गई है. शायद किताबों में भी वह आज न मिल पाए. अब  केवल प्रबंधन ही प्रबंधन चलता है. रास्ता चाहे जो हो, मंजिल ही प्रमुख है. उसूलों और प्रबंधन में आमूल चूल फर्क है. दोंनों का साथ-साथ चलना लगभग नामुमकिन है. बहुत ही कम ऐसे अवसर आते हैं जहाँ उसूल और प्रबंधन साथ चलते है.

इस लिए तरक्की के लिए, जैसे भी हो सके बॉस को खुश करना है. कैसे करेंगे यह आप स्वयं जानें. और न कर पाए, तो तरक्की की उम्मीद मत कीजिए. तरक्की न होने पर निराश मत होइए.

जो लोग यह सोचते हैं कि मैं कंपनी का काम तो कर ही रहा हूँ इसलिए मैं तरक्की का हकदार हूँ, शायद आज के जमाने में उनसे बड़ा बेवकूफ कोई नहीं होगा. जनाब आप भूल रहे हैं कि कार्यालयीन काम करने की आपको तनख्वाह मिलती है. सोचिए तरक्की के लिए आप क्या कर रहे हैं ??? कुछ कीजिए फिर उम्मीद कीजिए तरक्की की.

बॉस को खुश करना नहीं चाहते या खुश करना नहीं आता, तो कम से कम बॉस को दुखी तो मत कीजिए .. इसके लिए कम से कम बॉस की बातों पर हाँ जी - हां जी तो करना पड़ेगा, अन्यथा खरगोशों का जमात मे कछुआ चाल चलते रहिए.

आपका भाग्य आपके हाथ है. आप अपने भाग्य विधाता हो. मर्जी आपकी आप क्या करना चाहेंगे.


एम.आर. अयंगर.
09907996560.







जान का ऑफर

जान का ऑफर
रंजन और राधिका एक दूजे से बेहद प्यार करते थे. राधिका कर्नल की बेटी थी. इसलिए उसको समाज में खुले विचरने की आदत थी. समय ऐशो आराम से कटता था. उसके लिए पुरुषों से दोस्ती आम बात थी. वैसे डिफेंस कालोनियों में शायद इस तरह के प्रतिबंध नहीं हुआ करते.
प्यार में दोनों दिनों दिन घुलते गए. उनका प्यार परवान चढ़ने लगा. प्यार की सरहदों के पार पहले कभी कभी और फिर अक्सर वे एकांत में आलिंगन करते और जीने मरने की कसमें खाते रहते.
रंजन एक भावुक इंसान था. प्यार के बहाव में अक्सर वह जीने मरने की कसमें खाता था. शायद ऐसी कसमें राधिका के लिए कोई ज्यादा मायने नहीं रखती थी. लेकिन फिर भी वो उन सबको सुनती और चुप कर जाती. कभी कभी तो रंजन यहां तक कह जाता था – राधिका तुम यह क्या कह रही हो – यह तो कुछ नहीं है कभी जान माँग कर तो देखो – मैं तुम्हारे लिए जान भी दे सकता हूँ.
प्यार के दो पंछी खुले आसमान में विचरण करते थे. कोई सीमाएं न थीं. उनके प्यार में दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की होने लगी. पर दुनियां हर किसी को आसान जिंदगी नहीं देती. यही तो किस्मत के खेल हैं.
इसी मुहल्ले में एक नए ब्रिगेडियर का तबादला हुआ. जब वे आए तो, साथ आया उनका जवान बेटा संदीप. बे-लगाम राधिका का उससे मिलना स्वाभाविक था, सो मुलाकात हुई.
इसे दुर्भाग्य कहें या सौभाग्य राधिका और संदीप की आंखे चार हो गईं. अंदर ही अंदर वे एक दूजे को चाहने लगे. दोनों जवान, डिफेंस परिवार, जहाँ रोक टोक कम.. फिर क्या था दोंनों के साथ साथ परिवार वालों के भी रिश्तों में चाशनी भरने लगी.
उधर राधिका रंजन को भूलने की सोच भी नहीं रही थी. उसे शायद इस बात का एहसास भी नहीं था कि दो नावों में पैर रखना कितना खतरनाक है. राधिका ने संदीप को भी इसकी खबर नहीं होने दी. वह भीतर ही भीतर रंजन और संदीप की, हर पहलू में तुलना करती और बेहतर को पाना चाहती थी.
संदीप से बढ़ते रिश्तों के द्वारा उसे तुलना करने के लिए नए आयाम मिलते और दिन प्रतिदिन उसका निर्णय एक और कदम आगे बढ़ता.
जानकारी की आड़ में रंजन, अब भी राधिका को उतना ही चाहता था जितना पहले चाहा करता था. उसके "जान हाजिर है" के संवाद आज भी जारी थे.
धीरे धीरे राधिका को संदीप, रंजन से बेहतर लगने लगा. अपने आपको सँभालते हुए उसने रंजन से यह बात कह देनी चाही. पर प्यार में कसमें खाना जितना आसान होता है..... वियोग की बात करना उतना आसान नहीं होता .. सो राधिका अक्सर सोचती पर कह नहीं पाती ..उसे समझ नहीं आ रहा था कि कहे तो कैसे कहे. रंजन की इस पर क्या प्रतिक्रिया होगी. माहौल.. को वह कैसे सँभाल पाएगी. इसी कशमकश में दिन बीतते गए. राधिका धीरे धीरे परेशान सी होने लगी कि रंजन से छुटकारा कैसे पाया जाए. अब वह रंजन से मुक्ति पाने के लिए बेचैन थी.
राधिका चाहती थी कि मौका पाते ही वह रंजन से सारी बातें कह दे और दोनों खुशी खुशी अलविदा कह सकें. शायद राधिका को इसका एहसास नहीं था कि यह इतना आसान नहीं है, जितना लग रहा था. पर समय माहौल और रंजन से किए गए अनेक तरह के वादे आड़े आ रहे थे और वह रंजन से कह नहीं पा रही थी. अब वह लगभग तड़पन का स्थिति तक पहुंच चुकी थी.
इसी कसमकश को दौरान एक दिन रंजन राधिका के घर आया. घर में राधिका अकेली थी. फिर वही प्यार का बातें – दौर चलता रहा और आदतन रंजन कहता रहा, तुम कभी माँग कर तो देखो- मैं तुम्हारे लिए जान भी दे सकता हूँ. अचानक राधिका का माथा ठनका. न जाने क्या सोच कर झटके से उठी और घर के भीतर चली गई. दो मिनट में जब लौटी तो उसके हाथ में पापा का रिवॉल्वर था. कमरे में आते ही उसने रंजन के सीने में गोलियाँ उतार दी – और बोल पड़ी -  रंजन तुम कहा करते थे ना.. मैं तुम्हारे लिए जान भी दे सकता हूँ.. लो आज मैंने अपना अधिकार ले लिया. रंजन, अपना टूटती साँसो को समेटे .. कह पड़ा.. राधिका मैंनें तो जान देने की इच्छा जताई थी. तुम्हे जान  देने का ऑफर किया था, जान  लेने का अधिकार तो नहीं दिया था. मेरे जान की जरूरत थी तो माँग कर देखती. यह तुमने क्या किया. मेरे खून का इल्जाम अपने सर ले लिया.
राधिका जैसे सपने से जागी .. यह मैंने क्या कर दिया .. लेकिन अब वक्त बीत चुका था और रंजन की साँसें थम चुकी थी.

एम.आर.अयंगर.
09907996560.