मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.

मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल  मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.
मन दर्पण

सोमवार, 19 दिसंबर 2016


रिश्तों की मर्यादा

बचपन के मोहल्ले में रहने वाली एक मुँहबोली मौसी की बेटी स्वाति ने चिट्ठी  लिख कर सोनू को अपने घर बुलाया .. यह कहते हुए कि  मम्मी पापा को बताना मत कि मैंने बुलाया है और हाँ जल्दी आना. स्वाति ने सोनू को बताया कि घरवालों ने उसके लिए लड़का देख लिया है.

सोनू गिरते पड़ते पहुँचा. पता लगा  अभिभावकों ने लड़का पसंद कर लिया है और लड़के वालों की हाँ भी आ गई है. बस स्वाति की हाँ ना का इंतजार हो रहा है पिछले पखवाड़े से. सोनू पहले तो घबराया फिर सोचा कि "यदि हाँ या ना ही कहना है तो लड़की अपनी मर्जी बताए. मेरे लिए यह शादी खुशी की खबर है."-

स्वाति ने बहुत समय से इसे रोक रखा है, अब मुसीबत सर पर आ गई है. तो सुलझाने के लिए उसे सोनू चाहिए. क्योंकि उसका मानना है कि मम्मी पापा को मनाना है तो सोनू का होना जरूरी है. ऐसा उस परिवार के सभी मानते हैं.

स्वाति ने सोनू को लड़के से मिलाया और पूछा कि "तुम्हारी राय क्या है? स्वाति ने सोनू को भी अपने मन की बात नहीं बताई.

सोनू  ने कहा कि यदि मेरी राय चाहिए तो अमल करना होगा...ना नहीं चलेगा. मंजूर है तभी मैं आगे बढ़ूँगा. जब बात तय हो गई तो सोनू ने लड़के के साथ संपर्क किया, साथ में घूमे फिरे, लड़के को अपनी बारीकियों में परखा. दो दिन परिचय पाकर समझा और स्वाति को हाँ कहकर जवाब दे दिया.  दो दिन बाद सोनू अपने शहर वापस चला गया.

सोनू के लौट जाने पर, स्वाति ने मम्मी को हाँ में जवाब दे दिया. सब खुश तो हुए, पर मम्मी को एक शक हुआ. इतने दिनों से आनाकानी करने वाली लड़की ने आज अपने से हाँ कैसे किया?

मम्मी ने बहुत विचारने के बाद सोनू को फोन किया. खूब नाराज हुई उस पर. बोली बेटा, तुम लोग आपस में एक दूसरे को इतना पसंद करते थे तो एक बार हमारे कान में बात डाल देते. हम बाहर ढूँढते ही क्यों. अब क्या हुआ? तू यहाँ बिना बताए आया, दो.. तीन दिन के लिए आया था. क्या करने आया था. क्या किया. कुछ खबर नहीं, पर स्वाति ने, जो कि इतने समय से जवाब नहीं दे रही थी, तुम्हारे लौटने के बाद अब खुद अपने ही से जवाब दिया  -- वह भी हाँ में. तू क्या करके गया?

आदतन सोनू को  सच  बताना पड़ा. कि मौसी आप गलत विचार मन से निकाल दें. ऐसी वैसी कोई बात नहीं है. स्वाति नहीं चाहती कि हम उसकी शादी से बिछुड़ें. आपको पता है हमारे आपसी वात्सल्य का. इसीलिए वह चाहती थी कि उसका वर मात्र आपका ही नहीं, मेरे पसंद का भी हो और वह मुझसे जानना चाहती थी कि लड़का उसके लिए सही रहेगा या नहीं. मौसी का सोनू पर बहुत विश्वास और लगाव था. सोनू की बातों से उनकी आँखें भर आईं।

तब उनको लगा कि इनमें कितना गूढ़ आत्मीय संबंध है. शायद सब चाहते थे,  मौसी भी कि सोनू  स्वाति से ब्याह रचा ले. लेकिन उनके रिश्ते तो वैसे नहीं थे, वे उससे कहीं ऊपरी सतह की सोच पर थे.

हाँ बहुतों को ऐसा शक था लेकिन उन्होंने बहुत परिपक्वता दिखाई और सच बात बता दी सबको...

अब उस परिवार में सोनू की साख बहुत बढ़ गयी है. आज भी यदि उस परिवार में  कुछ भी तकलीफ हो, तो सोनू की राय ली जाती है. 
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हार का उपहार

 

     हार का उपहार

बरसों परवानों को, दीपक की
लौ में जलते देखा है,
शमा के चारों ओर पड़े
वे ढेर पतंगे देखा है.

कालेज में गोरी छोरी को
घेरे छोरों को देखा है,
खुद नारी नर की ओर खिंचे,
ऐसा कब किसने देखा है.

उसने क्या देखा, क्या जाने,
किसकी उम्मीद जताती है,
कहीं, ढ़ोल के भीतर पोल न हो,
यह सोच न क्यों घबराती है.

वह करती रहती नादानी,
आदर सम्मान जताती है,
इन सबसे भी खुश ही तो है
फिर मंद-मंद मुस्काती है.

वह दिल के एक मुहल्ले में,
अपना घर द्वार बनाती है,
वह इन अंजानी गलियों में,
अपनी पहचान बनाती है.

क्या देखे अपनी चाह में,
क्या है उसकी निगाह में,
खुद शमा जलती रहे,
रात काली स्याह में.

ऐ खुदा तू ये बता,
हैं यहाँ क्या माजरा,
शमा पतंगे क्यों ढूंढे
है तेरा ही बस आसरा.

एक ऐसा रिश्ता, जिसको वे
नाम नहीं देना चाहें,
इक दूजे को किए याद बिना
कुछ पल भी ना रह पाएँ.

एक ऐसा रिश्ता,
जिसमें प्यार हो,
ममत्व हो,
कच्चे धागों बंधन हो,
कोई भाभी हो, ना मासी हो,
कोई देवर ना, कोई साली हो,
बँधकर रिश्तों की मर्यादा में,
कोई शहजादा, ना शहजादी हो,
पर हर पल की खुशहाली हो,

वह रिश्ता जिसमें प्यार का हर
पाक-स्वरूप मिला जाए.
जो किसी भी जाने अनजाने
रिश्तों के हद में न रह जाए,

न किसी नाम में बँध पाए,
ना किसी नाम से बँध पाए,
अच्छा ही हो गर इसको,
कोई नाम नहीं जो दे पाएं.

कोशिश हो नाम दिलाने की,
गर दे पाए तो हार ही है.
इस जीत में उनकी हार सही,
इस हार में एक उपहार तो है.
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शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

राघव का हश्र


राघव का हश्र

जूही को बचपन से ही बहुत लगाव है अपने पड़ोसी अंकल राघव से. उन्होंने जूही  के मम्मी-पापा की शादी भी एटेंड की थी. बचपन में जूही के अभिभावक बच्चों को राघव के पास छोड़ कर रात में कोई 9 बजे सारेगामा की शूटिंग देखने जाते थे. आते - आते देर रात 12 से 1230 तक हो जाते।

बच्चे देखते कि  हॉल में राघव अंकल बैठे हैं, तो सो जाते. उठते थे पानी, बाथरूम के लिए तो हॉल में नजर डालकर तसल्ली कर लेते और हेल्प से फारिग होकर फिर सो जाते.  राघव के आसपास होने पर बच्चे सुरक्षित व सुकून अनुभव करते थे. 

एक बार जब जूही अस्पताल में भर्ती थी। तब पापा और राघव दोनों रात में अस्पताल में ही थे. पापा जूही के पास बैठे थे और राघव कमरे में ही बेंच पर बैठे थे। राघव और पापा दोनों सहमत थे कि पापा के पास जूही को आराम से नींद आ जाएगी.

जूही की आँख खुली तो उसने पापा से कहा... आप जाकर बेंच पर सो जाएँ. राघव अंकल मेरे पास बैठेंगे.

पापा को अच्छा तो नहीं लगा. एक बार जूही को समझाने की कोशिश किए किंतु जब बच्ची नहीं मानी तो बच्ची के लिए मान गए.  अब राघव जूही के सरहाने बैठा हुआ था और पापा बेंच पर लेटे थे.

रात जूही अंकल का हाथ पकड़कर सोई क्योंकि उसे डर था  कि कहीं अंकल चले न जाएँ. जब भी राघव का हाथ जूही के हाथ से अलग होता, वह जाग जाती. देखती राघव पास ही बैठा  है तो फिर सो जाती. 

सुबह पापा ने यह खबर मम्मी जी  तक पहुँचाई.

शायद यह पहला झटका था.

जूही और राघव का रिश्ता गाढा होता गया. राघव ने जूही के अभिभावकों से उसे गोद लेने की भी बात की. सब तैयार, पर मम्मी नहीं मानी.  जूही को भी इसकी खबर हुई. उसे किसी में कोई ऐतराज नहीं था.

राघव की माँ को जुही दादी कहती थी. उनके हाथ के पराठे और आलू भुजिया  की जूही खास फरमाईश करती और खाती थी.

फलतः जूही घर पर ढंग से नहीं खाती थी और यह मम्मी की परेशानी की वजह बन रहा था. उन्हें पता नहीं था कि जूही राघव के घर खाकर आ रही है.

 एक दिन मम्मी जूही को खोजते - खोजते हुए राघव के घर आई और देखी कि जूही आराम से और   पराठे व आलू की भुजिया खा रही है. एक तरफ उन्हें खुशी हुई कि जूही चुपचाप कुछ खा तो रही है और दूसरी तरफ नाराजगी भी कि घर में खाती नहीं है, नखरे करती है. उन्हें लगा कि दादी उसे बिगाड़ रही है.  मम्मी ने दादी को रोकने की कोशिश की कि जूही को न खिलाएँ जिससे कि वह घर पर खाने लगे।

दादी तो मम्मी की माँ से भी बड़ी. ही थी. समझाने लगी कि बच्ची है खाने दो, कैसे मना कर.दूँ. मम्मी चुप तो हुई पर मन नहीं माना उनका. खाने के बाद उसे ले गई. 

यह दूसरा झटका था.

अब जूही बड़ी हो रही थी. जो देखती कह जाती थी. उसके मासूम मन को अच्छा बुरा समझता नहीं था.

एक दोपहर जूही अकेली पहली मंजिल से चलकर तीसरी मंजिल तक आकर राघव के घर पर बेल बजाई. अकेली,  भरी दोपहरी में, गर्मी के दिन, बात समझ नहीं आई.  राघव के घर भी सब सो रहे थे. उसने जूही से पूछ लिया...अकेले कैसे आ गई? दरवाजा खुला था क्या? मम्मी घर पर नहीं है क्या?

जूही आराम से बोली  - हैं न, सो रही है. 
दरवाजा किसने खोला -- कुंडी लगी थी, मैंने खोल लिया
दूसरा सवाल... पापा कहाँ गए? जूही बोली : मम्मी के साथ सो रहे हैं.

लगा कि समय आ गया कि अब जूही के अभिभावकों को सँभलना चाहिए. दोस्त की हैसियत से, करीबी होने के कारण उन्हे चेता देना चाहिए ऐसा राघव ने महसूस किया. पता नहीं जूही कब, कहाँ,  किसे क्या बता दे.

राघव ने  जूही के पिताजी को बताया कि अब सँभलने के दिन आ गए हैं. बिटिया जो देख रही है वह कहने की उम्र में आ गई है, कह रही है. उसने उसने मुझे ऐसा बताया. अब सँभलने का काम बड़ों का ही होगा। 

जूही के पापा को बात समझ आई और उन्होंने चाहा कि राघव घर चलकर वहाँ  अपनी जबानी भाभीजी को बताए. उस समय जूही भी वहीं थी. राघव ने भाभीजी को भी सारी बात  बताया.

इसपर तुरंत भाभीजी के तेवर दिख गए. राघव डर गया. बस रोया नहीं, पर उनसे निवेदन जरूर कर आया कि जूही को कुछ न कहें, वह अभी ना समझ नादान है.है. आप ख्याल किया करें. इस उम्र में बच्चे सच बोल जाते हैं, पर मतलब नहीं समझते. कहकर उदास राघव अपने घर लौट आया.

यह तीसरा झटका था.

बच्ची को पता नहीं डांटा गया या मारा गया, पर वह दहशत में आ गई. बस. 

जूही राघव दूर दूर रहने लग गई. राघव का मन बहुत रोया. उसका मन दिन ब दिन परेशान होने लगा. काम में, जिंदगी में किसी में मन नहीं लगता था. रातें रोते - रोते बीत रही थी. जब रहा नहीं गया तो भड़ास निकालने के लिए - मन हल्का करने के लिए  राघव ने अपनी पीर को एक कविता के रूप में लिखा... "हश्र"



राघव जूही से दूर रह नहीं पा रहा था, पर कविता में अपना दुख उतारने के बाद वह कुछ हल्का महसूस करने लगा. इसके बाद समय के सहारे उसका दर्द घटता गया. वह जूही के बिना जीना सीख रहा था. इस घटनाक्रम ने राघव का जूही के घर उठना बैठना भी करीब बंद ही हो गया था।

अगले जनमदिन पर जूही राघव को न्यौता देने आई. जिससे राघव का मन भर आया. वह जनमदिन मनाने जूही के घर गया. तबतक जूही के अभिभावकों को राघव का दुख समझ ममें आ गया था. सभी खुश थे. उसके बाद रिश्ते सुधरते गए. साल भर बाद सब कुछ यथावत हो गया. सारे आपसी रिश्ते खुशी खुशी निभने लगे.
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बुधवार, 7 दिसंबर 2016

नरेंद्र


नरेंद्र

पिछली बार जब कादिर अपने एक दोस्त के शहर गया तो उसको संगी साथियों ने कहा, भाई अपने कालेज के चार पाँच लोग हैं यहाँ. चलो, किसी दिन सब मिलते हैं किसी जगह. सहमति बनी तो औरों से भी संपर्क किया गया. सभी को बात अच्छी लगी. तब फाईनल किया और एक शाम होटल में सब इकट्ठे होंगे.

उनमें से एक कक्षा चार से कादिर की साथी था और वह बी ई तक साथ था. निश्चित दिन वह कादिर को साथ लेकर गया क्यों कि कादिर को  इस शहर का ज्ञान नहीं था. जब वहाँ पहुंचे तो देखा कुल पाँच में से  तीन तो हमउम्र ही थे. दो तो साथ आए ही. तीसरा भी उसी शहर का था जिसने अन्य विभाग से बीई किया था. चौथा एक साल सीनियर था. पर पाँचवां तो करीब चार पाँच साल छोटा था. वह अलग डिसीप्लीन के क्लास में था.

संध्या सत्र का प्रारंभ परिचय से हुआ. उस जूनियर से सबका परिचय कराया जा रहा था. बाकी तीन तो आपस में परिचित थे. पर परिवार वालों से परिचय हो रहा था. सीनियर से भी कुछ परिचय तो था पर उनके परिवार से भी सबका परिचय हुआ. बाकी जब कादिर का नंबर आया तो केवल जूनियर रह गया था. सब अपना और अपने परिवार का परिचय दे रहे थे.

सब के बाद आया मौका उसके पास. वह एक जूनियर था. उसको अपना परिचय कराना था सबसे. तो सबसे पुराने साथी ने शुरु किया. यह नरेंद्र हैं, हमसे चार साल जूनियर थे कालेज में. अब यहाँ एक प्राईवेट कंपनी में जी एम हैं. (वह किसी कंपनी में जी एम था. बाकी भी ऐसे ही थे.) फिर बाकियों की तरफ इशारा करते हुए शुरु हो गए... “”नरेंद्र, यह है.. रमेश, हमारे ही बैच में मेकानिकल इंजिनीयरंग से हैं. यह  है अनिल, हमसे एक साल सीनियर इलेक्ट्रिकल से” - वह खुद तो नरेंद्र का परिचित था ही. अंत में कादिर के सामने आकर उससे पूछा - इनको तो तुम नहीं जानते होगे, ये यहाँ नहीं रहते...

नरेंद्र खिलखिलाकर हँसा... अरे सर क्या बात कर रहे हैं.. इनको तो मैं आप सबसे पहले से जानता हूँ. सब की सिट्टी - पिट्टी गुम. सबको आश्चर्य कि जिसके बारे में सबसे ज्यादा शंका थी कि अपरिचित होंगे, वहीं सबसे पुराना जान पहचान निकल आया. हम बचपन में साथ ही मिलकर खेलते थे. इनका नाम कादिर है. हमारे ही, शहर में हमारे ही मुहल्ले में रहते थे. मेरे पिताजी और इनके पिताजी दोनों रेल्वे में साथ साथ काम करते थे.

जब साथियों को आश्चर्य सा होने लगा तो नरेंद्र आगे बढ़े और सबको बताया कि स्कूल के दौरान मुझे गणित से बहुत डर लगता था. सर के बारे में मुहल्ले में सब बात करते थे कि बहुत अच्छा पढ़ते हैं. कक्षा 8 में मुझे गणित में ग्रेस मार्क्स से पास किया गया था.

तब सर बीएससी में पढ़ते थे. अपनी नौवीं कक्षा के शुरु में, मैं हिम्मत करके सर के पास गया और सीधा पूछ लिया कि मुझे आपसे मेथ्स सीखना है आप सिखाएंगे ?’
सर ने कुछ सोचा भी नहीं और बोले – यदि तुम्हें सीखने का शौक है तो मुझे कोई ऐतराज नहीं है. कब से सीखोगे.’’ 
तो मैंने कहा आज शाम से.

बस शुरु हो गया पढ़ने - पढ़ाने का दौर. सर बड़े स्ट्रिक्ट थे. कहते थे जो सीख कर जाते हो उसकी प्राक्टिस किया करो. नहीं समझ में आए तो फिर पूछो. बिना समझे. आगे मत बढ़ जाया करो. शुरु - शुरु में मैं तीन चार दिन एक ही बात पूछते रहता था. पर सर कभी गुस्सा नहीं करते थे. फिर से शुरु से समझाते थे. परिचय पुराना होने के कारण पूछने में कोई डर भी नहीं लगता था.

मुझे पढ़ाने के बाद सर फिर अपनी पढ़ाई करते थे. पता नहीं कब तक पढ़ते थे. पर हमारे साथ दिन भर खेलते भी थे.

मैंने कक्षा नौंवीं में ही इनसे ही मेथ्स सीखा है. पहले तो पास होने के लाले पड़ते थे और नौंवीं में 100 में से 98 नंबर आये. परीक्षाफल आने पर मैं रिजल्ट लेकर सीधे इनके घर दौड़ता हुआ पहुँचा. साँसे फूल रही थीँ, सर समझ गए कि मैं दौड़ता आया हूँ. उन्होंनें बिठाकर पानी पिलाया. फिर पूछा क्य़ा बात है, क्या हुआ? मैं ने मार्कशीट उनकी तरफ बढ़ा दी और खुशी के मारे पागल होते हुए बताया, सर मुझे मेथ्स में 98 नंबर मिले हैं.

सर के चेहरे पर खुशी तो दिखी,  पर साथ में गुस्सा भी. एक दम विचलित नहीं हुए. बोले .. कहाँ, स्कूल से आ रहे हो? मेरी हाँ सुनकर बोले, घर जाकर आए? माँ - पिताजी को मार्कशीट दिखाया ? नहीं में जवाब सुनकर बहुत गुस्सा हो गए. बोले जाओ पहले घर जाओ. माँ पिताजी सबसे पहले बाद में कोई भी. पहले उनको दिखाओ फिर किसी को भी दिखाना.

तब मैं घर गया. माँ - पिताजी को मार्कशीट दिखाया. वे बड़े खुश हुए और बोले जाओ कादिर को दिखाकर आओ. शाम को उनको अपने घर बुलाना.

मैं लौटकर फिर सर के पास आया. तब सर ने मार्क शीट देखा और बहुत - बहुत बधाईयाँ दी. बोले अब तुम अपने आप भी पढ़ सकते हो, मेरी जरूरत नहीं है रोज पढ़ाने की. हाँ कहीं कोई तकलीफ परेशानी हो तो पूछ लिया करना. इस तरह मुझे नौवीं में ही उम्मीद हो गई थी कि मुझे इंजिनीयरिंग में दाखिला मिल जाएगा.  

इतना कहकर नरेंद्र सबकी तरफ ताकने लगा. तब जाकर सबको समझ आया कि कादिर से नरेंद्र के कितने पुराने व कितने आत्मीय संबंध थे

बीच - बीच में नरेंद्र कभी कादिर की तरफ तो कभी अन्यों की तरफ देखता रहा. कादिर को तो बहुत ही खुशी हो रही थी कि एक जी एम पद का व्यक्ति बिना किसी रोक के सबके सामने किस तरह सच्ची बयान कर रहा है. वह नरेंद्र की सरलता का कायल हो गया था, जो कह रहा था कि यदि यह सर नहीं होते तो मैं इंजिनीयरिंग में होता ही नहीं. मैं तो इनको कभी भी भूल नहीं पाऊंगा.

लोग ताज्जुब कर रहे थे. उनमें किसी को कादिर के इस विधा के बारे पता नहीं था. तब जिंदगी में कादिर को पहली बार लगा कि हाँ किसी के काम आने पर यदि जब वह एक्नोलेज करता है तो कितनी खुशी होती है उसे इसका एहसास हुआ और छाती फूलने लगी. कादिर को अन्यों की सहायता करने का प्रोत्साहन मिला.

बाकी सब से बधाईयों का ताँता लग गया. फिर कुछ देर यहाँ वहां की बातें हुई . खाना खाकर सब अपने अपने घोंसले को रवाना हो गए.
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शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

राजेश की डाँट

राजेश की डाँट

प्रमोद और राजेश दोनों गहरे दोस्त थे. प्रमोद छोटा था पर शादी शुदा था और राजेश बड़ा पर अनब्याहा. दोनों सोसायटी के एक ही बिल्डिंग के दो मंजिलों पर रहते थे. हालाँकि दोनों अलग अलग महकमें में काम करते थे पर कार्यस्थल साथ होने से अक्सर वे साथ ही कार्यालय जाते थे. छुट्टियों के दिन तो राजेश प्रमोद के घर ही खाता पीता था. जब कभी प्रमोद की पत्नी कुसुम मायके जाती तो दोनों साथ ही नाश्ता खाना करते. दिन तो कार्यालय में बीत जाता था.

राजेश व प्रमोद में अथाह आत्मीयता थी. उसी का असर था कि राजेश कुसुम का भी लाड़ला देवर बन गया. बहुत बनती थी तीनों में. देवर की फरमाईशें होती और भाभी जी पूरी करतीं. उल्टा भी होता था पर बहुत कम.

जब भी कुसुम मायके जाती तो अक्सर राजेश से प्रमोद की खबर लेती रहती. जब प्रमोद से बात न हो पाए या उसकी तबीयत खराब हो तो खासकर. राजेश भी कुसुम को सारी बातें बेझिझक बता दिया करता. कोई छुपन - छुपाई की बात तो थी ही नहीं. कुसुम अक्सर प्रमोद की चिंता करती रहती कि उसको सिर में दर्द हो जाता है कभी कभी. पर जब होता है तो कुछ ही देर में बात बिगड़ने लगती है और उसे उल्टियाँ तक हो जाती हैं. हमेशा डरती रहती है कि उन्हें सिर दर्द न हो और हो तो बिगड़ न जाए. 

कुसुम एक भरे पूरे परिवार से आयीं थी. पिता का कारोबार था. फर्नीचर की इंडस्ट्री थी उनकी. साथ ही एक साथ ही एक स्कूल भी चला रखा था उन्होंने – समाज सेवा के लिए. कुसुम खुद भी उसी स्कूल में पढ़ी थी, अब तो अच्छी पढ़ी लिखी थी. इसलिए जब मन करता स्कूल जाकर बच्चों को कुछ पढ़ा आती थी. आज भी जब कभी मायके जाती है तो समय निकाल कर दो दिन तो स्कूल में पढ़ा ही आती है.

एक दिन मायके में गई कुसुम ने प्रमोद से बात की तो पता चला कि उसके सर में दर्द है. वह ऑफिस में था. कुसुम डर गई कि कहीं मुसीबत न खड़ी हो जाए. तबीयत यदि ज्यादा बिगड़ी तो सँभालना मुश्किल हो सकता है. प्रमोद को ज्यादा सर दर्द से उल्टियों की शिकायत भी हो जाती थी. इसलिए कुसुम बीच - बीच में फोन से प्रमोद के संपर्क में थी. पर शाम कुछ समय बाद प्रमोद से कुसुम का संपर्क रुक गया.

प्रमोद शायद ऑफिस से निकल चुका था, पर घर नहीं पहुँचा था. इसलिए कुसुम से संपर्क हो ही नहीं सकता था. तब उन दिनों मोबाईल का चलन नहीं था. ऑफिस से, घर से या फिर किसी टेलीफोन बूथ से ही फोन हो पाता था. उधर प्रमोद को न पाकर कुसुम परेशान हुए जा रही थी. बेचैनी की हद के पार आते ही उसने राजेश को फोन लगाया. आज राजेश जल्दी घर आ गया था. उसने कुसुम से कहा आज वे साथ नहीं आए हैं और उसे प्रमोद के तबीयत की कोई खबर नहीं है. वह उनके घर जाकर देख आए तो बताए कि बात क्या है. कुसुम ने बताया कि शायद वे घर नहीं पहुँचे हैं क्योंकि घर का भी फोन नहीं उठ रहा है. उनके सर में दर्द था सुबह से, पता नहीं अब कैसा है. कहीं बढ़ न गया हो.. तब राजेश ने समझाया कि भाभी जी आप परेशान न हों. उसने कुसुम को बताया कि मैं अभी आपके घर जाकर देख आता हूँ, पता करता हूँ कि प्रमोद कहाँ है, कैसा है, किसके साथ है और खबर मिलते  ही आपको बताता हूँ.

राजेश ने जाकर देखा कि प्रमोद के मकान में ताला लगा है. ऑफिस में फोन उठ नहीं रहा था. दो एक दोस्तों से पता किया तो खबर मिली कि हाँ सर में दर्द तो था पर कोई परेशानी नहीं थी. हाँ प्रमोद डर जरूर रहा था कि बात बिगड़ने से पहले घर पहुँच जाए तो बेहतर होगा  घर जाने की राह में कुछ काम करते हुए जाने की कह रहा था प्रमोद. यही सब बातें राजेश ने फोन पर कुसुम को बता दिया.

पर कुसुम का मन विचलित था . वह मानने को तैयार नहीं थी कि अब तक प्रमोद घर नहीं आया है. सर दर्द के समय वह कहीं नहीं जाता क्योंकि उसे बढ़ने का डर होता है और यदि बढ़ गया तो वह कुछ भी करने लायक नहीं रह जाता. वह जल्दी से जल्दी घर पहुँचने की कोशिश करता है. पर आज ऐसा क्यों.

थोड़ी - थोड़ी देर में कुसुम का फोन राजेश के पास आता रहा कि जान लें ... प्रमोद आया कि नहीं... क्या खबर है... पर वही जवाब कि प्रमोद आया ही नहीं. आप चिंता न करें. आते ही मैं खबर दे दूँगा या बात करा दूँगा. इस तरह जब चार पाँच कॉल आ गए तो राजेश भी उखड़ने लगा. एक बार तो परेशान होकर कुसुम कह बैठी कि आप झूठ बोल रहे हो, बात छुपा रहे हो. उनकी तबीयत ज्यादा खराब है क्या...मैं आ जाऊं. राजेश समझाने की कोशिश करता रहा पर बात बनती नहीं लग रही थी.
जब ऐसे फोन बार - बार आने लगे तो राजेश ने एक बार कह ही दिया . भाभी जी आपने भैया कहा है तो विश्वास कीजिए. प्रमोद नहीं आया है आते ही मैं बता दूँगा. जब कुसुम नहीं ही मान रही थी तो राजेश ने बिफर कर कहा कि आप यदि विश्वास नहीं कर रही हैं तो ठीक है अब फोन न करें, मुझे भैया कहना छोड़ दें और आपके पापा से कहकर टेक्सी बुक कर लें और आ जाएँ. रात हो गई है तो क्या पापा तो टेक्सी करा ही सकते हैं. पर हाँ किसी को साथ लेकर आईए अकेले नहीं.

राजेश तो परेशान हो ही गया था. कुसुम तो परेशान थी ही. बात बिगड़ गई. शायद कुसुम को बुरा लगा. उसने फोन रख दिया. कुछ देर बाद फिर फोन आया. राजेश सिहर गया कि फोन उठाऊं या नही. वह डर रहा था कि यदि कुसुम का फोन हुआ तो क्या जवाब देगा, उसको कैसे समझाएगा. सोचते – सोचते किंकर्तव्यविमूढ़ राजेश ने फोन उठा लिया. उधर से एक पुरुष की आवाज आई. राजेश को शाँति हुई.

उन्होंने पूछा आप राजेश जी बोल रहे हैं. हाँ, सुनकर बताया कि मैं प्रमोद का ससुर बात कर रहा हूँ यानी कुसुम का पिता. दुआ सलाम पूरी होने पर उनने पूछ ही लिया ... बेटा क्या बात हुई थी कुसुम से.. कुछ परेशानी की बात है क्या... पिछली बार फोन पर बात करने के बाद से वह रो रही है, कुछ बताती ही नहीं. राजेश पहले तो डर गया पर सँभल गया और उसने पूरी बात कह दी. पापा जी ने बताया कि हमने अपने बच्चों को कभी डाँटा नहीं है, इसलिए वह ऊँची आवाज से डर गई है. ठीक है मैं उसको समझा दूँगा. पर बेटा थोड़ा खयाल करना और प्रमोद आए तो हमारी बात करवा देना.

रात 9 बजे प्रमोद घर आया. जब राजेश से मुलाकात हुई तो पता लगा कि वह तो खाना खाकर आ गया है ताकि आराम कर सके. राजेश ने फोन पर पापाजी से बात कराया और कुसुम से बात करते समय खाना खाने के लिए बाहर चला गया.

राजेश की जो हालत थी उसमें खाना तो क्या खाया जाता. उस पर प्रमोद का साथ भी नहीं था. वापस जब लौटकर राजेश प्रमोद के पास आया तो प्रमोद खिलखिला रहा था. लगता था कुसुम और पापा से बात करने पर उसका सरदर्द कम हो गया था. वह राजेश से पूछ पड़ा... अरे राजेश, तुमने कुसुम को डाँट लगा दी आज. राजेश अपनी सफाई देने लगा कि... किंतु प्रमोद ने हँसते हुए कहा कि मुझे पापाजी और कुसुम से सब पता चल गया है. ठीक है यार, कोई बार - बार फोन करे तो तुम परेशान नहीं होगे, तो क्या करोगे. कल कुसुम आ रही है उसी से बात कर लेना.

जानकारी के अनुसार दूसरे दिन शाम तक कुसुम लौट आई. शाम की चाय पर विशिष्ट चर्चा का विषय था – राजेश की डाँट. सब पेट फाड़कर हँस रहे थे. इसी खिलखिलाहट में राजेश और कुसुम के गुस्से भी
धुल गए और फिर वही पुराने रिश्ते फिर कायम हो गए. पर जब भी वे मिलते हैं, आज भी राजेश की डाँट एक विशिष्ट चर्चा का विषय रहता है.
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सोमवार, 28 नवंबर 2016

विधाता




विधाता

क्यों बदनाम करो तुम उसको,
उसने पूरी दुनियां रच दी है.
हम सबको जीवनदान दिया
हाड़ माँस से भर - भर कर.

हमने तो उनको मढ़ ही दिया
जैसा चाहा गढ़ भी दिया,
उसने तो शिकायत की ही नहीं
इस पर तो हिदायत दी ही नहीं।

हमने तो उनको 
पत्थर में भी गढ़ कर रक्खा..
उसने तो केवल रक्खा है पत्थर
कुछ इंसानों के सीने में
दिल की जगह,
इंसानों को नहीं गढ़ा ना 
पत्थर में।

सीने में पत्थर होने से बस
भावनाएं - भावुकता 
कम ही होती हैं ना,
मर तो नहीं जाती।।

मैने देखा है
मैंने जाना है,
पत्थर दिलों को भी
पिघलते हुए
पाषाणों से झरने झरते हुए
चट्टानों से फव्वारे फूटते हुए।।

क्यों बदनाम करो तुम उसको,
उसने तो दुनियां रच दी है.
हम सबको जीवनदान दिया
हाड़ माँस से भर भर कर.
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