मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.

मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल  मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.
मन दर्पण

गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

आलू- बुखारे.

आलू- बुखारे.

आलू- बुखारे.

बात कोई 30 -32 साल पहले की है. नई नई नौकरी लगी थी. दिन भर ऑफिस में काम फिर सारी शाम और रात मस्ती होती थी. 4-5 साथी हमेशा मिलकर ही खाते- घूमते थे. अक्सर शाम को बाजार में टहलते हुए कहीं हल्का फुल्का नाशेता कर लिया , तो कभी मस्त झाग वाली कॉफी पी ली. कभी मन हुआ तो बढ़िया पनीर पकौड़े खाए तो कभी किसी कोल्ड ड्रिक बार में जाकर लस्सी या कोल्ट ड्रिंक या फिर क़ोल्ड कॉफी पी ली. शाम के इन अ नियमित खुराक पर ही निर्भर करता था कि रात का खाना होगा और हाँ तो क्या?.

जिस भी दिन हम कोल्ड ड्रिंक की दुकान पर जाते थे तो बहुत मजा आता था. वहाँ अक्सर बाबूजी मिला करते थे जो उम्र में हमारे बाबूजी की उम्र के आस पास ही होंगे किंतु बातें हमारी उम्र की ही किया करते थए बहुत मिलनसार थे . लेकिन धंधे में पैसे पूरे ही चाहिए होते थे. हमें भी अच्छा लगती था.

धीरे धीरे उनसे परिचय बढ़ता गया. अब तो कभी कतभार पैसे कम पड़ जाएं तो कहते थे कोई बात नहीं ले लीजिए पैसे बाद में दे देना – कहाँ जाएगे. उनको हम पर भरोसा होने लगा था. अब हम भी कुछ निश्चिंत से होने लग गए थे.

एक बार जब बिल के पैसे दिए तो बाबूजी ने – यह कहते हुए कि बेटा खुले नहीं हैं... एक अंतर्देशीय पत्र थमा दिया. सब मेरी तरफ देखने लगे क्योंकि उस पूरे समूह में मैं ही सबसे ज्यादा पत्राचार करता था. मैंने मुस्कुराते हुए अंतर्देशीय रख लिया यही सोचकर कि खत लिखने में काम आ जाएगा.

अब बाबूजी के लिए आसान हो गया था . जब भी खुले पैसे ( चिल्हर) नहीं होते थे तो वे हमें अंतर्देशीय दे देते . अब धीरे धीरे उनकी संख्या में वृद्धि होने लगी. एक हद के बाद ऐसा हो गया कि दस रुपए तक के पैसे मिलते थे बाकी अंतर्देशीय. हाँ अब वे कार्ड, लिफाफे भी देने लगे थे.

एक हद तक तो यह सब चलता रहा किसी ने आनाकानी भी नहीं की. मैंने भी अपना स्टाक बना लिया.अब इस डाक घर  के स्टेशनरी को सँभालना मुश्किल होने लगा था. धीरे धीरे सभी बाबूजी से इसीलिए परेशान होने लगे कि लिपाफे का किया क्या जाए। हम सभी की एक ही तकलीफ थी सो मिल कर इसका हल ढूंढने लगे. एख साथी को तरकीब सूझी.

उस शाम हमने आलू बुखारा खरीदा और रोज की तरह खाते खाते टहलने का विचार था. जैसे ही दो लोगों ने चखा – बोले यार खट्टे हैं वापस कर दो. जिसने खरीदा था वह सहसा बोल पड़ा. अरे यार रहने दो काम आ जाएंगे. सभी बहस करने लगे , अरे खट्टे हैं क्या काम आएँगे. उसने कहा यार बात मान भी लिया करो पैसे तो मैंने ही दिए हैं ना. कुछ और लेना हो तो ले लो.
अब सब चुप हो गए. लेकिन समझ में किसी को भी नहीं आया कि उसने वापस करने के लिए मना क्यों किया. खाया तो उससे भी नहीं जा रहा था..

रोजनामचे की तरह हमारा चबेना पूरा होते ही हम कोल्ड ड्रिंक स्टोर पहुँचे. आज जो लीड कर रहा था जिसने आलू बुखारा खरीदा था वह गल्ले के सबसे पास बैठा था. सब ने अपनी अपनी पस,द अनुसार ऑर्डर दिया और लग गए गप्प लड़ाने . किसी को बीती बातों का खयाल न रहा. करीब 40 मिनट बाद जब खड़े हुए तो हमारा लाड़र लपक कर सेठ के पास गया. हमेशा की तरह बाबूजी वहाँ विराजमान थे, उसने पूछा बाबूजी बिल कितना हुआ. बाबूजी अपने तैश में बोल पड़े बेचा 117 रुपए. लीडर ने पर्स खोला बाबूजी को सौ रुपए का नोट दिया . फिर एक दस रुपए का नोट दिया . फिर आराम से उसने पर्स बंद कर जेब में ऱखा. और दूसरे हाथ के आलू- बुखारे बाबूजी की तरफ बढ़ा दिए - बोला, ये सात रुपए के हैं.

बाबूजी घबराए और बोले – यह क्या. जवाब मिला – आलू बुखारे. बाबूजी बोल पड़े  मैं इनका क्या करूँगा.. जवाब – खा लीजिएगा. मैं तो ये खाता नहीं.
तो घर में बच्चों को खिलाइएगा.

अरे भई , घर में तो खी तरह के फलस भरे पढ़े हैं इनको कौन खाएगा.
तब तक बात चरम तक पहुँच चुकी थी. लीडरस को शायद इसी वक्त का इंतजार था. उसने तपाक से जवाब दिया .. यही तो बबूजी हम आपको हर दिन समझाने की कोशिश करते थए कि हम सबके घर में पोस्टल स्टेशनरी भर गई है. चिट्ठियाँ लिखने के बावजूद भी भंडार हो गया है लेकिन आप हो कि मानते ही नहीं रोजाना अंतर्देशीय दे देते हो जबरन. इसीलिए हमें आज आपके लिए आलूबुखारा लाना पड़ा.

बाबूजी सहित सारे साथी अचानक ही सीरियस मूड़ से निकल कर खिलखिलाकर हँस पड़े. बाबूजी ने आलूबुखारे नहीं लौटाए. हाँ अगले दिन से लिपाफे देना जरूर बंद कर दिया.
उसके बाद कुछ दूकानों में पोस्टल स्टेंप देने का दौर चला. अब बच्चों को लुभाने के लिए टॉफियाँ दी जाती हैं . जब भी किसी दुकान पर मुझे खुले की जगह टॉफी दी जाती है तब तुरंत ही मुझे इस घटना की याद आती है और मैं टॉफी दुकानदार के बचिचे को देने के लिए कहकर उसे वहीं छोड़ जाता हूँ.