मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.

मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल  मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.
मन दर्पण

रविवार, 10 दिसंबर 2017

एकाकी पंछी.

मेरे परिचित शिक्षिका श्रीमती मीना शर्मा जी की एक कविता प्रस्तुत है :

एकाकी पंछी
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जहाँ सूर्य डूबा, बसेरा वहीं !
खुले दृग जहाँ पर, सबेरा वहीं !

मैं एकाकी पंछी, विलग यूथ से
ना झंझा की चिंता, ना डर धूप से !
बहारों से मैं क्यों करूँ याचना,
कुंजों में मेरा तो डेरा नहीं !
खुले दृग जहाँ पर सबेरा वहीं !

मेरा प्यार सूखे से तरुओं की खातिर,
खिलें नन्हीं कलियाँ, मेरी जान हाजिर !
नहीं कोई सरहद, ना अपना पराया
आसमां कौन सा, जो कि मेरा नहीं !
खुले दृग जहाँ पर सबेरा वहीं !

है पंखों में ताकत औ' खुद पे यकीं,
जहाँ मन लगे मेरी मंजिल वहीं !
सितारे चुरा लूँ, कि वह चाँद पा लूँ
कोई स्वप्न ऐसा उकेरा नहीं !
खुले दृग जहाँ पर सबेरा वहीं !

जहाँ सूर्य डूबा, बसेरा वहीं !
खुले दृग जहाँ पर, सबेरा वहीं !
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श्रीमती मीना शर्मा

सोमवार, 13 नवंबर 2017

संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षापरिषद और वीटो.


संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षापरिषद और वीटो.

अभी पूरे विश्व की नजर उत्तरी कोरिया पर है. कब वह खुराफात करे और भयंकर अंजाम हो जाएं, यह कोई नहीं जानता. खासकर उसकी नजर संयुक्त राष्ट्र अमेरिका पर है और उधर अमेरिका की पैनी नजर उत्तरी कोरिया पर.

इस उत्तरी कोरिया ने हाल के, आई सी बी एम, परमाणु  और हाइड्रोजन बम के परीक्षण से खासकर अमेरिका और साधारणतः सारे विश्व में दहशत फैला दिया है.
अब बात आती है कि उत्तरी कोरिया को यह क्या सूझी कि वह अमेरिका से भिड़ जाए.

ये अमेरिका ही नहीं बल्कि सुरक्षा परिषद के जो पाँचों स्थिर सदस्य वीटो पावर (चाईना, फ्राँस, रशियन फेडेरेशन, युनाईटेड किंगडम और युनाईटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका) हैं उन सबकी एक ही हालत है. सबका एकमत है कि दुनियाँ में भले कुछ हो जाए कोई देश, ताकत हम तक न पहुँचे. इस मामले में ये पाँचों एकजुट हैं भले ही अंदर दूसरे मतभेद होंगे. हो सकता है उनमें ऐसा कोई गोपनीय करार भी हो. जब से सुरक्षा समिति बनी है ये सब एक मत हैं.

याद कीजिए जब भारत ने पोखरण में परमाणु विस्फोट किया था. यही हाल था इन सबका. सारे विश्व को भड़काने में लगे थे. पर खोदा पहाड़ निकली चुहिया , वह भी मरी हुई. उधर जब ईरान ने परमाणु संयत्र लगाए और यूरेनियम जुटाना शुरु किया तो फिर अमेरिका को तकलीफ हुई.

ये सारे वीटो वाले देश तो अपने पास भरमार परमाणु बम (अस्त्र) बना कर सँजो रखे हैं किंतु अन्यों को परमाणु अस्त्र बनाने से रोकते हैं. यह दादागिरि नहीं तो क्या है. ये पहले अपने अस्त्र खत्म क्यों नहीं करते ? ऐसा करने से विश्व के देशों को विश्वास हो जाएगा कि ये वीटो देश सही में विश्व शाँति के हित में कार्य कर रहे हैं. अन्यथा ऐसा लगने लगा है कि ये अपने को सर्वशक्तिमान कहाने के लिए ही ऐसा कर रहे हैं.

यदि ऐसा है तो विद्रोह निश्चित है. कल भारत ने किया , फिर ईरान ने, अब उत्तरी कोरिया कर रहा है. कल कोई और करेगा. इन वीटो धारियों का यही रवैया रहा तो कोई सिरफिरा नेता किसी दिन जरूर परमाणु अस्त्र का प्रयोग कर देगा जो तीसरा विश्वयुद्ध साबित होगा और उसके प्रणेता ये वीटोधारी ही कहलाएंगे.

पता नहीं जापान और जर्मनी इन वीटो पावर वाले देशों के रवैये पर चुप क्यों हैं. उनके पास भी पर्याप्त शक्ति है. अमेरिका तो काफी हद तक पोलेंड और जापान से निर्यातित वस्तुओं पर निर्भर है. क्या पता उनमें भी कोई आपसी संधि हुई हो.

पिछले किछ वर्षों से भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ के  सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की कोशिश में लगा है. बात यहाँ तक आ गई कि सुरक्षा परिषद की सदस्यता तो दी जाएगी पर बिना वीटो के. अब इससे ही अंदाज लगा लीजिए कि ये वीटो वाले देश किस तरह से गुटबाजी पर उतर आए हैं. इनके लिए उत्तरी कोरिया के किम ही सही समाधान हैं.

अब समय आ गया है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वाधान में ही वीटो हटाने का कोई प्रस्ताव पारित हो और इन सब वीटोधारियों को भी सामान्य देशों की फेहरिस्त में लाया जाए.

यदि अब भी अमेरिका अपने आपको महाशक्ति मानकर दुनियाँ में गुंडागर्दी की ठेकेदारी करेगा तो किसी दिन वह किसी सिरफिरे को भड़काकर तीसरे विश्वयुद्ध का कारक बनेगा और वह होगा दुनियाँ के तबाही का कारण.
...... 

मंगलवार, 7 नवंबर 2017

आँखों देखी.



आज दिन में एक वाट्सप फ्रेंड ने यह आँखों देखी खबर भेजा.
आप सब के रसास्वादन हेतु प्रस्तुत है...

आँखों देखी

    एक चिड़ा लगातार कोशिश कर रहा है 
    अपने बच्चे को उड़ना सिखाने की                       
    मैं हैरान हूँ देखकर कि किस तरह
    वह  कुछ कहकर जा रहा है                
    अपने बच्चे से....                       
    और आज्ञाकारी बच्चा 
    वहीं बैठा रहता है
    पिता के आने तक                       
    चूँ भी नहीं करता                       
    
    पिता चोंच में दाना लेकर लौटता है
    बच्चा बुरी तरह पंख फड़फड़ाकर 
    अपनी खुशी जाहिर करता है                       
    पिता चोंच में दाना देता है                       
    खिलाने के बाद 
    जाली से चोंच रगड़कर 
    दिखाता है कि ऐसे करो                       
    
    बच्चा अनुकरण करता है                       

    (आपने चिड़ा लिखा
    पता है कि वह चिडिया नहीं है..?
    जमाना तो उल्टा है. 
    कोई कहानी बन रही है
    या कविता...)
                 
    
    और हाँ, वह चिड़िया नहीं है
    चिड़ा ही है                      
    चिड़ा गहरे रंग का होता है
    गले के नीचे काला धब्बा होता है                            

    फिर पिता बच्चे को 
    पंख फड़फड़ाकर उड़ना सिखाता है 
                                     
    बच्चा कोशिश करता है
    गिरने को होता है                       
    पिता की ओर लपकता है 
    सहारे के लिए
    लेकिन पिता 
    पास आकर थामता नहीं                       
    उलटे और दूर सरक जाता है                       
    
    अब पिता बच्चे की ओर मुँह घुमाकर
    कुछ हल्की चूँ चूँ करके
    मानो कुछ समझा रहा या डाँट रहा है। 
    फिर वहाँ से उड़ जाता है 
    जरा नीचे के छज्जे पर जाकर बैठता है                       

    अब बच्चा क्या करे ?                       
    
    मजबूर होकर पंख फड़फड़ाता है 
    और 
    अपनी उड़ान भरकर पिता के पास !                       
    खुशी के मारे चिड़ा चहचहाए जा रहा है....                       

    काश हम इंसान भी ऐसा कर पाते !                        
    
    अभी भी दोनों बालकनी में ही हैं

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सोमवार, 30 अक्तूबर 2017

डिजिटल इंडिया - मेरा अनुभव.

डिजिटल इंडिया – मेरा अनुभव.

उस दिन मेरे मोबाईल पर फ्लेश आया. यदि आप जिओ का सिम घर बैठे पाना चाहते हैं तो यहाँ क्लिक करें. मैंने क्लिक कर दिया. मुझे अपना नाम पता, आधार नंबर देने को कहा गया. मैंने दे दिया. फिर मुझसे पूछा गया कि आप जिओ सिम कब और कहाँ चाहते हैं. पता और समय देने पर बताया गया कि उस वक्त दिए हुए स्थान पर, मैं अपने आधार कार्ड के साथ मौजूद रहूं.

समय से आधे घंटे पूर्व फोन आया. फोन करने वाले ने बताया कि वह जिओ से बात कर रहा है और मुझे सिम देना चाहता है. मैंने बताया कि मेरे पास आधार कार्ड है, पर मैं अपने पते पर नहीं हूँ. हाँ पास में ही हूँ. उसने मेरा पता माँगा और 20 मिनट में उस पते पर पहुँच गया.

उसने मेरा आधारकार्ड माँगा नंबर नोट किया, उसका फोटो लिया और एक फिंगरप्रिंट लिया, जिससे मेरे फोन पर एक ओटीपी नंबर आया. उसने उसे कहीं भरा और हस्ताक्षर करवा कर सिम कार्ड देकर चला गया. मोबाईल पर मेसेज आया कि आपका आधार नंबर वेरिफाई हो गया है.

पूरी कार्रवाई में ज्यादा से ज्यादा कोई कहिए आधा घंटा लगा होगा.
.....

कुछ दिन बाद मेरे एक दोस्त का फोन आया मुंबई से और उन्होंने बताया कि जीवन प्रमाण के एवज में उनको तीन महीने से पेंशन नहीं मिल रही है. तब मुझे लगा कि मुझे खुद का भी देख लेना चाहिए. जाँच में पता चला कि मई 17 के बाद की पेंशन राशि आई ही नहीं. हालाँकि राशि कोई दो हजार रुपए प्रतिमाह है, पर वह भी नहीं आई.

तब जाग आई. बैंक से बात किया तो वहाँ से जवाब मिला सर आपका लाईफ सर्टिफिकेट नहीं भेजा होगा. मैंने उन्हें याद दिलाया कि भेजा था , आपसे बात भी हुई थी. आपने आधार की कापी माँगी थी, वह भी भेजा था. तब बोले ओह आपका तो किसी राजपत्रित अधिकारी के हस्ताक्षर से आया था ना. मुझे लगा मामला अब सुलझ गया, लेकिन नहीं. मुझे बताया गया कि मई 2017 के बाद डिजिटल लाईफ सर्टिफिकेट ही मान्य होंगे. ये है डिजिटल इंडिया का पहला स्वाद. न कोई मेल , न कोई संदेश, न कोई पत्र - बस पेंशन बंद करके बैठ गए. जिसको तकलीफ होगी हाथ पैर मारेगा.

उनके एक ग्लोबल कमाँड से सारे पेंशनरों को मेल चला जाता कि मई से पहले पहले सबको फिर से डिजिटल सर्टिफिकेट देना है या फिर उसे अगले सत्र से लागू करते. इस डिजिटाइजेशन का क्या फायदा ? पर सरकार है हक है करो परेशान!!!  बूढ़े हैं तो क्या हुआ? जरूरत है तो दौड़ेंगे.

चलें आगे बढ़ें. बैंक वालों से विनती करके मैंने पी एफ कार्यालय के नंबर लिए. मेरी एक अलग मुसीबत भी यह है कि मैं रहता हैदराबाद हूँ, पर मेरा पेँशन खाता छत्तीसगढ़, कोरबा में है. मुझे बिलासपुर और रायपुर कार्यालय के नंबर मिले. रायपुर में किसी ने फोन नहीं उठाया, पर बिलासपुर से जवाब मिला. उनका कहना था कि मुझे रायपुर या बिलासपुर जाकर वहाँ व्यक्तिगत तौर पर फिंगरप्रिंट देकर जीवन प्रमाण देना होगा. मैंने सोचा, 2000 रु मासिक के लिए 6000 खर्च कर रायपुर/ बिलासपुर जाऊँ.

मैंने बात आगे बढ़ाया. जनाब इस डिजिटल इंडिया के जमाने में भी क्या वहाँ जाना ही पड़ेगा?  मैं हैदराबाद में रहता हूँ, यहाँ भी तो कोई ईपीएफओ का दफ्तर होगा. तब फिर उन्होंने सलाह दिया कि आप अपना पेशन पेमेंट अथॉरिटी, आधारकार्ड और पेंशन वाले बैंक का पास बुक (प्रथम पृष्ठ सहित) लेकर हैदराबाद के क्षेत्रीय कार्यालय में जाएं तो वहां से यह काम हो सकता है. 
चलिए मैं ईपीएफओ के क्षेत्रीय कार्यालय पहुँचा. एक कमरे में दो लिपिक बैठे हैं और वे ही लोगों का जीवन प्रमाण तय कर रहे हैं. कमरे में कोई 100-150 लोग बैठे होंगे. 52 नंबर का टोकन चल रहा था. मेरा टोकन नंबर 95 था. बात साफ थी कि 3 घंटे पहले तो नंबर आने का कोई मतलब ही नहीं इस बीच लंच ब्रेक भी होना था. मैं 11 बजे पहुंचा था और मेरा नंबर 3 बजे आया. खाना तो गया. तब तक कैंटीन भी सूख गई थी.

वहाँ मैंने पता किया कि पूरे हैदराबाद-सिकंदराबाद जुड़वाँ शहर में क्या और कोई जगह है जहाँ यह काम हो सकता है ? तो जवाब मिला नहीं, यहीं आना होगा. पूरे शहर व आस पास के इलाकों से बुजुर्ग जिनकी कमर पूरे धरातल तक झुक गई है, वहाँ आकर बैठे हैं. किसी को उम्र का लिहाज भी नहीं. 61 साल का व्यक्ति और 90 साल की बूढ़ी दोनों एक ही कतार में हैं. कोई रियायत या सुनवाई नहीं.

उस पर वहाँ जो सुनने मिला वह तो और भी हैरान करने वाली बात थी. लोग स्टेट बैंक एवं अन्य बैंकों से जीवन प्रमाणपत्र लेकर आए थे. उनका कहना था कि वे दो बार जीवन प्रमाणन कराकर जा चुके हैं, पर पेंशन न हीं आई इसलिए फिर आए हैं.

70-75 साल की आयु के इन लोगों (वहाँ 85 साल तक के लोग थे कमर झुकी हुई) की ऐसी हालत पर तरस आता है.
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अब आईए मुद्दे पर.

जब इंडिया डिजिटल नहीं हुआ था तब जो लोग अपने पेंशन वाले बैंक ब्राँच में जा सकते थे, वे वहाँ जाकर जीवन प्रामाण बैंक अधिकारी को दे आते थे. जो दूसरी जगह होते थे वे किसी राजपत्रित अधिकारी या बैंक मेनेजर से अपने हस्ताक्षर प्रमाणित कर उस प्रमाणपत्र को पेंशन वाली बैंक शाखा में भेजते थे और पेंशन लग जाती थी.

अब इंडिया डिजिटल हो गया है. तो कोई प्रमाणपत्र मान्य नहीं है. उम्र हालत कुछ भी हो जीवलन प्रमाणन के लिए ईपीएफओ कार्यालय जाकर ही फिंगरप्रिंट देना है. जो हैदराबाद जैसे वृहत जुड़वाँ शहर में भी एक ही है. जिसकी हालत का ऊपर जिक्र है.

जनता समझे कि इस तरह कि डिजिटल इंडिया से किसका भला हुआ.
जो लोग इससे संबंधित हैं उन्हें चाहिए कि इसका जायजा लें और कम से कम पुरानी सुविधा को तब तक बहाल रखें जब तक नई डिजिटल इंडिया की प्रणाली खुदपूर्णतः प्रमाणित नहीं हो जाती.
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जिओ वाला सिम देने के लिए आधे घँटे में घर आकर आधार से प्रमाणन कर लेता है, पर सरकार के बाशिंदे पेंशन के लिए इस तरह परेशान हो रहे हैं या कहूं किए जा रहे हैं.
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भला हो उस चंद्रबाबू नायडू का जिसने संयुक्त आँध्र में डिजिटीजेशन किया. हाईटेक सिटी दी. जगह जगह ई सेवा , मी सेवा (आपकी सेवा) केंद्र खुलवाए जहाँ से आधार कार्ड, राशन कार्ड, पेन कार्ड बनवाए जा सकते हैं, बदलाव करवाए जा सकते हैं . बिजली पानी के बिल हाउसटेक्स भर सकते हैं. जाति प्रमाणपत्र पा सकते हैं. इस सरकार को चाहिए कि कम से कम यहाँ पेंशन के लिए जीवन प्रमाण को भी इस संस्था से जोड़ दे ताकि लोग अपने नजदीकी कार्यालय में जाकर जीवन प्रमाण दे सकें.

अच्छा हो अन्य राज्यों की सरकारें इसकी अनुकृति कर लें ताकि बुजुर्गों को उचित सुविधा मिल सके.
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गुरुवार, 26 अक्तूबर 2017

राष्ट्र गान का आदर




राष्ट्र गान का आदर

हाल ही में एक खबर पढ़ने को मिली सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने न्याय पर पुनर्विचार कर सरकार को निर्णय लेने को कहा है कि राष्ट्रगान को सिनेमा हाल में बजाने के बारे कोई ठोस निर्णय ले.

इस बारे में पहले आए न्याय के समय मैंने अपनी राय दी थी . जब अब सर्वोच्च न्यायालय ने भी कह दिया तो सरकार उन मुदेदों के साथ इन पर भी विचार कर ले.
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बेंगलूरु में एक सिनेमा हॉल में चार लोगों को अन्य दर्शकों ने हॉल के बाहर खदेड़ दिया क्योंकि वे चारों राष्ट्र - गान बजने के समय खड़े नहीं हुए. बात तो साफ है कि राष्ट्र - गान का हर भारतीय को आदर करना चाहिए. उसका आदर न करना देश से प्रेम न दर्शाने के समतुल्य है.


बाद में तहकीकात पर बताया गया कि उनमें से एक व्यक्ति के घुटनों में तकलीफ थी. माना कि उनकी बात में सचाई है फिर भी वह व्यक्ति तो सिनेमा हॉल के भीतर तक तो बैठे - बैठे नहीं आया होगा. बाकी तीनों के पास क्या जवाब था इसके बारे में कहीं कोई चर्चा नहीं है.

राष्ट्रीय गान केवल 52 सेकंड का होता है, एक मिनट से भी कम का. जो व्यक्ति पार्किंग से सिनेमा हॉल की सीट तक चल कर आ सकता है वह एक मिनट से भी कम के राष्ट्रीय गान के लिए खड़ा नहीं हो सका, अजब बात है. चलो हालातों के दायरे में यदि उसे बख्शा भी गया तो बाकी तीनों क्यों नहीं खड़े हुएयह एक भारी भरकम सवाल है.

मुझे याद आ रहा है कि पहले भी कम से कम एक बार तो यह मुद्दा उठा था. तब भी सिनेमा हॉल में ही राष्ट्रीय गान के निरादर की बात थी. उन दिनों सिनेमा के अंत में राष्ट्रीय गान बजाया जाता था. बाहर निकलने की भागमभाग वाली भीड़ में परेशानी तो थी ही. जवान छोकरे उस भीड़ में युवतियों के साथ बदतमीजी भी करते थे. इस भीड़ की तकलीफ से बचने के लिए, खास कर जो लोग इसे दूसरी या ज्यादा बार देख रहे हों, सिनेमा खत्म होते ही या कुछ लोग सिनेमा खत्म होने के पहले ही उठ कर चलने लगते थे कि भीड़ में फंसने से बच जाएं और उसी समय में राष्ट्र गान बजने लगता था. लोग भीड़ से बचने के लिए सीधे गेट की तरफ चले जाते थे. जब कुछ सहृदयों ने इस पर सवाल उठाया तो सिनेमा हॉल में राष्ट्र गान बजाना बंद कर दिया गया. न जाने कब फिर यह शुरु हो गया और फिर वही हालात उभरने लगे. बस फर्क इतना है कि पहले राष्ट्र गान सिनेमा के बाद बजता था, अब पहले बज रहा है.

राष्ट्र गान चाहे कभी भी बजे, भारतीयों को और भारत में रह रहे विदेशी या पर्यटकों को, खड़े होकर उसका आदर करना ही चाहिए. आजकल तो स्कूलों में भी सुबह सुबह राष्ट्र गान गाया जाता है. हर गली मोहल्ले में स्कूल खुल गए हैं. रिहाईशी इलाकों में भी लोग घरों में स्कूल खोल चुके हैं. इससे घर के हर कोने में राष्ट्र गान सुनाई देता है. यह एक मुसीबत की जड़ सी हो गई है. घर में आदमी कहीं भी हो उसे खड़ा तो होना चाहिए, किंतु घरों में ऐसे कोने भी होते हैं जहाँ बैठा हुआ आदमी खड़ा हो नहीं सकता. उसकी मजबूरी दोनों तरफ हो जाती है.

यह राष्ट्र गान की बेइज्जती नहीं बल्कि गलत तरीके सा राष्ट्र गान बजाने के दायरे में आना चाहिए.


अधिकारियों को चाहिए कि इस तरफ भी ध्यान दें और राष्ट्रगान को गलत तरीके से बजाने पर कुछ पाबंदियों का प्रावधान किया जाना चाहिए. वैसे सिनेमा हॉल में भी लोग मौज मस्ती की मानसिकता से आते हैं. इसलिए मेरी राय होगी कि सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान बजाने पर पाबंदी लगा दी जाए. लेकिन जब तक यह पाबंदी नहीं होती और राष्ट्रगान बजाया जाता है तो हरेक भारतीय को और यहाँ पर रह रहे या आए विदेशियों और पर्यटकों को हमारे राष्ट्रगान का आदर करना चाहिए. हमारे देश में तो राष्ट्रगान पर भी विवाद खड़े किए गए हैं लेकिन आज तक तो यह राष्ट्रगान है.

आज कल तो लोगों में फेशन सा चल पड़ा है कि कोई भी गाना, भजन, वैदिक श्लोक, यहाँ तक कि गायत्री मंत्र व महा मृत्युंजय मंत्र को भी चौपहिया वाहनों के रिवर्सिंग हॉर्न सा लगा लेते हैं. जय जगदीश हरे का भजन रिवर्सिंग हॉर्न के रूप में कितना गंदा लगता है. भगवान ना करे कि कोई इसी लय में कभी राष्ट्रगान का भी प्रयोग करे. यदि अधिकारी इस पर ध्यान न दें तो ऐसी गंभीर समस्या भी सामने आ सकती है.

मेरा विनम्र निवेदन होगा कि सरकार इस विषय पर गंभीरता से सोचे विचारे और राष्ट्रगान के अनादर व दुरुपयोग पर आवश्यक पाबंदी लगाए.
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रविवार, 22 अक्तूबर 2017

साजन के गाँव में.

साजन के गाँव में.


आज मत रोको मुझे,
साजन के गाँव में,
सुनो मेरी छम छम,
बिन पायल के पाँव में.

आलता मँगाऊँगी मैं,
मेंहदी  रचाऊँगी मैं,
सासु, ननदों को भी,
मेंहदी लगाऊँगी मैं.

झूला झूलेंगे 
मिलकर सावन में
नाचत हमें मोर मिलें
कितने कानन में
मिल जुल कर मजे करें,
पीपल की छाँव में,
सुनो मेरी छम छम,
बिन पायल के पाँव में.

देवर, जेठ भी अपने होंगे,
साकार ननद के सपने होंगे.
रंग-बिरंगी कलाइयाँ होंगी,
इक दूजे की बलाइयाँ लेंगी

सबका साथ निभाऊँगी मैं
सबका प्यार कमाऊँगी मैं,
सास ससुर की होगी सेवा,
मेरी ही बस होगी मेवा.
महावर लगाऊँगी मैं,
भौजाई के पाँव में
सुनो मेरी छम छम 
बिन पायल के पाँव में।
...

रविवार, 15 अक्तूबर 2017

धड़कन




धड़कन

संग है तुम्हारा आजन्म,
या कहें संग है हमारा आजन्म.

छोड़ दे संग परछाईं जहाँ,
उस घनेरी रात में भी,
गर तुम नहीं हो साथ, 
तो जिंदगी का खेल 
समाप्त  !!!!!

क्यों लगी हो होड़ करने,
समय से तुम अकेली ?

और भी तुझको मिलेंगे,
चाँद तारे और धरती,
और संग संग इस धरा के,
चल रहा हूँ मैं भी लेकिन,
तुम मुझमें भी बसी हो.

.....


सोमवार, 2 अक्तूबर 2017

ये कैसा दशहरा

                           ये कैसा दशहरा

आज मेरे देश में 
ये क्या हो रहा है.
दहशत भरी है हवा में,
डर लग रहा है, 
कहीं इस  देश में
इस दशहरा में रावण की जगह,
राम तो नहीं जल रहा है.


पता नहीं कबसे,
हर दशहरे रावण जल रहा है,
पर आज देश में 
लंकेश का 
राज चल रहा है.
होलिका दहन की जगह 
शायद सीता दहन हो रहा है.


उठो नागरिक, 
अब बनो राम
दो दश-आनन को ज्ञान दान, 
शर चाप सँभालो फिर से तुम, 
दस आनन धड़ छोड़ गिरें
राक्षस सेना बेहोश मरे, 
फिर रामराज्य आ जाए यहाँ,
रावण कहीं भी जाए समा. 
दानव को वीर गति दे दो
भारत को फिर से मति दे दो.

शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

मेरा जिन्न



मेरा जिन्न




                   कल सुबह अचानक ही मेरी मौत हो गई.
               मैं लाश लिए काँधे किसी दर निकल पड़ा,
               सब राहगीर देखते ही सकपका गए,
               फिर हँस पड़े और "वो पागल है" कह गए.

              चलता रहा मैं राह अपनी सब को भूलकर,
              बिन दाना बिन पानी सड़को की धूप पर
              कोई छाँव दिख गया तो किसी पेड़ पर रुका,
              बस आँख जब थकी तो धरती प ही  झुका

              कब तक मैं फिर सकूंगॉ, ढो ढो के लाश को,
              काँधों में नहीं जान बची और ढ़ो सकूँ.
              सड़ने लगेगी लाश अब कुछ ही समय में बस,
              यह सोच इसे आज मैं दफना के आ गया.

              कल राह जो लौटूँ तो ना समझना कि मैं ही हूँ,
              मैं तो दफन ही हो गया, वो जिन्न है मेरा,
              कुछ देर दिखेगा फिर वो हो जाएगा गायब,
              ना जाने कहाँ किसको कब नजर आएगा.
                    .....

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

हिंदी दिवस 2017 विशेष - हमारी राष्ट्रभाषा




हमारी राष्ट्रभाषा.

परतंत्रता की सदियों मे स्वतंत्रता आंदोलन में लोगों को एक जुट करने के लिए राष्ट्रभाषा शब्द का शायद प्रथम प्रयोग हुआ.

गाँधी जी खुद मानते और चाहते थे कि राष्ट्र को एक भाषा में पिरोने के लिए केवल हिंदुस्तानी ही सक्षम है और हिंदुस्तानी को ही राष्ट्रभाषा  बनाया जाना चाहिए. अन्यों का समर्थन न पाने पर बीसवीं सदी के दूसरे दशक में ही गाँधी जी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करने के सभी इंतजामात कर लिए थे. इसकी पूरी रूपरेखा तैयार कर ली गई थी. लेकिन काँग्रेस में रहे नेताओं के अलावा अन्यों ने इसका समर्थन नहीं किया. उन्हें लगता था कि  भारत की सभी भाषाएं समान रूप से राष्ट्रभाषा बनने की अधिकारिणी हैं, खासकर तमिल, तेलुगु, मराठी और बंगाली जो साहित्य-संपन्न हैं. ऐसा तर्क दिया गया कि तेलुगु व तमिल भाषाएं तो हिंदी की अपेक्षाकृत ज्यादा पुरानी भी हैं. दक्षिण भारतीयों का मानना था कि हिंदी के राष्ट्रभाषा बनने से हिंदी मातृभाषी लोगों को स्वाभाविकतः फायदा हो जाएगा तथा राजनीति के अलावा भी अन्य क्षेत्रों में हिंदी भाषी बाजी मार ले जाएंगे.

इस समय जो हालात बने उससे लगता है कि हिंदी को काँग्रेस का मोहरा मान लिया गया और राजनीतिक रंग चढ़ने के कारण आज राष्ट्रभाषा तो क्या हिंदी राजभाषा भी सही तरह से नहीं बन सकी.

इन सब कारणो से अहिंदी भाषियों ने, हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की मुहिम को, उन पर हिंदी थोपी जाने के रूप में देखा. इस खींचातानी के दौर में राष्ट्रभाषा शब्द के कई मतलब निकाल लिए गए. स्पष्ट ही नहीं होता कि कौन इस शब्द का किस मतलब से प्रयोग कर रहा है. प्रमुखतः  राष्ट्रभाषा के अर्थ बने


1        राष्ट्र में सबसे ज्यादा प्रयुक्त होने वाली भाषा.
2        राष्ट्र में प्रयुक्त होने वाली एक (प्रमुख) भाषा.
3        राष्ट्र के प्रतीक चिह्न के रूप में राष्ट्रभाषा.

अलग - अलग लोगों ने अलग - अलग समय में इस शब्द का अलग - अलग अर्थों में प्रयोग किया. जिसका नतीजा यह हुआ कि लोग समझने लगे कि हिंदी भाषी खुद इस बात से भली - भाँति अवगत नहीं हैं कि राष्ट्रभाषा व राजभाषा में क्या भिनन्ता है.

महात्मा गाँधी ने राष्ट्रभाषा के लिए निम्न आवश्यक गुणों का होना जरूरी बताया था

1.  सीखने में आसानी.
2.  राजनीतिक, धार्मिक व आर्थिक-वाणिज्यिक व्याख्यानों को लिए उपयोगी.
3.  ज्य़ादातर नागरिकों की भाषा हो.
4.  यह एक निश्चित अवधि के लिए न होकर हमेशा के लिए हो.

इन सिद्दान्तों के आधार पर गाँधी जी की नजर में हिंदुस्तानी राष्ट्रभाषा के लिए सबसे उचित लगी. गाँधीजी ने अंत तक राष्ट्रभाषा के लिए हिंदी का नहीं बल्कि हिंदुस्तानी का ही साथ दिया. उनका कहना था कि हिंदुस्तानी - हिंदुओं एवं मुसलमानों दोनों को साथ लेकर चलने का सामर्थ्य रखती है. लेकिन काँग्रेस के नेता केवल हिंदी चाहते थे. आज ऐसा लगता है कि यदि हिंदुस्तानी को राष्ट्रभाषा बनाने पर जोर होता, तो देश में बसे उत्तर व दक्षिण के मुसलमान भी साथ आते और राष्ट्रभाषा-राजभाषा  का पथ आज जैसै पथरीला नहीं होता.

कईयों ने तर्क दिया कि संस्कृत भाषा, हिंदी भाषी व तमिल भाषी दोनों निकायों को मान्य राष्ट्रभाषा होगी. पर इसमें मुश्किल यह थी कि यह दोनों निकायों के सदस्यों द्वारा बोली नहीं जा सकेगी. अंततः यह राष्ट्र के प्रतीक भाषा का रूप धारण कर जाएगी. राष्ट्रभाषा के लिए यह तो ठीक है पर राजभाषा के लिए यह अनुचित है. राष्ट्रभाषा का यह सुझाव हिंदी भाषियों को खास कर रास नहीं आया क्योंकि राष्ट्रभाषा के आड़ में वे हिंदी को राजभाषा भी बनाना चाहते थे या फिर उन्हें राष्ट्रभाषा व राजभाषा की भिन्नता का ज्ञान ही नहीं था. हालाँकि वे हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात करते थे, किंतु राजभाषा बनाना चाहते थे.

स्वतंत्रता के बाद जब गाँधीजी ही नहीं रहे, तब हिंदुस्तानी का कोई पैरवीकार ही नहीं बचा. सब हिंदी के पक्षधर बचे. उर्दू होड़ से बाहर ही हो गई. बस हिंदी थी और अपने ही घर की तमिल. संविधान की भाषा समिति ने भी राष्ट्रभाषा शब्द के प्रयोग से परहेज किया और राजभाषा के रूप में एक नया शब्द ईजाद किया. इसका उनने भारत देश की राजकाज की भाषा के रूप में तात्पर्य दिया.

राजभाषा सचिवालय की पत्रिका राजभाषा भारती के एक अंक के अनुसार भाषा समिति के अंतिम निर्णय के समय तमिल व हिंदी के बीच टकराव हुआ और हिंदी नेहरूजी के अध्यक्षीय मत से विजयी हो गई. तब से हिंदी के प्रति तमिल भाषियों का विरोध जारी है. कालांतर में वह राजनीतिक रूप धारण कर गया जो अभी भी हावी है. सावधानीपूर्वक देश की अन्य प्रमुख भाषाओं को संविधान के अष्टम अनुच्छेद में एकत्रित कर उन्हें राज्य की राज भाषाएं कहा. यह भाषाएं अपने अपने भाषाई राज्य की कामकाजी भाषाएँ थीं या बनीं.




तमिल व हिंदी के बीच के टकराव के ही कारण शायद 1949 में निर्णीत राजभाषा को स्कूल कालेज की पुस्तकों से दूर रखकर हिंदी को राष्ट्रभाषा ही बताया गया.  1963 का राजभाषा अधिनियम जम्मू-कश्मीर के अलावा तमिलनाड़ु में भी प्रभावी नहीं है. अंग्रेजी जो पहले 15 साल तक अस्थायी रूप से हिंदी का साथ देने वाली थी, अब करीब स्थायी हो गई है. इस अधिनियम के अनुसार, सन 1965 में जब हिंदी को पूर्ण रूपेण  राजभाषा बनाने का समय आया तो इस बाबत अध्यादेश जारी हो गए थे. लेकिन तमिलनाड़ु भड़क गया और भभकने लगा. हिंदी का विरोध जोरों से हुआ. शायद अग्निस्नान की घटनाएं भी हुई. फलस्वरूप हालातों को सँभालने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री ने संसद में वक्तव्य दिया कि जब तक सारे राज्य हिंदी को राजभाषा स्वीकार नहीं लेते तब तक अंग्रेजी हिंदी का साथ देते रहेगी. अब भी अंग्रेजी राजभाषा के पद पर हिंदी के साथ आसीन है. हालातों के मद्देनजर ऐसा लगता है कि अब अंग्रेजी हटने वाली नहीं है.

जो लोग 1980 तक भी स्कूल कालेजों में पढ़े हैं उन्हें भी राजभाषा के बारे में कुछ नहीं बताया गया. हिंदी राष्ट्रभाषा ही रही.

साराँशतः हिंदी न कभी राष्ट्रभाषा रही न अभी है. हिंदी राजभाषा मात्र है. संवैधनिक तौर पर हिंदी को राजभाषा का ही दर्जा दिया गया. लेकिन अब भी बहुत से हिंदी भाषी इस भ्रम में हैं कि संविधान हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देता है, क्योंकि यह देश के अधिकांश भागों में बोली और समझी जाती है। जबकि पूरे संविधान में राष्ट्रभाषा शब्द का प्रयोग हुआ ही नहीं.

लोग मानने को तैयार ही नहीं हैं कि हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है. संविधान में यह शब्द है ही नहीं.  “व्यक्तिगत और सामूहिक तौर पर हिंदी भाषी लोग हिंदी को ही राष्ट्र भाषा ही मानते है। भले ही यह संवैधानिक तौर पर लागू न हो अब तक। लोग मानते हैं कि स्वतंत्रता के बाद किये गये प्रावधानों में यह लिखा जाना कि अगले 15 वर्षों तक अंग्रेजी राजभाषा (संपर्क भाषा) के रूप में चलती रहेगी और इसके बाद हिंदी को पूर्णतः राष्ट्रभाषा का दर्जा दे दिया जाएगा। महज इसलिए प्रावधान स्वरूप रखा गया ताकि 15 वर्षों में अहिंदी भाषा क्षेत्र के लोग हिंदी सीख लेपर ऐसा नहीं हुआ और हम आज भी अपनी मातृभाषा को राष्ट्रभाषा का सम्मानजनक स्थान नहीं दिला पाए। हमारी राष्ट्रभाषा समिति में शामिल हमारे देश के कर्णधारों ने एक और बंटाधार संविधान के अनुच्छेद 343 (3) में कर दिया और यह उल्लेखित और कलमबद्ध कर दिया गया कि उक्त 15 वर्ष की अवधि के पश्चात भी संसदविधि द्वारा अंग्रेजी भाषा का प्रयोग ऐसे प्रयोजनों के लिए कर सकेगीजैसा की विधि में उल्लेखित हो। 

किंतु प्रबुद्ध जनों का मानना है कि उनका यह दायित्व बनता है कि हम अपनी संपर्क भाषा के प्रति कैसा दृष्टिकोण रखें। हिंदी तो ठीक से राजभाषा भी नहीं बन पायी हैअगर अपनी मातृभाषा के सम्मान में हम हिंदी राष्ट्र भाषा का संबोधन देते है तो क्या बुरा हैव्यक्तिगत तौर हिंदी भाषियों का मानना है कि हिंदी राष्ट्र भाषा है।


(अंततः इस लेख के लिए प्रेरक श्वेता सिंहा जी का मैं तहे दिल से आभार व्यक्त करता हूँ.)


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