MY THIRD BOOK

MY THIRD BOOK
मेरी तीनों प्रकाशित पुस्तक

सोमवार, 31 दिसंबर 2018

जिंदगी का सफर




जिंदगी का सफर

आलीशान तो नहीं ,
पर था शानदार,
वो छोटा  सा मकान,
उसमें खिड़कियाँ भी थे,
दरवाजे भी थे और
रोशनदान भी,
पर कभी बंद नहीं होते थे.

चौबीस घंटे उनमें से जिंदगी गुजरती रहती थी.
किसी भी शाम देख लो जिंदगी का बेलेंस,
सुबह से ज्यादा ही रहता था.
रोज होता था इजाफा,
आती ज्यादा थी और जाती कम,
खर्च करते करते थक जाते थे
पर कम होती ही नहीं थी.

वक्त बदलता गया,
आदतें बदलती गईं,
जिंदगी ने नए करवट लिए,
कभी कभी अंधड़ तूफानों में ,
धारदार बारिशों में दरवाजे बंद होने लगे,
शायद जिंदगी को भी कई बार
बंद दरवाजों से लौटना पड़ा हो.
फिर भी हर शाम आती जाती
जिंदगी बराबर ही रहती थी.
जिंदगी का खाता न बढ़ता न घटता.

जिंदगी चलती रही उसी मकान में,
हर दिन का बेलेंस बराबर ही रहता,
समय के साथ साथ जीवन करवटें बदलती रही,
मौसम भी बदला, जीवन में अंधड़ तूफान बढ़े,
दरवाजों के साथ साथ अब खिड़कियाँ भी बंद होने लगे,
शायद अब जिंदगी को ज्यादा बार
बंद दरवाजों से लौटना पड़ रहा होगा,

अब जिंदगी के खाते में आवक कम
और जावक बढ़ने लगी,
बेलेंस घट रहा है,
आए दिन के अँधड़ तूफान से दरवाजे बंद होते
पर खोले भी नहीं जाते,
क्योंकि इतने में दूसरा अंधड़ आ धमकता है.,
दरवाजे बंद ही रह जाते हैं.
रोशनदान तो अब हमेशा के लिए बंद ही हो गए,
अब जिंदगी आती भी होगी
तो सदा ही लौट जाती होगी,
बंद दरवाजों को देखकर,
घर में जिंदगी का आना अब बंद हो गया है


स्वाभाविक ही है,
समय के साथ जिंदगी का हर पहलू बदलता है,
जो बढ़ेगा वह घटेगा ही,
शिखर पर चढ़ने वाला नीचे तो उतरेगा ना !
जिदगी का यह घटता बेलेंस कभी तो धरती पर आएगा,
कभी तो जीरो होगा,
बस उसी का इंतजार है,
इसी मकान में जिंदगी को बेरोकटोक आते हुए भी देखा है,
और जाते देखा है,
अब बंद दरवाजों से लौटते हुए भी देखा जा रहा है.

कभी तो थमेगी
पर थमते हुए देखना संभव नहीं है
पर कभी तो थमेगी,
जो हम न सही लोग तो देखेंगे
.

बुधवार, 7 नवंबर 2018

अतिथि अपने घर के




अतिथि अपने घर के

बुजुर्ग अम्मा और बाबूजी साथ हैं, 
उन्हे सेवा की जरूरत है,
घर में एक कमरा उनके लिए ही है 
और दूसरा हमारे पास.

दो कमरों के अपने मकान में
बिटिया को सहीं ढंग से पढ़ने की जगह नहीं थी,
इसलिए अपने दो कमरों के मकान को किराए पर देकर,
एक छोटे तीसरे कमरे वाला मकान किराए पर लिया था.

बड़े भैया हैं, 
पद-पैसा–प्रतिष्ठा सब कुछ है,
शांत स्वभाव के भी हैं, पर
भाभी को इन बुजुर्गों का साथ सुहाता नहीं है.
और इनको भी वहाँ संतुष्टि नहीं है.
आते हैं, मिलते हैं, चले जाते हैं,
साथ रह नहीं पाते, 
न ही रख पाते हैं.

भैया घर में कुछ कह नहीं पाते,
और ये, सुपुत्र हैं, अनुज हैं – 
कहना नहीं चाहते,
बात साफ है, 
अंजामे तौर पर मैं पिसती हूँ.

कहीं बाहर भी जाना हो तो, 
बुजुर्गों की चिंता सताती है,
इसलिए बाहर जाकर भी, 
बाहर का पूरा आनंद नही लिया जाता.

अभी दोंनों की तबीयत जरा नासाज है,
ननदजी आई हैं देखने, 
ननदोई रिटायर्ड हैं,
साथ आए हैं, 
समय का तो कोई आभाव ही नहीं है.


बड़ी हैं, 
तो घर पर अधिकार है, 
वे चाहती तो हैं, कि कुछ करूँ,
पर इससे पहले उनके लिए घर में इंतजामात भी तो करने होंगे,

मतलब, उनको या हमको कमरा नहीं मिलेगा,
मतलब, सबके बाद सोना और सबसे पहले उठना,
दिन में सोना  ?...
नौकरी जो करनी है..


कमरा तो गया ही, 
किचन भी हाईजेक हो जाएगा,
अब नाश्ता मे क्या होगा, 
लंच पैक में क्या और डिनर ..
मैं तय नहीं करती .

खैर हम तो फिर भी आते जाते, 
बाहर कुछ खा पी लेते हैं,
बेचारी बेटी पर तरस आता है, 
किसी तरह किसी बहाने 
नानी के पास भेज देती हूँ,
कभी कभार सोने कि लिए मैं भी चली जाती हूँ,

पर ये बेचारे कहीं आ-जा नहीं सकते,
घर की पूरी जिम्मेदारी जो है.
भाभी की जिम्मेदारी भले ही न हो,
ननद जी का तो हक बनता है, 
सेवा करने का,

सब झेलना पड़ता है, मजबूरन
सब सहना पड़ता है, 
सब सह रहे हैं
अपने ही घर में अतिथि बनकर रहना पड़ता है
रह रहे हैं.....वो भी 
चेहरे पर बिना किसी शिकन के...

......