MY THIRD BOOK

MY THIRD BOOK
मेरी तीसरी प्रकाशित पुस्तक (मई में प्रकाशित होगी)

रविवार, 20 मई 2018

कली से फूल

कली से फूल
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फूल ने कली से कहा,
किस बात की जल्दी है,
क्यों खिलने को आतुर हो ?
अब तो मधुकर है डोल रहा,
मधु पाने को रस घोल रहा.

जिस दिन तुम खिलकर फूल बनो,
वह मधु सेवन करने आएगा
यह नित दिन ऐसे ही होगा
वह मधु सेवन को आएगा
और सेवन करके जाएगा.

सरकारें कानून बनाती हैं -

"तुम जब चाहे मधु बरसाओ,
जिस पर चाहे मधु बरसाओ,     
जब तक चाहो तरसाओ, 
जिसको चाहो तरसाओ."
कानून हैं कागज के टुकड़े,
सब फाईलों में दब जाती हैं
लाचार, नहीं कुछ कर पाओगी.
मसली सी खुद को पाओगी

जग जैसे का वैसे चलता है,
लाठी का जोर मचलता है
तुम भी कुछ ना कर पाओगी,
मजबूरन मसली जाओगी,

इन भौंरों का विश्वास न कर,
मधुकर पाने की आस न कर,
ये खुद की खातिर आएँगे,
मतलब साधे, उड़ जाएँगे,
तुम विरहिनी सी पछताओगी,
कुछ समय बाद झर जाओगी.

अच्छी हो कली, रहो कली तुम,
फिरने दो अलि को भले गुमसुम,
धीरे धीरे ही खिलना तुम,
अपनी मर्जी से खिलना तुम.
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गुरुवार, 17 मई 2018

जरूरी तो नहीं

जरूरी तो नहीं.

माना,
हर मुलाकात का अंजाम जुदाई तो है
तो मुलाकात किया जाए,
उसे बदनाम किया जाए
जुदाई के लिए ?

ये जरूरी तो नहीं.

दिल की हर बात सुहाती नहीं
दिलबर को कभी,
दिल को बदनाम किया जाए
ये जरूरी तो नहीं.

कभी बरसात के मौसम में भी
तसल्ली भर बारिश नहीं होती,
लगा गर्मी में
सुखा दूँ कोई पौधा
ये जरूरी तो नहीं.

जब भी कह देंगे चले जाएंगे
तेरे नजरों से परे,
तेरे दिल से भी उतर जाएं,
ये जरूरी तो नहीं.

जुदा होना है तो हो जाएँ
गम की बात नहीं,
दूध की मक्खी सा हो व्यवहार
जरूरी तो नहीं.

मंजिलें मिल न सके,
चलते हैं अपने रास्ते हम भी,
इसके लिए मन को
कड़वा ही किया जाए,
ये जरूरी तो नहीं.

खुशमिजाज अपने ही रस्तों पे
चले जाएंगे हम,
ताजी हवा,
शीतल समीर से भी,
मन न बहले,
ये जरूरी तो नहीं.

छोड़ दें दुनियां
किसी एक की खातिर
न हो मुमकिन ये मगर,
पर किसी एक की खातिर,
ये दुनियां रुके,
ये भी जरूरी तो नहीं.
.......