मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.

मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल  मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.
मन दर्पण

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

लेश मात्र प्यार

लेश मात्र प्यार

उन दिनों मेरा हाथ अपने हाथ में लिए,
गोदी में ले सहलाते – तुम
और कभी तुम्हारा हाथ लिए ,
सहलाती – मैं,

कभी पार्क में, तो कभी सिनेमा हॉल में,
कभी नहर किनारे, तो कभी नदिया तीरे,
तब बातें कम ही होती थी ,
पर एक दूसरे के अहसासों का,
अहसास हो ही जाता था.

कितना मधुर वक्त था ना वह !

बात आगे बढ़ती गई,
कभी तुमने मेरे बालों से खेला,
कभी मेरे गालों को सहलाया,
कभी मैं तुम्हारे सीने पर सर रखकर सो जाती
और कभी तुम मेरे गोदी मे सर रखकर सोते,

तुम्हारे उस खुरदरे दाढ़ी की चुभन भी मुझे भाने लगी थी.
हमने शायद सोचा था कि जीवन शायद उसे ही कहते हैं -
मन से मन का मिलन, दिन प्रतिदिन प्रगाढ़ होता गया
फिर एक दिन लगा कि अब तो दो मन एक हो गए हैं,


मजबूरन दो अलग- अलग तन में बसे हुए हैं.
लगा, अब उन्हें भी एकीकृत कर देना चाहिए.
तुमने ही तो प्रस्ताव दिया था ना ,
और हाँ, मैंने स्वीकार भी किया था.

अब हम दंपति हैं.

दुनियाँ की एक नई तस्वीर उभरने लगी है.
लगने लगा कि इस प्यार और
मानसिक मिलन के अलावा भी
बहुत कुछ है संसार में.





हमने मानसिक मिलन के दौर में,
तो आसपास कुछ नहीं देखा.

इसमें अधिकार कम और जिम्मेदारियाँ ज्यादा हैं.
अपनी तो पता नहीं कहाँ गई,
पर अगली पीढ़ी की जिम्मेदारी में
सुबह – शाम का पता ही नही चलता.

शायद प्यार का यह एक और रूप है.
हम जिसे प्यार समझते थे वह तो
प्यार के सागर का शायद
सौवाँ अंश भी नहीं है,
लेश मात्र है.

अब हम अपने लिए कम और
औरों के लिए ज्यादा जीते हैं,
शायद यही प्यार का मर्म भी है.
और प्यार का धर्म भी.


अयंगर.
21.07.2015.





सोमवार, 20 जुलाई 2015

इंटरनेट से हिंदी प्रगति.



  
इंटरनेट से हिंदी प्रगति 

http://www.hindikunj.com/2015/07/internet-hindi-progress.html

हिंदी भाषा अपने आप में बहुत शक्तिशाली है और विश्व की कई भाषाओं से अग्रणी है. हालाँकि इसपर कई वाद-विवाद हैं किंतु मनीषियों की मानें तो आज हिंदी विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है, 

इंटरनेट, संप्रेषण का मायाजाल है. इससे संप्रेषण में हजारों - लाखों गुना वृद्धि हुई है. हाथ से लिखने की जगह से उठकर आज हम ऐसे दौर पर आ गए हैं जहाँ किसी की कही हुई बात दुनियाँ के दूसरे कोने में वहाँ की भाषा में सुनी जा सकती है और शायद देखी भी जा सकती है, छापा जा सकता है. इसके अलावा हर काम की गति में तेजी आई है जैसे टाईपिंग ने तो लिखने की रफ्तार में चार चाँद लगा दिए हैं. उसकी प्रिंटिंग तो देखते देखते हो जाती है. पहले जितनी प्रतिय़ाँ चाहिए उतनी बार लिखना पड़ता था अब एक बार टाईप कर लीजिए और एक ही आदेश से जितनी कापियाँ चाहिए प्रिट कर लीजिए. दुनियाँ भर में कहीं भी , कितनों को भी चाहें पलक झपकते ही सारा मिसिल भेज दीजिए. लेकिन इससे लिखने की कला खत्म होने के कगार पर आ गई है. हो सकता है कि अब से पाँचवीं पीढ़ी लिखना ही न जाने या फिर केवल पंचिंग या टाईपिंग ही जाने.
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अयंगर.