मेरा आठवाँ प्रकाशन / MY Seventh PUBLICATIONS

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गुरुवार, 26 सितंबर 2019




हिंदी पर राजनीति

आज हमारे देश भारत में किसी भी मुद्दे पर राजनीति संभव है। चाहे वह क्षेत्र हो , भाषा हो, सवर्ण या दलित संबंधी हो, सेना हो या कोई व्यक्ति विशेष ही क्यों न हो। यहाँ तो मुद्दे बनाए ही जाते हैं राजनीति के लिए । किसी भी मुद्दे का कभी भी राजनीतिकरण किया जा सकता है। हमारे राजनेता चाहे वो किसी भी पार्टी के हों, इसमें विलक्षण प्रतिभा रखते हैं। यहाँ तक कि भारत भू-भाग के दिशाखंड – पश्चिमी भारत, दक्षिणी भारत या अंचल - विदर्भ, सौराष्ट्र, रॉयलासीमा, मराठवाड़ा जैसे क्षेत्रों के साथ भी राजनीति जुड़ी हुई है। किसी भी मुद्दे पर जनता को बाँटकर उसे वोट में परिवर्तित करने की राजनीति यहाँ प्रबल है। मैं न विदेश गया न जाने की तमन्ना है इसलिए वहाँ के हालातों को बयाँ करना या उनसे तुलना करना मेरे लिए संभव नहीं है।

इस देश में राजनीतिक मुद्दे कुरेद - कुरेद कर निकाले व बनाए जाते हैं। इतिहास को कुरेदकर मुद्दे निकालना और उनका ढिंढोरा पीट - पीटकर जनता को पुनः - पुनः जगाना, फिर उससे जनता को बाँटकर वोट में तब्दील करना - राजनीतिज्ञों का विशोष काम रह गया है। दल कोई भी हो, नेता कोई भी हो, काम यही है। लोगों को वोटों के लिए बरगलाने के सिवा नेताओं का कोई काम नहीं रह गया है, न ही राजनीति का मकसद कुछ और है। यही उनका जीवन यापन है, यही उनका धंधा है। इसी मकसद के कारण यहाँ मुद्दे सुलझाए नहीं जाते, उलझाए जाते हैं और सड़ने की लिए रखे जाते हैं और चुनाव – दर - चुनाव उन्हें बार - बार भुनाया जाता है - वोटों के लिए. भारत की ज्यादातर जनता बेचारी इस विषय में या  तो मूर्ख है या मतलब के लिए मूर्ख ही बनना पसंद करती है. जब नेता और जनता एक मत हों तो कुछ और कैसे होगा ? इसलिए मुद्दे तो बनते हैं, पर कभी सुलझते नहीं, उनको उलझाने का काम नेताओं ने ले रखा है. साथ में उलझती है जनता और नेता वोट बटोर लेते हैं. मुद्दा सुलझा मतलब एक वोट बैंक मृत.

बोफोर्स, गोधरा, भोपाल गैस, 1984 के दंगे, राष्ट्रभाषा का मुद्दा, आरक्षण का मुद्दा (विशेषकर नारी आरक्षण) व सुविधाएँ  ये सब ऐसे ही वोटदायक मुद्दे हैं जिन पर राजनेताओं की श्वास चलती है. राममंदिर, बेरोजगारी, गरीबी, गंगा (नदियों) की सफाई ऐसे बहुत गिनाए जा सकते हैं. इतिहास से कुरेदकर नए मुद्दे भी जोड़े जा रहे हैं. गाँधी हत्या ऐसा ही नया जीता जागता मुद्दा है, जिसके तहत ग्वालियर में गोड़से का मंदिर भी बनाया गया. यह बात बहुत विशेष है कि राम मंदिर भले मुद्दा ही बनकर रह गया, पर गोड़से का मंदिर बन गया. सरदार पटेल की प्रतिमा को एक विशेष मुद्दा बनाया गया. वैसे ही सेना व राजनीति कभी साथ नहीं चले पर अब उन्हें भी साथ चलाया जा रहा है. हालातों के चलते, यदि जनरल मानेकशॉ राजनीति में आना चाहते तो शायद हर नागरिक स्वागत करता. पर नहीं, उनको उसूल ज्यादा प्यारे थे. यदि कोई सैन्याधिकारी खुद को राजनीति के योग्य समझता है, तो मेरे ख्याल से वह सेना के योग्य ही नहीं है. राजनीति की गंदगी जैसे ही सेना में आई, तो सेना बरबाद हुई समझिए. शुरुआत तो हो ही चुकी है.

ऐसा ही एक मुद्दा है भाषा का. जिसे कोई राजनेता हल करना या सुलझाना नहीं चाहता. कारण वही वोट बैंक. वैसे जाने अंजाने भाषा का मुद्दा तो हमारी आजादी से ही जुड़ गया. मद्रास, गुजरात, बंगाल, उड़ीसा, महाराष्ट्र, पंजाब और असम - भाषायी आधार पर ही बने राज्य हैं. आजादी के तुरंत बाद इन राज्यों के गठन में भाषायी राज्यों का आना ही इसका प्रादुर्भाव था. पता नहीं तब ही मंशा साफ थी या मात्र एक संयोग था, पर अपना काम तो वह कर गया – देश को भाषा के आधार पर बाँटने का. किंतु उसके बाद बने कर्नाटक, आँध्र प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान से तो मंशा साफ हो ही गई कि हमारे नेता भाषा की राजनीति के पक्षधर हैं. हिंदी या निकट हिंदी भाषाई क्षेत्रों की अधिकता के कारण दक्षिण भारतीय नेताओं ने इसे ज्यादा पसंद किया होगा. शायद उनको इसका अच्छा परिणाम भी मिला, पर भारत मुख्य रूप से उत्तर और दक्षिण भारत नामक दो विशिष्ट हिस्सों में बँट गया. इस तरह देश में भाषाई जंग या कहिए भाषा जन्य अलगाव ने  जनम लिया.

खासकर दक्षिण भारतीय नेताओं ने इसमें बहुत खलबली मचाई. यह उनके अस्तित्व के संरक्षण के लिए था, जो खतरे में पड़ रहा था. दक्षिणी भाषाओं के अलावा भारत की अन्य भाषाओं का हिंदी के बहुत ज्यादा या बहुत कम - किंतु संबंध था। पर दक्षिणी भाषाएँ इसके पास भी नहीं फटकती थीं. इसलिए दक्षिणी नेताओं को शक था कि वे अलग - थलग पड़ जाएंगे. इसलिए हिंदी के बढ़ावे से उन्हें बहुत तकलीफ थी.  जनता को यही घुट्टी में पिलाकर समझाया गया कि यदि हिंदी आ गई तो दक्षिण भारतीयों को किसी भी क्षेत्र में उन्नति का कोई मौका नहीं मिलेगा. जनता नेताओं के झाँसे में आ गई. तब साक्षरता नाम की चिड़िया भारत में थी ही कहाँ.

उससे पहले स्वतंत्रता आँदोलन के दौरान गाँधीजी ने राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने के लिए राष्ट्रभाषा सिद्धांत को आगे रखा. वे चाहते थे कि हिंदुस्तानी राष्ट्रभाषा बने ताकि हिंदू और मुस्लिम सभी का साथ मिले . पर नेहरू के पक्षधर और जिन्ना के विरोधियों ने गाँधी जी की एक नहीं चलने दी. उन्होंने हिंदी के पक्ष में जोर लगाया. फलस्वरूप गाँधीजी का राष्ट्रभाषा सिद्धांत खटाई  में पड़ गया. हिंदू मुस्लिम का बैर वहाँ मुख्य कारण बना . भाषाई कारण से देश के बँटने को इससे जोर मिला. किसी को देश की नहीं पड़ी थी. अपने व्यक्तिगत मुद्दे सर उठा चुके थे. अंततः राष्ट्रभाषा शब्द के ही इतने  अर्थ निकाले गए कि वह शब्द खुद ही संशयात्मक हो गया और आज भी इसका कोई स्थाई अर्थ नहीं है. आज भी हिंदी के पक्षधर इसे राष्ट्रभाषा कहते फिरते हैं. कुछ तो समझते नहीं हैं पर ज्यादातर लोग समझना  भी नहीं चाहते. यही राजनीतिक असर है.

असली जोर तब आया जब संविधान की भाषाई समिति में देश की अधिकारिक भाषा का सवाल उठा. उन्होंने निस्संकोच एक बहुत अच्छा काम किया कि राष्ट्रभाषा शब्द को परे ही रख दिया और एक नए शब्द राजभाषा का प्रयोग किया. समिति ने भाषाओं पर चर्चा करते हुए जब एक – एक कर भाषाएँ हटाते गए तो अंत में हिंदी और तमिल भाषाएँ ही बचीं. दोनों जोर - शोर से लगे थे कि हमारी भाषा ही राजभाषा बने. टकराव के हालातों में अततः इस पर मतदान कराना पड़ा. लेकिन इससे भी समस्या का समाधान नहीं हो सका. मतदान में दोनों पक्षों को बराबर मत मिले. फलस्वरूप, अध्यक्षीय मतदान करना पड़ा. अध्यक्षीय मत हिंदी के पक्ष में पड़ा और हिंदी राजभाषा घोषित हुई. इसी कारण तमिलभाषियों (तमिल भाषी नेताओं को) को हिंदी और नेहरू दोनों मंजूर नहीं हैं. इन्होंने ही तमिल ही नहीं, बल्कि सारे दक्षिणी भारतीय नेताओं को पहले और बाद में नागरिकों को बहकाया है.

चलिए एक बात को मान लेते हैं कि मूलतः जनता ही हिंदी से नफरत करती  है और हम लोग नेताओं
को द्वेषवश बदनाम करते हैं. यदि यही सत्य है तो टी वी पर हिंदी सीरियल और सिनेमा घरों में हिंदी पिक्चर क्यों देखे जा रहे हैं ? पता कीजिए हिंदी फिल्में वहाँ कितनी चलती हैं और क्यों ? सिनेमाघरों में टिकट के लिए कितने दंगे फसाद होते हैं ? इन हिंदी सीरियल और फिल्मों का विरोध क्यों नहीं होता ?  किसलिए नहीं होता, यदि जनता हिंदी से नफरत करती है? इससे साफ जाहिर है कि हिंदी से नफरत मूलतः जनता को नहीं है. यह नफरत राजनेताओँ द्वारा दी हुई है.

अब थोड़ा सोचते हैं समस्या के निदान पर।

राष्ट्रीय नेताओं ने जब भी हिंदी को बढ़ावा देने का प्रयास किया तो पूरे देश में एक साथ किया. मकसद साफ है कि दक्षिण से विरोध उभरेगा और मसला एक बार और दफना दिया जाएगा. इरादा किसका है कि हिंदी को बढ़ावा मिले ? इरादा तो मुद्दे को उछालना है कि वोट गिन सकें.
यदि दिल में सही मंशा है हिंदी को बढ़ाने की, तो पहले हिंदी भाषी ( मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली राज्यों में हिंदी को पूरा बढ़ावा दीजिए. वहाँ की ज्यादातर जनता हिंदी में सक्षम है और वहाँ हिंदी अपनाने से जनता भी खुश होगी. सबका साथ मिलेगा शायद सबका विकास भी हो जाए. हिंदी भाषी राज्यों में आपस में व केंद्र के बीच संप्रेषण का माध्यम भी हिंदी हो, यह सुनिश्चित करें.

इसके बाद हिंदी के संगी - साथी (बंगाल, उड़ीसा, महाराष्ट्र, पंजाब और असम, जैसे क्षेत्र) भाषी क्षेत्र पर आएँ और वहाँ हिंदी को बढ़ावा दें. जो राज्य प्रथम चरण में ही हिंदी अपनाने को तैयार हैं, उन्हें अपनाने दें. इस तरह हिंदी भाषी और हिंदी के निकटभाषी क्षेत्र जब हिंदी को पूरी तरह अपना लें, तो देश का दो तिहाई हिंदीमय हो ही जाएगा. तब अन्यों को मजबूरी महसूस होगी, नजर आएगी. हो सकता है - जैसे आज जिस तरह तमिलनाडु के युवा हिंदी के लिए आंदोलन करना शुरु कर रहे हैं, वैसे आंदोलन जोर पकड़ेंगे तथा दक्षिण भारतीय भी हिंदी की ओर मजबूरन झुकेंगे. नेता तो फिर भी विरोध करेंगे, पर जब जनता झुकेगी तो नेताओं का विरोध अपने आप ही फीका पड़ता जाएगा.

दूसरा तरीका यह हो सकता है कि ईमानदारी से त्रिभाषा सूत्र अपनाया जाए. किंतु ईमानदारी इसी में है कि दक्षिण भारतीयों के लिए हिंदी अनिवार्य हो तो अन्यों के लिए एक दक्षिण भारतीय भाषा (तमिल, तेलुगु, कन्नड या मलयालम में से एक) अनिवार्य हो. इसे यदि ईमानदारी से अपनाया जाए तो दक्षिण में भी इसका विरोध नहीं होगा. पहले जब ऐसा प्रस्ताव आया था तब दक्षिणेतर राज्यों ने त्रिभाषा के अंतर्गत संस्कृत अपनाकर दक्षिण भारतीयों के साथ धोखा किया था. ईमानदारी हो तो त्रिभाषा सूत्र गजब का प्रतिफल दे सकता है.

अब देखना यही है कि कितनी ईमानदारी और शिद्दत के साथ हिंदी विभाग इस पर अमल करता है. मैं तो चाहूंगा कि कोई इसे गृह विभाग के कार्यकारी अधिकारियों तक पहुँचाए ताकि जिनके पास कार्यकारी अधिकार हैं वे इसे जान सकें. जन साधारण इसे जानकर भी इसका कार्यान्वयन नहीं कर सकती.

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शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

ऐसे सिखाएँ हिंदी

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ऐसे सिखाएँ हिंदी



मैं, मेरे हिंदी की शिक्षिका के साथ 

किसी भी भाषा को सीखने  का पहला चरण होता है बोलना। और बोलना  सीखने के लिए उस भाषा का अक्षरज्ञान जरूरी नहीं होता। किसी को बोलते हुए देखकर सुनकर, वैसे उच्चारण का प्रयास कर किसी भी भाषा को बोलना सीखा जा सकता है। बहुत से लोग तो विभिन्न भाषाओं के सिनेमा देखकर ध्वनि व चित्र के समागम से ही शब्द का उच्चारण और अर्थ सीख लेते हैं। दोस्तों व परिवारजनों के साथ बात करते करते नए शब्दों को सीखना और उनका सही उच्चारण करना आसान हो जाता है। इस तरह समाज में रहकर समाज की भाषा बोलना सीखना एक बहुत ही आसान जरिया है। पर ऐसे में इस बोली में कुछ गलतियों का समावेश सहजता से हो जाता है।

अगला कदम होता है लिखना – पढ़ना, जो बोलने के साथ - साथ भी सीखा जा सकता है। वैसे केवल पढ़ना भी कुछ अतिरिक्त मेहनत करके सीखा जा सकता है। इसी दौरान बोलने की प्रक्रिया के उच्चारण दोष सही किए जा सकते हैं। अन्यथा ये हमेशा - हमेशा के लिए घर कर जाते हैं। इसलिए शिक्षकों को चाहिए कि लिखने - पढ़ने की प्रक्रिया के दौरान शिक्षार्थियों के उच्चारण पर विशेष ध्यान देकर उनमें आवश्यक सुधार करना चाहिए। गलत उच्चारण के कारण ही लेखन में वर्तनी की गलतियाँ होती हैं और भाषा में अशुद्धता आ जाती है।
अक्षर और मात्राओँ को सिखाने - सीखने के दौरान शिक्षकों  को निम्न विषयों पर ध्यान देना चाहिए –

1.      म और भ  में शिरोरेखा (मस्तक रेखा) की गलती से भ्रम हो जाता है किंतु इस पर ध्यान नहीं जाता कि म और भ में एक घुंडी का भी फर्क है। इस घुंडी का ख्याल करने से शिरोरेखा की गलती का कोई असर नहीं होगा।
2.      घ और ध में भी शिरोरेखा (मस्तक रेखा) की गलती से भ्रम हो जाता है किंतु इस पर ध्यान नहीं जाता कि घ और ध में भी एक घुंडी का भी फर्क है। इस घुंडी का ख्याल करने से शिरोरेखा की गलती का कोई असर नहीं होगा।
3.      क और फ में भी समानता होते हुए भी फर्क है। यदि क की गोलाई शिरोरेखा से जुड़ जाए तो फर्क मिट जाता है। इसलिए क की गोलाई को शिरोरेखा को बचाकर ही लिखा जाना चाहिए।
4.      प, य और थ – प की गोलाई में थोड़ी सी वक्रता से वह य का आकार ले लेता है। इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उस पर य में घुंडी मात्र के फर्क से यह थ का रूप ले लेता है।
इसी तरह ङ और ड़ में नुक्ता की स्थिति पर गौर करना जरूरी है।
शिक्षकों को चाहिए कि वे शिक्षार्थियों को इन फर्कों से अवगत कराएँ एवं सुनिश्चित करें कि वे इन गलतियों को करने से बचें।
इसी तरह मात्राओं ए (के) और  ऐ (कै) में फर्क भलीभाँति समझाया जाए। आज भी बच्चे एक में ए पर मात्रा लगाते पाए जाते हैं। उन्हें शायद इस बात का ज्ञान नहीं होता कि ए में ही मात्रा निहित है, इसके बदले ही मात्रा लगाई जाती है। ऐ में एक मात्रा अक्षर की है और दूसरी लगाई गई है। किसी अन्य वर्ण में ए के लिए एक मात्रा और ऐ के लिए दो मात्राएँ लगती हैं ( जैसे के और कै)।

इनके अलावा मात्राओँ के प्रयोग में विशेषकर सिखाया जाना चाहिए कि निम्न वर्णों में मात्राएँ सामान्य वर्णों से भिन्न तरीके से लगाई जाती है। यह वर्ण विशेष रूप में लिखे जाते हैं।
जैसे रु, रू, हृ। साधारणतः उ और ऊ  की मात्राएँ वर्ण के नीचे लगाई जाती है, पर र में यह पीठ पर लगती है। वैसे ही ऋ की मात्रा साधारणतः पैरों पर लगती है, पर ह वर्ण में कमर पर लगाई जाती है। ह वर्ण के साथ जुड़ने वाला हर वर्ण कमर पर ही जुड़ता है. जैसे आह्लाद, आह्वान, असह्य , चिह्न, अल्हड़, दूल्हा, कान्हा, और उन्होंने। आप चाहें तो इन्हें अपवाद कह सकते हैं और इसीलिए इन पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। रु और रू पर विशेष ध्यान देना इसलिए भी जरूरी है कि र पर ऊ की मात्रा पीठ से सटी नहीं होती, बीच में एक छोटी लकीर होती है जिसे अक्सर नजरंदाज किया जाता है। वैसे ही श पर र की टँगड़ी लगने पर उसका रूप बदल कर श्र हो जाता है।

मात्राओँ में एक और मात्रा है जिस पर विशेष ध्यानाकर्षण की आवश्यकता है। वह है र की मात्रा। निम्न शब्दों पर गौर करें।

प्रथम,  पर्यटन, ट्रक।
क्रम, कर्म, ट्रेन।
अब इनके विस्तार देखिए –
प्रथम – प् ++ +    - (र पूरा है)
पर्यटन – प + र् + + + - ( र आधा है)
ट्रक -  ट् + +   - (र पूरा है)
क्रम – क् + +   - (र पूरा है)
कर्म – क + र् +   - ( र आधा है)
ट्रेन – ट् + रे +       - (र पूरा है)

इनमें आप देखेँगे कि सभी शब्दों में र आधा नहीं है, जैसे कि आभास होता है।

जहाँ र की मात्रा पैरों पर है वहाँ अक्षर आधा है, पर र पूरा है।
इसे (क्र) र की टँगड़ी कहते हैं, जो गोलाकार वर्णों में ट्र जैसी हो जाती है।

र की जो मात्रा सर पर टोपी जैसे लिखी जाती है उसे र का रेफ कहा जाता है और उसमें र आधी होती है।
ध्यान दीजिए कि अन्य भारतीय भाषाओं की तरह हिंदी में भी मस्तक पर लगने वाली व्यंजन मात्रा का (शिरोमात्रा) उच्चारण अक्षर से पहले होता है और पैरों पर लगने वाली मात्राओं का (पदमात्रा) उच्चारण अक्षर के बाद होता है।

पर इसमें एक अपवाद भी है – अनुस्वार।
देखिए शब्द चंदन को – अनुस्वार को हटाकर लिखें तो पंचमाक्षर नियमानुसार चन्दन लिखा जाना चाहिए। यानी अनुस्वार को हटाकर उसकी जगह अगले वर्ण वर्ग के पंचमाक्षर स्थित अनुस्वार वर्ण का प्रयोग करना चाहिए। इस तरह देखा जा सकता है कि अनुस्वार मस्तक पर लगते हुए भी अक्षर के बाद उच्चरित होता है। इसी तरह कंगन (कङ्गन), मुंडन (मुण्डन), बंधन (बन्धन), चंबल (चम्बल) लिखे जाते हैं। ऐसा देखा गया है कि हिंदी में स्नात्तकोत्तर विद्यार्थी भी पंचांग शब्द को बिना अनुस्वार के लिखने से कतराते हैं । इसे सही में पञ्चाङ्ग लिखा जाना चाहिए। यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि वैयाकरणों ने पंचमाक्षर नियम बनाकर वर्गों के अनुस्वार की समस्या तो हल कर दिया, पर वर्गेतर वर्णों की समस्या तो जस की तस है। 
हिमाँशु या हिमांशु - इसे अनुस्वार बिना कैसे लिखें हिमान्शु या हिमाम्शु तय नहीं है। सारा दारोमदार निर्भर करता है कि आप शब्द को कैसे उच्चरित करते है। अब यह तो वैयक्तिक समस्या हो गई न कि व्याकरणिक। इसीलिए शायद वर्गेतर वर्ण वाले शब्दों  में अनुस्वार को पंचमाक्षर से विस्थापित करने का प्रावधान नहीं है।¶ÆÉÞगार

अब कुछ वर्तनी की ओर –
1.      आधा श – गोलाकार वर्णों के साथ आधा श – विश्व सा लिखा जाता है, पर कोनों वाले वर्णों के साथ काश्मीर सा लिखा जाता है। कुछ शब्द हैं जिनमें दोनों तरह की लिपि मानी जा रही है - जैसे पश्चात, आश्वासन, कश्ती इत्यादि।

2.      ऐसा ही एक शब्द है  -  (¶ÆÉÞगार )  शृंगार , यहाँ आधे श पर ऋ की मात्रा लगाई जा रही है, जो अपवाद है (ऐसा कहा जाता है कि मात्रा लगने पर हर वर्ण व्यंजन का रूप ले लेता है। इस अर्थ में शृ में भी श आधा ही है)। लेकिन अक्सर लोग इसे श्रृंगार लिखते हैं, जो एकदम ही गलत है। शृंगार मे श पर ऋ की मात्रा है, जबकि श्रृंगार में श के साथ आधा र भी जुड़ा है और उस पर ऋ की मात्रा है।

कुछ दक्षिण भारतीय  भाषाओं के वर्ग में दो ही अत्क्षर होते हैं. जौसे क और ङ।  इसलिए उन्हें ख, घ, छ झ के उच्चारण में तकलीफ होती है. संभव है कि वे खाना खाया और गाना गाया का उच्चारण काना काया की तरह ही करें। इसी तरह वर्ग का तीसरा अक्षर न होने के कारण वे ग, ज,ब,द का भी सही उच्चारण नहीं कर पाते। वे गजेंद्रन को कजेंद्रन कहेंगे। कमला व गमला की वर्तनी एक सा लिखेंगे, फिर पढ़ने में अदला - बदली हो जाएगी। ऐसी जटिलताओँ पर शिक्षकों का ध्यानाकर्षण आवश्यक है ताकि वे समय पर विद्यार्थी के उच्चारण में सुधार कर सकें। शिक्षकों को चाहिए कि इस तरह की त्रुटियों को बालपन में सुधार दिया जाए। उम्र के बढ़ने पर सुधार में बहुत कठिनाई होती है। उच्चारण की गलतियाँ अक्सर वर्तनी में देखी जाती हैं। शब्द विद्यार्थी में द और य का मिश्रण है और संयुक्ताक्षर द्य बना है. अक्सर लोग ध्य को द्य समझने की गलती करते हैं। इस पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। पता नहीं क्यों भाषाविदों ने श्र को तो संयुक्ताक्षर माना पर द्य को नहीं। इसी तरह दिल्ली व उत्तरी राज्यों में राजेंद्र को राजेंदर उच्चरित किया जाता है क्योंकि गुरुमुखी लिपि में अक्षरों को आधा करने का प्रावधान नहीं है, पर द्वयत्व का प्रावधान है। शिक्षकों को इस पर विशेष गौर करते हुए उचित सलाह देकर त्रुटियों का निवारण करना चाहिए।

अब आईए अनुनासिक व अनुस्वार के प्रयोग पर। वैसे वर्तनी के आद्यतन नियमों के अनुसार तो जहाँ शब्दों या तात्पर्यों का हेर - फेर न हो, वहाँ अनुनासिक की जगह अनुस्वार का प्रयोग हो सकता है। पर जिसे पता होगा वह गलती करेगा ही क्यों ? सबसे उत्कृष्ट उदाहरण हैं -  हँस (हँसने की क्रिया) और हंस ( एक जलचर पक्षी)। अब सवाल आता है कि किसका कहाँ प्रयोग उचित है। एक  नियम जो जानने में आया है वह यह कि जहाँ अनुस्वार या अनुनासिक वाले शब्द को वर्ग के अंतिम अनुस्वार के साथ लिखा जा सकता है, वहाँ अनुस्वार लगेगा, वर्ना अनुनासिक। जैसे मंगल ( मङ्गल), चाँद ( इसे चान्द लिखने से उच्चारण बदल जाता है, अतः यहाँ अनुनासिक ही लगेगा)।

जब किसी शब्द में वर्ग के पंचमाक्षर का ही द्वयत्व हो, या पंचमाक्षरों का ही समन्वय है तो उसे अनुस्वार से विस्थापित नहीं किया जा सकता ।  उसे आधे अक्षर के साथ ही लिखा जाना चाहिए। जैसे हिम्मत, उन्नति, जन्म, कण्णन इत्यादि। इनको हिंमत, उंनति, जंम, कंणन नहीं लिखा जा सकता।

अनुनासिक का प्रयोग अक्सर वहाँ होता है जहाँ मात्राएँ शिरोरेखा पर न लगी हों – जैसे बाँध, फँसना, गूँज इत्यादि। जहाँ शिरोरेखा पर मात्राएँ हों तो वहाँ अनुनासिक की  जगह अनुस्वार का ही प्रयोग होता है। जैसे में, मैं, चोंच, भौंकना इत्यादि। याद रहे कि पहले में और मैं में भी अनुनासिक लगाया जाता था।
अब आते है कुछ शब्दों के विशिष्ट उच्चारण पर –  ब्राम्हण उच्चरित होता है पर लिखा जाता है ब्राह्मण।वैसे ही आल्हाद कहा जाता है पर आह्लाद लिखा जाता है.

वैसे ही आर्द्र, सौहार्द्र इत्यादि । शिक्षकों को चाहिए कि ऐसे विशेष शब्दों के उच्चारण व वर्तनी पर विशेष ध्यान देते हुए विद्यार्थियों को लभान्वित करें।

इन सबसे हटकर एक और समस्या जो मुख्य तौर पर देखी गई है कि प्रादेशिक भाषा का उच्चारण - जो विद्यार्थियों के हिंदी उच्चारण में आ जाता है. शिक्षकों को चाहिए कि वे बालपन से ही इस त्रुटि का निवारण करने का प्रयत्न करें। सही उच्चारण से लिपि में वर्तनी की शुद्धता बढ़ती है।

आशा है कि शिक्षक गण, इसमें से जो भी स्वीकार्य हो, उससे बच्चों को लाभान्वित करेंगे।

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मंगलवार, 7 मई 2019

अंतस के मोती

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अंतस के मोती (मेरा चतुर्थ प्रकाशन)

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रविवार, 27 जनवरी 2019

ऐसा भी होता है.

*ऐसा भी होता है.*

सब लड़कों जैसे मुझे भी
जवानी में पीने का
शौक हो गया था.
एक सिटिंग में एक बोतल
कम पड़ती थी.
रोज कैरम खेलते और
हारने वाला पिलाता.

पर कभी पब्लिक में नहीं पी, सिवाय होली के.

एक होली में ज्यादा पीली.
राव से कहा, यार घर छोड़ दे.

गलबहियाँ डाले झूमते हुए
घर आकर सो गया.

दूसरी शाम नींद खुली.
राव से मिला तो बताया कि गुलियानी भाभी ने पूछा --
आप ज्यादा पी गए थे क्या..?  अयंगर साहब आपको घर छोड़ने गए थे... ।
राव साहब पीते कम
और दिखाते ज्यादा थे...
मस्ती में.
सबको लगता था,
वो बहुत पीते हैं।।

और हम थे ..
वो क्या कहते हैं..।
गुड बॉय...
बाद में भाभी जी
मुझसे बोली, भाईहासब,
अपने दोस्त
राव को समझाईए,
इतनी क्यों पीते हैं,
कम पिएँ,
हद में रहा करें,

सबने देखा
आप उनको
घर छोड़ने गए थे.
बदनामी होती है ना..

मेरे लाख कोशिशों पर भी
भाभी नहीं मानीं,
कि मैं राव को नहीं,
पर राव मुझे घर
छोड़ने गए थे.।।

समाज में अपना बिंब कैसे बनाना है,
यह स्वयं पर निर्भर करता है.
.।..।