मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.

मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल  मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.
मन दर्पण

मंगलवार, 25 जून 2013

मानसिकता

मानसिकता

सर्वोन्मुखी विकास अपना ध्येय होना चाहिए,
प्रकृति के संग मानव - नाव खेना चाहिए.

पंचभूतों से बना माटी का पुतला आदमी,
कृतज्ञ परमेश्वर का होना, इंसानियत है लाजमी.

आदमी संपूर्ण है क्या ?  एक के वर्चस्व से,
प्रकृति खोती है संबल, एक के भी ह्रास से,
लौटती अपने वजूद में, अपनी तरह के प्रयास से.

अंजाम इसका ही तो है – कभी - बरसात होती ही नहीं,
और कभी तो नदियों की सीमाएं होती ही नहीं.
बीमारियाँ इतनी बढ़ी कि माएँ सोती भी नहीं.



रूप प्रकृति क्रोध को, कहते हैं हम भूचाल - अकाल, 
सागर में आए बाढ , नहीं क्या काल यह विकराल ?

आज वादियाँ कराह रही हैं, जीवन को पनाह नहीं है.

प्रकृति कहर बरपा रही है, बादल फट – फट बरस रहे हैं.
गंगाजी अपना हक माँग रही हैं, कोप में महादेव को बहा रही हैं.
महा जल प्लावन हो रहा है, शिखर टूटकर बिखर रहे हैं,

लेकिन मानव है कि – आज भी प्रकृति से होड़ करता है,
प्रकृति संग चलना नहीं चाहता, उस पर विजय पाना चाहता है,
और जब प्रकृति बिफरती है तो य़े मानव बिखर जाता है.

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एम.आर.अयंगर.

मानसिकता

मानसिकता

सर्वोन्मुखी विकास अपना ध्येय होना चाहिए,
प्रकृति के संग मानव - नाव खेना चाहिए.

पंचभूतों से बना माटी का पुतला आदमी,
कृतज्ञ परमेश्वर का होना, इंसानियत है लाजमी.

आदमी संपूर्ण है क्या ?  एक के वर्चस्व से,
प्रकृति खोती है संबल, एक के भी ह्रास से,
लौटती अपने वजूद में, अपनी तरह के प्रयास से.

अंजाम इसका ही तो है – कभी - बरसात होती ही नहीं,
और कभी तो नदियों की सीमाएं होती ही नहीं.
बीमारियाँ इतनी बढ़ी कि माएँ सोती भी नहीं.



रूप प्रकृति क्रोध को, कहते हैं हम भूचाल - अकाल, 
सागर में आए बाढ , नहीं क्या काल यह विकराल ?

आज वादियाँ कराह रही हैं, जीवन को पनाह नहीं है.

प्रकृति कहर बरपा रही है, बादल फट – फट बरस रहे हैं.
गंगाजी अपना हक माँग रही हैं, कोप में महादेव को बहा रही हैं.
महा जल प्लावन हो रहा है, शिखर टूटकर बिखर रहे हैं,

लेकिन मानव है कि – आज भी प्रकृति से होड़ करता है,
प्रकृति संग चलना नहीं चाहता, उस पर विजय पाना चाहता है,
और जब प्रकृति बिफरती है तो य़े मानव बिखर जाता है.

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एम.आर.अयंगर.

रविवार, 23 जून 2013

बाबूजी का घरौंदा.

बाबूजी का घरौंदा.


रोड़ा-रोड़ा जोड़-जोड़ कर

बना घरौंदा बाबूजी का.

ना ! ना ! बाबूजी के बाबूजी का.!.....

बाबू जी की यहीं पैदाईश,

जीवन भर थी यहीं रिहाईश,

उनकी पूरी यहीं परवरिश,

यही घरौंदा उनका घर है,

घर से उनको प्यार हो गया.

दीवारों से प्यार हो गया.


लेकिन क्यों कर ?

तुमने इसका ईंट निकाला,

तुम कहते हो एक ईंट से..

क्या उनका घर ढह जाएगा ?


लेकिन निकले एक ईंट से,

यह कमजोर हुआ जाएगा.

घर से सबको जो लगाव था ,

वह कमजोर हुआ जाएगा.


गर भैया छोटे – बड़े, चचेरे,

किसी - किसी दिन यही समझकर,

एक-एक यदि ले जाएंगे,

धीरे- धीरे निकली ईंटें,

घर को ही कमजोर करेंगी.


अब बोलो तुम, 

ऐसे घर पर ..

क्या होगा तूफां आएगा ?

या घमासान बारिश हो जाए,

कह सकते हो नहीं ढहेगा ?


बाबूजी का घर ढहता है,

और पड़े हैं बड़े मजे में ?

कैसे होगा ?

बाबूजी अब क्या कर पाएँ,

घर भी है कमजोर, व दिल भी,

ढहना अब या ढहना तब है,

गर ईंटा रोड़ा नहीं जुड़ेगा,

तो, तब का काम हुआ जाएगा.


आओ जोडें ईंटा रोड़ा,

बाबूजी का दिल रख लें हम,


उनको घर से प्यार हो गया,

दीवारों से प्यार हो गया,

रहे घरौंदा इसी तरह से,

कम से कम इतना कर लें हम.


अयंगर.