MY THIRD BOOK

MY THIRD BOOK
मेरी तीनों प्रकाशित पुस्तक

बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

जिद




जिद

जायज न हो शायद तुझे दोष देना
कन्हैया, मगर मैं तो मजबूर हूँ.
तुम्हारे किए का हरजाना देने, मैं
कब तक सहूँ, मैं कब तक मरूँ.

इस मोड़ पर जिंदगी के मेरे तुमने
चौराहे लाकर खड़ा कर दिया.
जिस गली लाँघकर मैं यहाँ आ गया था
फिर उस गली में लाया गया.

नहीं रास मुझको अभी भी गली यह,
तुम्हें भी निराशा ही हाथों लगेगी,
तकदीर तुमने लिख क्या दिया है,
मजबूर उससे मुझे तुम करोगे
?

देख लेना बदलना पड़ेगा तुम्हें ये,
मेरे कर्म मजबूर तुमको करेंगे,
ठाना समझ सोच कर मैंने, मुझको
कोई लीक से ना जुदा कर सकेंगे,

जो भी किया तुमने सही तो नहीं है,
तेरी जिद, मेरी जिद से बड़ी तो नहीं है.
............

परिचय



परिचय.
आइये ! हम मिलवाते हैं आदरणीय माड़भूषि रंगराज 'अयंगर' से परिचय
https://loktantrasanvad.blogspot.in/2018/02/blog-post_26.html

३४........आलोचना और सृजन

 आलोचना और सृजन 
एक गहरा रिश्ता लिए हुए निरंतर  प्रगति के पथ पर गतिमान है। किसी की आलोचना करना संभव है एक प्रतिशोध की भावना 
के वशीभूत होकर स्वयं मन के उद्गार लोगों के समक्ष प्रस्तुत करना परन्तु यह कदापि नहीं कि इससे आपका अहित ही हो और यह आप पर पूर्णतः निर्भर करता है कि आप लोगों की आलोचनात्मक टिप्पणी को किस अर्थ में लेते हैं। सकारात्मक अर्थ ! एक नई दिशा में आपका प्रवेश, एक जीवंत समाज के निर्माण में। कुछ महानुभाव आलोचनात्मक टिप्पणी से बचते हैं, ज़ाहिर है रूढ़िवादी परम्पराओं के पक्षधर जो समाज को एक नई दिशा देने में पूर्णतः अक्षम। सोचना आपको है ! क्योंकि चुनाव भी आपका, वर्तमान भी आपका और वैसे भी भविष्य कौन जानता है ? न आप और न ही हम फिर भी वर्तमान की वे सभी प्रतिक्रियायें अपेक्षित, एक बेहतर भविष्य हेतु। जिसकी दिशा व पहल एक ऐसे लेखक व आलोचक द्वारा ब्लॉग जगत में निरंतर गतिमान है। आइये ! हम मिलवाते हैं 
 आदरणीय माड़भूषि रंगराज 'अयंगर' 

परिचय 
 आँध्र प्रदेश के पश्चिम गोदावरी जिले में बीसवीं सदीं के छठी दशाब्दि में जन्मा और अभिभावकों के रेलवे में नौकरीपेशा होने के कारण बिलासपुर, छत्तीसगढ़ से विद्यार्जन हुआ. शिक्षा के नाम पर विज्ञान (बी एस सी), विद्युत अभियाँत्रिकी में स्नातक (बी ई) और प्रबंधन में डिप्लोमा मात्र हुआ. बचपन से लेखन में रुचि रही. पहली रचना ताजमहल 1968 में, मंच पर पढ़ी गई, उस पर मिले प्रोत्साहन और बधाइयों ने इसे शौक ही बना दिया. वैसे लेखन की रुचि को पितृ - ऋण कहा जा सकता है. पिताजी तेलगू भाषा में लिखते थे और खड़गपूर (बंगाल) के आँध्र समाज में काफी सक्रिय थे. उनको भेंट में मिली दिग्गजों की पुस्तकें आज भी मेरे पास धरोहर हैं. मेरी भाषा पर पकड़ में पिताजी का बहुत सहयोग रहा. उनके साथ रात भर किसी शब्द – वाक्य या कविता को लेकर चर्चा होती थी. 1979 में शिक्षा पूरी होने के बाद नौकरीवश उत्तर में अंबाला (चंडीगढ़ के पास) से पूर्व में गौहाटी और पश्चिम में द्वारकाजी तक जाने का मौका मिला. दक्षिण में नौकरी का मौका नहीं मिला. जिससे विभिन्न भाषाएँ सीखने का अवसर भी मिला. मातृभाषा तेलुगु के अलावा हिंदी, अंग्रेजी, बंगाली, पंजाबी (गुरुमुखी), गुजराती लिख पढ़ बोल लेता हूँ. कम पकड़ के साथ कन्नड, तामिल, असामिया और मराठी में भी काम चला लेता हूँ. हाँ वैसे हिंदी भाषा क्षेत्र से शिक्षित होने के कारण हिंदी पर ज्यादा पकड़ है. अक्टूबर 2015 में इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन से , सेवानिवृत्त हुआ और हैदरबाद, तेलंगाना में बस गया हूँ.

साहित्यिक शिक्षा के रूप में हिंदी साहित्य विषय के साथ हायरसेकंडरी परीक्षा मात्र ही मेरी हिंदी की उच्चतम शिक्षा है. पर दक्षिण भारतीय मूल का होने के कारण किसी ने भी मुझे हिंदी में प्रवीण नहीं माना. मैं हर जगह अहिंदी भाषी ही माना गया. इसीलिए पाठकों का इतना आदर मुझे जरूरत से बेहद ज्यादा महसूस होता है. जहाँ तक साहित्यिक उपलब्धियों की बात है, ज्यादा कुछ नहीं है. बचपन के बाद करीब 1984 से रचनाएँ पत्रिकाओं / अखबार में प्रकाशित होती रही हैं. विशेषतः इंडियन ऑयल, रेल्वे की और नराकास (नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिती )पत्रिकाओं में तो भरमार है.

साहित्यिक उपलब्धि

प्रकाशित  पुस्तकें  :

 १ . दशा और दिशा  - ISBN No. 978-93-85818-63-9
प्रकाशक ऑनलाईन गाथा , अप्रेल 2016.
पुस्तक प्रकाशक के पास की ऑल टाईम बेस्ट सेलर हुई.
पुस्तक प्राप्ति का लिंक
http://www.bookstore.onlinegatha.com/bookdetail/354/Dasha-Aur-Disha.html

२. मन दर्पण –ISBN No. 978-81-933482-3-9
बुक बजूका पब्लिकेशन , मई 2017.
पुस्तक प्राप्ति का लिंक
http://www.bookbazooka.com/book-store/man-darpan.php


 

संपर्क – मो. 8462021340 (वाट्सप भी)
मेल –laxmirangam@gmail.com
ब्लॉग –https://laxmirangam.blogspot.in/
-----------------------------------------'लोकतंत्र' संवाद मंच आज के
 'सोमवारीय' साप्ताहिक अंक में
आदरणीय  माड़भूषि रंगराज 'अयंगर'  जी का
हार्दिक स्वागत करता है।