मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.

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मन दर्पण

बुधवार, 4 मई 2011

रिश्ते ... दिल के...



रिश्ते दिल के...

कमल अपने तबादले पर जम्मू से एर्नाकुलम पहुँचा. उसे कोट्टायम में तबादले पर जॉइन करना था.

कमल सर्विस में काफी अरसा गुजार चुका था. कंपनी में वे कई वरिष्ठ अधिकारियों से पुराने थे. पर उनकी हकीकत बयाँ करने की आदत उनके पदोन्नति के आड़े आती थी. काम में पक्का होने की वजह से कमल ने झुकना सीखा ही नहीं था. कमल को पदोन्नति की परवाह नहीं थी. उनके जीने का तरीका अजीब ही था. अपनी तरह से जीने की चाह भरपूर थी. वह बदलना नहीं चाहते थे. इन सबके बावजूद भी लोग उनकी काफी इज्जत करते थे.

कमल ने पहले ही अपने होने वाले नए उच्च अधिकारी से संपर्क साधा, ताकि सारी कार्रवाई सही तरीके से और सलीके से हो जाए. अधिकारी ने भी उसे प्रोत्साहित किया और कहा- आप हवाई अड्डे से सीधे यहीं कार्यालय क्यों नहीं आ जाते. नाश्ता साथ कर लेंगे .. आपकी फ्लाईट तो भोर सुबह साढे छ : की है, खा कर कहाँ निकल पाओगे. अपनी पोस्टिंग पर बाद में चले जाना. वैसे वहाँ उस दिन आपसे वरिष्ठ  अधिकारी नहीं होगा इसलिए आप यहाँ जॉइन भी कर लें.

सारी बातों के बाद तय हुआ कि कमल आगमन के पिछली शाम एक बार अपनी यात्रा की खबर दें, जिससे हवाई अड्डे पर गाड़ी उन्हें लेने जाए. लेकिन अजब हुआ. उस दिन कमल फोन करते रहे, एस एम एस भेजते रहे, पर साहब का न फोन पर जवाब मिला न ही एस एम एस पर.

हार कर कमल ने अपने बचपन के एक मित्र से बात की, जो पहले ही कह रहा था भैय्या मैं आपको लेने हवाई अड्डे आ जाऊंगा, लेकिन कमल ही मना करते आए. आज कमल की सुन उसने कहा , कोई बात नहीं भाई साहब, आपको लेने मैं हवाई अड्डे आ जाऊंगा.

सही, सुबह जब कमल त्रिवंद्रम पहुंचा, तब ही साहब का फोन आया. बोले, भई गाडी आ रही है थोड़ा इंतजार कर लेना, इंडिगो है नंबर है 3550. बाहर कमल का दोस्त खड़ा था. गाड़ी आने पर कमल ने उसे दोस्त की गाडी के पीछे आने को कहकर दोस्त के घर चल पड़े. वहां चाय नाश्ता करने के बाद कार्यालय की गाड़ी से कार्यालय आ गए. उधर चालक ने साहब को देरी का कारण बता दिया.

साहब कमल से पूछ बैठे – यहाँ ऐसा कौन सा रिश्तेदार हो गया, जहाँ आप हमसे मिलने के पहले चल दिए. नाश्ता करने के बाद यहाँ आए हो?

कमल ने सवाल की तरह का जवाब दे डाला. मैंने कल (रविवार) को आपसे बात करने की बहुत कोशिश की. एस एम एस भी भेजे. पर न आपका फोन आया, न ही कोई एस एम एस. मुझे लगा आप किसी परेशानी में पड़ गए हैं और सोचा आपको और क्यों परेशान किया जाए. इसलिए मैनें अपने बचपन के दोस्त को फोन किया और हवाई अड्डे बुला लिया.

सर, कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो भौतिक दूरी से परे रहते हैं. नजरों से दूर होने पर भी, उपर की परत सूखने के बाद भी, रिश्तों की गर्मी भीतर बनी रहती है और मौका पाते ही – या कहे भौतिक दूरी मिटते ही गर्मी बाहर आ जाती है. इन रिश्तों का नाम नहीं होता – बस ये तो रिश्ते ही होते हैं. इन रिश्तेदारों में कोई खून का रिश्ता नहीं होता ये दिल के रिश्ते होते हैं. ..........................................................................................................

एम.आर.अयंगर.
मों 09907996560