मेरा आठवाँ प्रकाशन / MY Seventh PUBLICATIONS

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बुधवार, 4 मई 2011

रिश्ते ... दिल के...



रिश्ते दिल के...

कमल अपने तबादले पर जम्मू से एर्नाकुलम पहुँचा. उसे कोट्टायम में तबादले पर जॉइन करना था.

कमल सर्विस में काफी अरसा गुजार चुका था. कंपनी में वे कई वरिष्ठ अधिकारियों से पुराने थे. पर उनकी हकीकत बयाँ करने की आदत उनके पदोन्नति के आड़े आती थी. काम में पक्का होने की वजह से कमल ने झुकना सीखा ही नहीं था. कमल को पदोन्नति की परवाह नहीं थी. उनके जीने का तरीका अजीब ही था. अपनी तरह से जीने की चाह भरपूर थी. वह बदलना नहीं चाहते थे. इन सबके बावजूद भी लोग उनकी काफी इज्जत करते थे.

कमल ने पहले ही अपने होने वाले नए उच्च अधिकारी से संपर्क साधा, ताकि सारी कार्रवाई सही तरीके से और सलीके से हो जाए. अधिकारी ने भी उसे प्रोत्साहित किया और कहा- आप हवाई अड्डे से सीधे यहीं कार्यालय क्यों नहीं आ जाते. नाश्ता साथ कर लेंगे .. आपकी फ्लाईट तो भोर सुबह साढे छ : की है, खा कर कहाँ निकल पाओगे. अपनी पोस्टिंग पर बाद में चले जाना. वैसे वहाँ उस दिन आपसे वरिष्ठ  अधिकारी नहीं होगा इसलिए आप यहाँ जॉइन भी कर लें.

सारी बातों के बाद तय हुआ कि कमल आगमन के पिछली शाम एक बार अपनी यात्रा की खबर दें, जिससे हवाई अड्डे पर गाड़ी उन्हें लेने जाए. लेकिन अजब हुआ. उस दिन कमल फोन करते रहे, एस एम एस भेजते रहे, पर साहब का न फोन पर जवाब मिला न ही एस एम एस पर.

हार कर कमल ने अपने बचपन के एक मित्र से बात की, जो पहले ही कह रहा था भैय्या मैं आपको लेने हवाई अड्डे आ जाऊंगा, लेकिन कमल ही मना करते आए. आज कमल की सुन उसने कहा , कोई बात नहीं भाई साहब, आपको लेने मैं हवाई अड्डे आ जाऊंगा.

सही, सुबह जब कमल त्रिवंद्रम पहुंचा, तब ही साहब का फोन आया. बोले, भई गाडी आ रही है थोड़ा इंतजार कर लेना, इंडिगो है नंबर है 3550. बाहर कमल का दोस्त खड़ा था. गाड़ी आने पर कमल ने उसे दोस्त की गाडी के पीछे आने को कहकर दोस्त के घर चल पड़े. वहां चाय नाश्ता करने के बाद कार्यालय की गाड़ी से कार्यालय आ गए. उधर चालक ने साहब को देरी का कारण बता दिया.

साहब कमल से पूछ बैठे – यहाँ ऐसा कौन सा रिश्तेदार हो गया, जहाँ आप हमसे मिलने के पहले चल दिए. नाश्ता करने के बाद यहाँ आए हो?

कमल ने सवाल की तरह का जवाब दे डाला. मैंने कल (रविवार) को आपसे बात करने की बहुत कोशिश की. एस एम एस भी भेजे. पर न आपका फोन आया, न ही कोई एस एम एस. मुझे लगा आप किसी परेशानी में पड़ गए हैं और सोचा आपको और क्यों परेशान किया जाए. इसलिए मैनें अपने बचपन के दोस्त को फोन किया और हवाई अड्डे बुला लिया.

सर, कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो भौतिक दूरी से परे रहते हैं. नजरों से दूर होने पर भी, उपर की परत सूखने के बाद भी, रिश्तों की गर्मी भीतर बनी रहती है और मौका पाते ही – या कहे भौतिक दूरी मिटते ही गर्मी बाहर आ जाती है. इन रिश्तों का नाम नहीं होता – बस ये तो रिश्ते ही होते हैं. इन रिश्तेदारों में कोई खून का रिश्ता नहीं होता ये दिल के रिश्ते होते हैं. ..........................................................................................................

एम.आर.अयंगर.
मों 09907996560

शनिवार, 2 अप्रैल 2011

चेट - कॉल


शनिवार, २ अप्रैल २०११

चेट कॉल


चेट कॉल

यह कुछ बरस पहले की बात है. कहिए आप बीती है.

एक रविवार को दोपहर करीब तान बजे के  आसपास हम सब कैरम खेल रहे थे...
तभी मेरे फोन की घंटी बजी.

बात लैंड लाइन की है. वो जमाना मोबाइल का नहीं था.

जैसे मैंने फोन उठाया और ...हलो फरमाया ...

दूसरे छोर से एक सुरीली आवाज आई... आप कौन बोल रहे है?

मुझे सनक चढ़ गई, (फोन करके मुझसे पूछती है ? )...

मैंने पूछा - आपको किससे बात करनी है.

उधर से फिर वही सवाल... आप कौन बोल रहे है?

जब यही बात तीन चार बार हो ली, तब लगा ...

बात बेकाबू होती जा रही है, अब विराम देना चाहिए...

मैंने थोड़ी कड़क दार आवाज में पूछा .. आपको किससे बात करनी है?

शायद अबतक उधर भी ऊब आ गई थी.. ..

आवाज आई.., आपसे ही बात कर लेते हैँ.

मैने कहा... हाँ बेटा बोलो.. क्या बात करनी है...

शायद संबोधन ने अपना काम कर दिया ...

उधर से फोन रख दिया गया...


कभी कभी ऐसे मजेदार वाकए भी हो जाया करते है...

इसे एप्रिल फूल का फूल ही समझ लें चलेगा..

गुरुवार, 31 मार्च 2011

छींटाकशी-2

छींटाकशी -2

बोलिए हिंदी सरल है,
इसको सभी अपनाइए,
खुद जटिल हिंदी के परचे,
आप बाँटे जाइए.
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दो बूंद नयनों से गिरा,
दुख दर्द सारा धो लिया,
वरदान क्यों माँगे न कोई,
जब जी में आया रो लिया.
..................................

झुंझला के तुमने जैसे,
झिड़का था एक बार,
फिर एक बार वैसा ही अपना,
मुखड़ा सँवार लो.
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कैसे सुनाई दे मुझे,
जो जुबाँ तेरी कह रही,
शोरगुल जो कर रहे,
तेरे ये दो चंचल नयन.
.........................................
इशारों के तुम्हारे भी,
अदा यूँ हसीन होती है,
मत छूना मुझे,
मुझको बड़ी तकलाफ होती है,
अगर आदम ने हव्वा से,
कहा होता कि मत छूना,
न होता सार जीवन का,
न यह संसार ही होता.
.............................................

छींटाकशी-1

छींटाकशी - 1

कसम गीता और कुरान की ले,
गर सभी सच बोलें यहाँ,
तो वकीलों की जिरह की,
बँध रहा है क्यों समा ?
.................................

भीड़ से कतराए जो,
उनको ये मंशा दीजिए,
जाकर कहीं एवरेस्ट पर,
एक कमरा लीजिए.
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भूख लगती है उसे तो,
दूध से नहलाइए,
एक कतरा मुँह न जाए,
अच्छी तरह धमकाइए.
.......................................

बालकों ने गर उधम की,
इसकी सजा उनको मिले,
मत भिड़ो के है मुसीबत,
ये लूटते हैं काफिले.
.........................................

घिस रहा हूँ मैं कलम,
कोइ तलवे घिस रहा,
रगड़ ली है नाक उसने,
खूँ न फिर भी रिस रहा.
.........................................

साल भर हम सो रहे थे,
एक दिन के वास्ते,
जागते ही ली जम्हाई,
और फिर हम सो गए.
.........................................

हम कर सकें बेहतर जिसे,
अंग्रेज क्यों करने लगे,
आजादी अपने देश को वे,
दे गए क्या इसलिए  ???
……………………………………..

इंद्र धनुष के रंग क्यों गिनो,
यह दुनिया बहुरंगी है,
आलीशान मकानें में भी,
दिल की गलियाँ तंगी हैं,
मन:स्थिति कैसे भी बाँच लो,
वस्तुस्थिति तो नंगी है,
भले जुबानी हिदी बोले,
करें सवाल फिरंगी हैं,
भीड़ भरी है हाईवे पर अब,
और खाली पगडंडी हैं,
शहरों का अंधी गलियों में,
धन दौलत की मंडी है.