मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.

मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल  मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.
मन दर्पण

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

प्रकृति और मानव

                     प्रकृति और मानव
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                     पंचभूतों से बना,
                     माटी का पुतला आदमी,
                     कृतज्ञ परमेश्वर का होना,
                     इंसानियत है लाजमी,

                     फिर भी न कोई सोचता,
                     ईमान क्यों बेचें यहाँ,
                     इंसानियत उजड़ी हुई है,
                     और क्या पूछें यहाँ।

                     जो जी गए वह जिंदगी,
                     कल की क्या सोचा करें,
                     बाद क्या होने चला है,
                     आज क्यों जानें डरें?

                     सोचने में क्यों करें,
                     आज का दिन व्यर्थ हम,
                     गर मिलें जो गम हमें,
                     सहने में भी हैं समर्थ हम ?


                     अंजाम इसका है कि वर्षा,
                     पर्याप्त होती ही नहीं,
                     बीमारियाँ इतनी बढ़ीं कि,
                     माँएँ सोती भी नहीं,

                     प्रकृति खोती है संबल,
                     एक के भी ह्रास से,
                     लौटती अपने वजूद में,
                     अपनी तरह के प्रयास से,
                     आदमी संपूर्ण है क्या,
                     बस एक के वर्चस्व से ?

                     रुप प्रकृति क्रोध को,
                     कहते हैं हम भूचाल-अकाल,
                     सागर में आए बाढ़,
                     नहीं क्या काल, यह विकराल?

                     ओजोन की चादर फटी,
                     या फट गया है आसमाँ,
                     उष्णता बढ़ने लगी,
                     और घट रही है हरीतिमा

                     सर्वोन्मखी विकास अपना,
                     ध्येय होना चाहिए,
                     प्रकृति के संग मानव ,
                     नाव खेना चाहिए।

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                     एम.आर.अयंगर.
                     08000556936

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

आँखों का डाक्टर


आँखों का डाक्टर.

गोपी अपने दादाजी के साथ अस्पताल गया. दादाजी को अपनी नजर की जाँच करवानी थी. बच्चा था सो साथ हो लिया. दादाजी भी उसे साथ ले जाने में खुश थे सोचा चलो बच्चा भी घूम आएगा. गोपी की उम्र कोई चार बरस की होगी. कद होगा कोई दो –ढाई फुट.

दादाजी के साथ गोपी भी लाइन में खड़ा हो गया. लाइन मेंउनके आगे कोई 7-8 लोग और थे. सब अपना अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे. लेकिन गोपी अपने छोटे कद का लाभ उठाता हुआ जॉक्टर और मरीज के झाँकता रहा. सरकारी अस्पताल था सो छोटे – छोटे फ्लेपर टाइप के दरवाजे थे जो बड़ो कीनजर को ढ़ंक लेती थी. इसलिए बचे देख भी नहीं पाते थे कि अंजदर क्या हो रहा है. उन फ्लेपर दरवाजों का मकसद भी यही था. लेकिन छोटे कद के गोपी की नजर को ये दरवाजे रोक नहीं पाए.

वह डॉक्टर का हर मरीज के साथ सलूक देखता रह. पहले डॉक्टर उनसे बात करते. फिर हाथों से पलकों को ऊपर नाचे करके देखते और बाद में अपने टॉर्चवाले लेंस से आँखों के भीतर देखते फिर परची में कुछ लिख देते.

जब दादाजा के आगे केवल दो लोग रह गए और तासरा नंबर दादाजी का था तब अचानक गोपी ने दादाजी का हाथ जोर से खींचा और बोला – चलिए दादाजी. अचानक के इस बर्ताव से दादाजी भी चौंके.. अरे क्या हो गया ?

गोपी अपने लहजे में बोला- आपको आँख दिखानी है ना ? चलिए किसी और डाक्टर के पास चलते हैं. दादाजी समझ नहीं पा रहे थे कि बच्चे के मन में क्या है?

कुछ रुककर गोपी खुद बोल पड़ा. मैं कब से डॉक्टर साहब को देख रहा हूँ, दिन में, चार-चार ट्यूबलाइट जलाकर और चश्मा पहन कर भी डाक्टर को टार्च से देखना पड़ रहा है. उनको ठीक से दिखता ही नहीं . ये क्या आँख को देखेंगे इन्हें तो खुद तकलीफ है. इसलिए आप यहाँ से चलो, किसी और डॉक्टर के पास आँख दिखा लेना.

अब दादाजी समझे कि बचपन की मासूमियत में पोता क्या-क्या सोच रहा है.


रविवार, 3 अप्रैल 2011

हिंदी भाषा -- कुछ विचार





हमारी भाषा हिंदी – कुछ विचार

ऐसा कहा जाता है कि स्वर्ग तक बनती सीढ़ियों की प्रगति की रफ्तार देखकर देवता घबराए और इसे रोकने का निर्णय लिया. अनन्य तरीके खोजे गए और सरलतम उपाय जो समझ आया किया और सीढ़ियाँ अधूरी ही रह गईं.


देवताओ ने पता कर लिया कि सीढियाँ बनाने के काम से जुड़े सारे लोगों की भाषा एक थी इसलिए उनमें एकताल व तन्मयता थी. देवताओं ने उनकी भाषाएं अलग अलग कर दी ताकि वे एकजुट न हो सकें और इससे उन्हें सफलता हासिल हो गई.


शायद यही खेल अंग्रेजों ने हमारे देश में खेला जिससे आज भी हम भारतीय भाषायी एकजुटता के लिए तरस रहे हैं.


बात शायद किसी ने मनगढंत ही कही होगी या मजाक ही होगा लेकिन इससे यह बात समक्ष तो आती ही है कि भाषा का गठबंधन में एक विशेष स्थान है और इन्ही पदचिन्हों पर चलते हुए हमारे हिंदी भाषी पूर्वजों ने भाषा की एकता पर जोर दिया एवं एक राष्ट्रव्यापी भाषा को चुनना चाहा. शायद राजनैतिक कारणों से कुछ मतभेद हुए और लोंगों में सहमति नही बन पाई. फिर शायद ताजनीतिक कारणों से काँग्रेस के अधिवेशन में हिदी को राष्ट्रभाषा मानना एक मुद्दा ही बन गया.


राष्ट्रभाषा शब्द के लोगों ने इतने अर्थ निकाल लिए कि इस शब्द का कोई स्थिर अर्थ नहीं रह गया. राष्ट्र भर में बोली जाने वाली भाषाओं को कुछ ने राष्ट्र भाषा कहा, तो कुछ ने इसे देश की भाषा समझा. भिन्नता मिटाने की चेष्टा किसी ने की हो, ऐसा कहीं कोई वाकया नहीं मिलता. काँग्रेस का अपने 1949 के अधिवेशन में 14 सितंबर को इसे राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाना अन्य राजनीतिक पार्टियों को शायद रास नहीं आया. तब से अब तक राष्ट्रभाषा शब्द का कोई भी स्थिर अर्थ नहीं निकल सका.


शायद इसीलिए संविधान की भाषा समिति ने देश के राज काज की भाषा को राष्ट्रभाषा न कहकर राजभाषा कहा. इससे राष्ट्रभाषा शब्द का अस्तित्व करीबन खत्म ही हो गया. निश्चित व निष्कर्ष रूप में यह कहना मुश्किल है, पर ऐसा लगता है कि यदि काँग्रेस अपने अधिवेशन के पहले अन्य राजनीतिक पार्टियों से संपर्क करती, या यह काम लोंगों को विश्वास में लेकर किया जाता तो हिंदी के प्रचार-प्रसार से लोगों को शायद आपत्ति नहीं होती और हिंदी को पीठासीन करना आसान होता. शायद हिंदी के प्रति लोगों का रवैया आज जैसा है, नहीं होता और हमारी राज काज की भाषा हिंदी देश की राजभाषा नहीं बल्कि राष्ट्रभाषा ही होती.

सन्  1995 में राजभाषा सचिवालय से प्रकाशित एक गृह पत्रिका में मैने पहली बार – राष्ट्र भाषाएँ – शब्द देखा, पढ़ा. वह तत्समय गृह मंत्री (श्री) एस.बी.चवन का लिखा था.


लेकिन आज भी हिंदी के समर्थक हिंदी को राष्ट्रभाषा कहते नहीं थकते. आज भी कई लोग राजभाषा एवं राष्ट्रभाषा के फर्क से वाकिफ नहीं है. इससे ऐसा लगने लगा है कि समाज का एक अंग आज भी हिंदी को राष्ट्रभाषा ही समझता है और हिंदी को राष्ट्रभाषा कहने में अन्य लोगों के विचार भटक जाते हैं.


अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि हिंदी के प्रणेताओं ने हिंदी के चहेतों को भी ऐसा खेल खिलाया कि उन्हें भी हिंदी से नफरत सी होने लग गई. आज भी ऐसे कार्यालय होंगे, जहाँ हिंदी अपनाने पर, उसका अंग्रेजी अनुवाद माँगा जाता होगा. कार्यालय इस तरह के अनुवाद की सहायता कर लोगों को हिंदी के प्रति  उत्साहित कर सकता है.


हर अभिभावक चाहेगा और उसे चाहना भी चाहिए कि उसके दिल का टुकड़ा आसमान की ऊंचाइयों को छुए. यदि उस मुकाम के लिए उसे हिंदी सीखनी या सिखानी पड़े तो लक्ष्य प्राप्ति के लिए वह हिंदी सीखेगा भी और सिखाएगा भी. अपने बच्चे को हिंदी के स्कूलों में भी पढ़ाएगा. तथ्यों की मेरी जानकारी के तहत भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है भाषा निरपेक्ष नहीं. इसलिए यहाँ आप किसी को भी, कोई भी धर्म अपनाने से रोक नहीं सकते, लेकिन भाषा के मामले में ऐसा नहीं है और भारतीयों को हिंदी सीखने लिए कहा जा सकता है. मेरी समझ में केवल इतना ही आता है कि राजनीतिक समीकरणों के लिए हमने हिंदी की यह हालत बना दी है.


हिंदी सीखने में थोड़ी कुछ कठिनाइयाँ हैं जैसे उच्चारण और लिंग भेद. जिनमें उच्चारण पर मैं यहाँ विचार करना चाहूंगा. विभिन्न भाषा भाषी हिंदी का उच्चारण सही तरीके से नहीं कर पाते. हिंदी के जानकारों को चाहिए कि उन्हें सही उच्चारण से अवगत कराएं, न कि उन पर हँसें. कई बार तो ऐसा समझ में आया है कि गलत उच्चारण के तर्कसंगत कारण हैं जिनका मैं यहाँ उल्लेख करना चाहूंगा.
दक्षिण भारतीय  “खाना खायाका उच्चारण काना काया के रूप में करते हैं. वह इसलिए कि तामिल वर्णमाला में प्रत्येक वर्ग में दो ही अक्षर होते हैं जैसे क, ङ. वहाँ ख,ग,घ अक्षर नहीं होते. इसालिए कमला व गमला शब्द कि लिपि तामिल में एक जैसी होगी. वे गजेंद्र को कजेंद्र कहेंगे और लिखेंगे भी. आँध्र वासियों के साथ यह संभावना कम होती है.


हमें लोगों की ऐसी समस्याओं को समझना चाहिए और हिंदी में उनकी रुचि का स्वागत करना चाहिए, न कि उनकी गलतियों पर हँसना चाहिए. लोग हँसेंगे – ऐसी भावना आने के बाद कोई भी आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं कर पाएगा. यदि किसी उत्तर भारतीय को दक्षिणी भाषा के शब्दों का उच्चारण करना पड़े तो कठिनाइयाँ समझ में आ जाएँगी. दक्षिण भारतीयों की जुबान काफी लचकदार होती है इसलिए क्लिष्ट से क्लिष्ट शब्दों का उच्चारण भी वे आसानी से कर लेते हैं.  और यही एक खास कारण है कि दक्षिण भारतीय उत्तर भारतीयों की अपेक्षा ( खलकर अंग्रेजी के) उत्तम व सफल स्टेनोग्रफर होते हैं.


अब पूर्व की तरफ चलें. बंगाल का साहित्य बहुत ही धनी है. फिर भी वहाँ की भाषा में दो अक्षर एक जैसे हैं. क्या यह उचित माना जाए कि बंगाली जैसे समृद्ध भाषा के दो अक्षर एक से हों. अब देखिए Biswas शब्द को अपनी भाषा में विश्वास लिखते और बिश्वास उच्चरित करते हैं. उनके इस उच्चारण से साफ जाहिर होता है कि दोनों के उच्चारण भिन्न हैं और ऐसा तब ही संभव होगा जब ये दो अलग अलग वर्ण रहे हों. दो वर्णों के लिए एक ही  अक्षर  लिखा जाता है लेकिन उनका उच्चारण अलग अलग होता है. ऐसा नही है कि बंगाली भाषा में का प्रयोग नहीं होता. रसपान करते हैं. यदि मेरी याददाश्त धोखा नहीं दे रही तो सन् 1960 के दशक में बंगाली पत्रिका नवकल्लोल को अंतिम पृष्ठ पर अंग्रेजी में Navakallol लिखा जाता था लेकिन अब उसे Nabakallol लिखा जाता है.


बंगाली भाषा के उच्चारण के बारे में लोग मजाक करते थे कि मुँह में रसगुल्ला डालकर हिंदी बोलिए, आपका उच्चारण बंगाली भाषा की तरह हो जाएगा. इसी तरह का असर बंगभाषियों के हिंदी उच्चारण में मिलता है. कोई भाषाविद ही इसका पर्दे के पार की खबर दे पाएगा.


बंगभाषी अक्सर कहते मिलेंगे, आमि जॉल खाबो, मद खाबो, सिगारेट खाबो इतयादि... यानी में पानी, शराब, सिगरेट पिऊंगा / पिऊंगी. पर उनके साहित्य में पढ़िए - वे जलपान करते हैं, धूम्रपान करते हैं, मदपान करते हैं, यह शायद समय से आया फर्क है कि लोग सेवन को खाने कह जाते हैं.
पंजाब में लिखी जाने वाली गुरुमुखी लिपि में आधा अक्षर लिखने का प्रवधान नहीं है. इसीलिए पंजाबी स्कूल को सकूल, स्त्री को सतरी या इस्तरी, इंद्र को इंदर, शब्द को शबद कहते हैं. लेकिन द्वयत्व की मात्रा होने की वजह से वे मम्मा, दद्दा, चम्मच, कथ्था, गय्या, बच्चा, धुत्त जैसे शब्दों का उच्चारण बड़ी आसानी से कर लेते हैं.


महाराष्ट्र में को सा जोर देकर उच्चरित किया जाता है. वहाँ ( मराठी भाषा में) अक्सर छोटे को तू व बड़ों को तुम कहकर संबोधित किया जाता था, जो मराठी भाषा के तू एवं तुमी के पर्यायवाची के रूप में व्यवहरित होते थे. आप शब्द शायद मराठी में काफी बाद में आया है इसलिए अभी केवल शिक्षित वर्ग ही इसका प्रयोग करता है। मराठी जानने वालों को समझ आ रहा होगा कि इसमें कोई गलत मानसिकता नहीं है बल्कि जानकारी की कमी लोगों को आभास कराती है कि मराठी की तरह ही तू एवं तुम का प्रयोग हिंदी में भी हो रहा होगा.


इन तथ्यों को विचारने पर यह प्रतीत होता है कि जिस तरह ठंडे प्रदेशों में टाइट और गर्म प्रदेशों में ढीले पोशाक पहनना नियति है , जिस तरह ठंडे प्रदेशों में आमिष भोजन व मदिरा सेवन आवश्यक सा बन गया है उसी तरह प्रदेशों की बोली में भी वहाँ के वातावरण का समुचित असर आ गया है, और दिखता भी है. ऐसा देखा गया है कि ठंडे प्रदेशों कि भाषा अपेक्षाकृत सरल उच्चारण वाली होती है और गर्म प्रदेशों की भाषा कठिन उच्चारण वाली होती है. इसीलिए दक्षिण भारतीय भाषाएं उत्तर भारतीयों के लिए काफी कठिन है. भौगोलिक कारणों से शायद दक्षिण भारतीयों के जुबान में ज्यादा लचीलापन होता है जो उन्हें कठिन शब्दों का सही उच्चारण करने में सहायक होती है.


उधर आसाम में और इधर गुजरात के कच्छ इलाके में को सा उच्चरित किया जाता है. ऐसा लगता है कि इन्ही किन्ही कारणों से सिंधी – हिंदी , सिंधु – हिंदू शब्द बने होंगे. सिंधु घाटी की सभ्यता से हिंदुओं का संबंध होने का यह भी एक कारण हो सकता है.


हिंदी वर्णमाला में भी अक्षरों का रूप स्वरूप परिवर्तन भी काफी हुआ है. वर्तनी के नियम भी बने व बदले हैं. अ, आ, ए, ऐ, झ, ख, ण, श्र, क्ष, अक्षर के यह रूप बाद की देन है पहले इन्हें अलग तरह से लिखा जाता था. अक्षर ळ मराठी भाषा से अपनाया गया. बड़ी ऋ, लृ और बड़ी लृ वर्ण तो लुप्त प्राय हो गए. चंद्र बिंदु व अर्ध चंद्र तो लुप्त हीहो गए. लेखनी की सुविधा, विशिष्ट शब्दों में अक्षरों – अक्षरयुग्मों के बीच संशय ने इन की जरूरत को जन्म दिया. पहले अक्षर रव जैसा लिखा जाता था यदि इसे र और व  को अक्षर युग्म पढ़ें तो अर्थ ही अलग हो जाता था, इसलिए इनके बीच जोड़ का प्रावधान देकर ख बनाया गया. वर्तनी की सुधार के लिए अ व ये की जगह ए का प्रयोग उचित माना गया.


पंचाँग को सही लिखना हो तो पञ्चाङ्ग लिखना होगा – सरलीकरण ने इसे नया रूप दिया. हुआ का बहुवचन हुए तथा पाया का बहुवचन पाये – यानि स्वर के बहुवचन में स्वर व व्यंजन के बहुवचन में व्यंजन को स्थान दिया गया. पंचमाक्षर नियम के अनुसार किसी भी शब्द में पूर्ण बिंदु ( अनुस्वार) के बदले उसके बाद आने वाले अक्षर के वर्ग का पंचमाक्षर ही लगाया जाना चहिए. या यों कहिए कि हर वर्ग के लिए एक अनुस्वार हमारी वर्ममाला में दिया गया है और उसे उस वर्ग के अक्षरों के साथ ही प्रयोग करना चाहिए. इसके उदाहरण हैं – कङ्काल, पञचाङ्ग. भण्डार, चन्दन और कम्बल. लेकिन इस दुविधा से बचाने के लिए पूर्ण बिंदु (अनुस्वार) का सहारा लेकर हिंदी को सरलीकृत किया गया. अब ऊपर के शब्दों को आसानी से – कंकाल, पंचांग, भंडार, चंदन व कंबल सा लिखा जा सकता है. इसके साथ वर्ण माला में अनुस्वार की आवश्यकता खत्म हो गई है और कुछ ही समय में यह अपने आप ही लुप्त हो जाएगा. ऐसा ही हाल हुआ उऋण के साथ – जहाँ पहले बडी ऋ की मात्रा लिखी जाती थी, वहाँ अब छोटी ऋ की मात्रा का प्रावधान हो गया और बड़ी ऋ लुप्त हो गई.


आज भी मैं इस दुविधा में हूं कि कौंन सी लिपि सही है – हिमांशु – हिमान्शु अथवा हिमाम्शु या हिमाँशु. विस्तार में यह कि पंचमाक्षर नियम ने तो वर्गों के तहत अनुस्वार का सम्सया का निदान कर दिया लेकिन वर्गांतर अक्षरों के लिए समस्या बनी ही रही.


आज भी अक्सर मैं और मेरे साथी जिरह करने लगते हैं कि I am going का सही उच्चारण ऐ एम गोइंग है या नहीं. कोई जानते हों तो सूचित करें इंतजार रहेगा.



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एम.आर.अयंगर.
08000556936
9428003626