मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.

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शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

राघव का हश्र


राघव का हश्र

जूही को बचपन से ही बहुत लगाव है अपने पड़ोसी अंकल राघव से. उन्होंने जूही  के मम्मी-पापा की शादी भी एटेंड की थी. बचपन में जूही के अभिभावक बच्चों को राघव के पास छोड़ कर रात में कोई 9 बजे सारेगामा की शूटिंग देखने जाते थे. आते - आते देर रात 12 से 1230 तक हो जाते।

बच्चे देखते कि  हॉल में राघव अंकल बैठे हैं, तो सो जाते. उठते थे पानी, बाथरूम के लिए तो हॉल में नजर डालकर तसल्ली कर लेते और हेल्प से फारिग होकर फिर सो जाते.  राघव के आसपास होने पर बच्चे सुरक्षित व सुकून अनुभव करते थे. 

एक बार जब जूही अस्पताल में भर्ती थी। तब पापा और राघव दोनों रात में अस्पताल में ही थे. पापा जूही के पास बैठे थे और राघव कमरे में ही बेंच पर बैठे थे। राघव और पापा दोनों सहमत थे कि पापा के पास जूही को आराम से नींद आ जाएगी.

जूही की आँख खुली तो उसने पापा से कहा... आप जाकर बेंच पर सो जाएँ. राघव अंकल मेरे पास बैठेंगे.

पापा को अच्छा तो नहीं लगा. एक बार जूही को समझाने की कोशिश किए किंतु जब बच्ची नहीं मानी तो बच्ची के लिए मान गए.  अब राघव जूही के सरहाने बैठा हुआ था और पापा बेंच पर लेटे थे.

रात जूही अंकल का हाथ पकड़कर सोई क्योंकि उसे डर था  कि कहीं अंकल चले न जाएँ. जब भी राघव का हाथ जूही के हाथ से अलग होता, वह जाग जाती. देखती राघव पास ही बैठा  है तो फिर सो जाती. 

सुबह पापा ने यह खबर मम्मी जी  तक पहुँचाई.

शायद यह पहला झटका था.

जूही और राघव का रिश्ता गाढा होता गया. राघव ने जूही के अभिभावकों से उसे गोद लेने की भी बात की. सब तैयार, पर मम्मी नहीं मानी.  जूही को भी इसकी खबर हुई. उसे किसी में कोई ऐतराज नहीं था.

राघव की माँ को जुही दादी कहती थी. उनके हाथ के पराठे और आलू भुजिया  की जूही खास फरमाईश करती और खाती थी.

फलतः जूही घर पर ढंग से नहीं खाती थी और यह मम्मी की परेशानी की वजह बन रहा था. उन्हें पता नहीं था कि जूही राघव के घर खाकर आ रही है.

 एक दिन मम्मी जूही को खोजते - खोजते हुए राघव के घर आई और देखी कि जूही आराम से और   पराठे व आलू की भुजिया खा रही है. एक तरफ उन्हें खुशी हुई कि जूही चुपचाप कुछ खा तो रही है और दूसरी तरफ नाराजगी भी कि घर में खाती नहीं है, नखरे करती है. उन्हें लगा कि दादी उसे बिगाड़ रही है.  मम्मी ने दादी को रोकने की कोशिश की कि जूही को न खिलाएँ जिससे कि वह घर पर खाने लगे।

दादी तो मम्मी की माँ से भी बड़ी. ही थी. समझाने लगी कि बच्ची है खाने दो, कैसे मना कर.दूँ. मम्मी चुप तो हुई पर मन नहीं माना उनका. खाने के बाद उसे ले गई. 

यह दूसरा झटका था.

अब जूही बड़ी हो रही थी. जो देखती कह जाती थी. उसके मासूम मन को अच्छा बुरा समझता नहीं था.

एक दोपहर जूही अकेली पहली मंजिल से चलकर तीसरी मंजिल तक आकर राघव के घर पर बेल बजाई. अकेली,  भरी दोपहरी में, गर्मी के दिन, बात समझ नहीं आई.  राघव के घर भी सब सो रहे थे. उसने जूही से पूछ लिया...अकेले कैसे आ गई? दरवाजा खुला था क्या? मम्मी घर पर नहीं है क्या?

जूही आराम से बोली  - हैं न, सो रही है. 
दरवाजा किसने खोला -- कुंडी लगी थी, मैंने खोल लिया
दूसरा सवाल... पापा कहाँ गए? जूही बोली : मम्मी के साथ सो रहे हैं.

लगा कि समय आ गया कि अब जूही के अभिभावकों को सँभलना चाहिए. दोस्त की हैसियत से, करीबी होने के कारण उन्हे चेता देना चाहिए ऐसा राघव ने महसूस किया. पता नहीं जूही कब, कहाँ,  किसे क्या बता दे.

राघव ने  जूही के पिताजी को बताया कि अब सँभलने के दिन आ गए हैं. बिटिया जो देख रही है वह कहने की उम्र में आ गई है, कह रही है. उसने उसने मुझे ऐसा बताया. अब सँभलने का काम बड़ों का ही होगा। 

जूही के पापा को बात समझ आई और उन्होंने चाहा कि राघव घर चलकर वहाँ  अपनी जबानी भाभीजी को बताए. उस समय जूही भी वहीं थी. राघव ने भाभीजी को भी सारी बात  बताया.

इसपर तुरंत भाभीजी के तेवर दिख गए. राघव डर गया. बस रोया नहीं, पर उनसे निवेदन जरूर कर आया कि जूही को कुछ न कहें, वह अभी ना समझ नादान है.है. आप ख्याल किया करें. इस उम्र में बच्चे सच बोल जाते हैं, पर मतलब नहीं समझते. कहकर उदास राघव अपने घर लौट आया.

यह तीसरा झटका था.

बच्ची को पता नहीं डांटा गया या मारा गया, पर वह दहशत में आ गई. बस. 

जूही राघव दूर दूर रहने लग गई. राघव का मन बहुत रोया. उसका मन दिन ब दिन परेशान होने लगा. काम में, जिंदगी में किसी में मन नहीं लगता था. रातें रोते - रोते बीत रही थी. जब रहा नहीं गया तो भड़ास निकालने के लिए - मन हल्का करने के लिए  राघव ने अपनी पीर को एक कविता के रूप में लिखा... "हश्र"



राघव जूही से दूर रह नहीं पा रहा था, पर कविता में अपना दुख उतारने के बाद वह कुछ हल्का महसूस करने लगा. इसके बाद समय के सहारे उसका दर्द घटता गया. वह जूही के बिना जीना सीख रहा था. इस घटनाक्रम ने राघव का जूही के घर उठना बैठना भी करीब बंद ही हो गया था।

अगले जनमदिन पर जूही राघव को न्यौता देने आई. जिससे राघव का मन भर आया. वह जनमदिन मनाने जूही के घर गया. तबतक जूही के अभिभावकों को राघव का दुख समझ ममें आ गया था. सभी खुश थे. उसके बाद रिश्ते सुधरते गए. साल भर बाद सब कुछ यथावत हो गया. सारे आपसी रिश्ते खुशी खुशी निभने लगे.
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