मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.

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बुधवार, 7 दिसंबर 2016

नरेंद्र


नरेंद्र

पिछली बार जब कादिर अपने एक दोस्त के शहर गया तो उसको संगी साथियों ने कहा, भाई अपने कालेज के चार पाँच लोग हैं यहाँ. चलो, किसी दिन सब मिलते हैं किसी जगह. सहमति बनी तो औरों से भी संपर्क किया गया. सभी को बात अच्छी लगी. तब फाईनल किया और एक शाम होटल में सब इकट्ठे होंगे.

उनमें से एक कक्षा चार से कादिर की साथी था और वह बी ई तक साथ था. निश्चित दिन वह कादिर को साथ लेकर गया क्यों कि कादिर को  इस शहर का ज्ञान नहीं था. जब वहाँ पहुंचे तो देखा कुल पाँच में से  तीन तो हमउम्र ही थे. दो तो साथ आए ही. तीसरा भी उसी शहर का था जिसने अन्य विभाग से बीई किया था. चौथा एक साल सीनियर था. पर पाँचवां तो करीब चार पाँच साल छोटा था. वह अलग डिसीप्लीन के क्लास में था.

संध्या सत्र का प्रारंभ परिचय से हुआ. उस जूनियर से सबका परिचय कराया जा रहा था. बाकी तीन तो आपस में परिचित थे. पर परिवार वालों से परिचय हो रहा था. सीनियर से भी कुछ परिचय तो था पर उनके परिवार से भी सबका परिचय हुआ. बाकी जब कादिर का नंबर आया तो केवल जूनियर रह गया था. सब अपना और अपने परिवार का परिचय दे रहे थे.

सब के बाद आया मौका उसके पास. वह एक जूनियर था. उसको अपना परिचय कराना था सबसे. तो सबसे पुराने साथी ने शुरु किया. यह नरेंद्र हैं, हमसे चार साल जूनियर थे कालेज में. अब यहाँ एक प्राईवेट कंपनी में जी एम हैं. (वह किसी कंपनी में जी एम था. बाकी भी ऐसे ही थे.) फिर बाकियों की तरफ इशारा करते हुए शुरु हो गए... “”नरेंद्र, यह है.. रमेश, हमारे ही बैच में मेकानिकल इंजिनीयरंग से हैं. यह  है अनिल, हमसे एक साल सीनियर इलेक्ट्रिकल से” - वह खुद तो नरेंद्र का परिचित था ही. अंत में कादिर के सामने आकर उससे पूछा - इनको तो तुम नहीं जानते होगे, ये यहाँ नहीं रहते...

नरेंद्र खिलखिलाकर हँसा... अरे सर क्या बात कर रहे हैं.. इनको तो मैं आप सबसे पहले से जानता हूँ. सब की सिट्टी - पिट्टी गुम. सबको आश्चर्य कि जिसके बारे में सबसे ज्यादा शंका थी कि अपरिचित होंगे, वहीं सबसे पुराना जान पहचान निकल आया. हम बचपन में साथ ही मिलकर खेलते थे. इनका नाम कादिर है. हमारे ही, शहर में हमारे ही मुहल्ले में रहते थे. मेरे पिताजी और इनके पिताजी दोनों रेल्वे में साथ साथ काम करते थे.

जब साथियों को आश्चर्य सा होने लगा तो नरेंद्र आगे बढ़े और सबको बताया कि स्कूल के दौरान मुझे गणित से बहुत डर लगता था. सर के बारे में मुहल्ले में सब बात करते थे कि बहुत अच्छा पढ़ते हैं. कक्षा 8 में मुझे गणित में ग्रेस मार्क्स से पास किया गया था.

तब सर बीएससी में पढ़ते थे. अपनी नौवीं कक्षा के शुरु में, मैं हिम्मत करके सर के पास गया और सीधा पूछ लिया कि मुझे आपसे मेथ्स सीखना है आप सिखाएंगे ?’
सर ने कुछ सोचा भी नहीं और बोले – यदि तुम्हें सीखने का शौक है तो मुझे कोई ऐतराज नहीं है. कब से सीखोगे.’’ 
तो मैंने कहा आज शाम से.

बस शुरु हो गया पढ़ने - पढ़ाने का दौर. सर बड़े स्ट्रिक्ट थे. कहते थे जो सीख कर जाते हो उसकी प्राक्टिस किया करो. नहीं समझ में आए तो फिर पूछो. बिना समझे. आगे मत बढ़ जाया करो. शुरु - शुरु में मैं तीन चार दिन एक ही बात पूछते रहता था. पर सर कभी गुस्सा नहीं करते थे. फिर से शुरु से समझाते थे. परिचय पुराना होने के कारण पूछने में कोई डर भी नहीं लगता था.

मुझे पढ़ाने के बाद सर फिर अपनी पढ़ाई करते थे. पता नहीं कब तक पढ़ते थे. पर हमारे साथ दिन भर खेलते भी थे.

मैंने कक्षा नौंवीं में ही इनसे ही मेथ्स सीखा है. पहले तो पास होने के लाले पड़ते थे और नौंवीं में 100 में से 98 नंबर आये. परीक्षाफल आने पर मैं रिजल्ट लेकर सीधे इनके घर दौड़ता हुआ पहुँचा. साँसे फूल रही थीँ, सर समझ गए कि मैं दौड़ता आया हूँ. उन्होंनें बिठाकर पानी पिलाया. फिर पूछा क्य़ा बात है, क्या हुआ? मैं ने मार्कशीट उनकी तरफ बढ़ा दी और खुशी के मारे पागल होते हुए बताया, सर मुझे मेथ्स में 98 नंबर मिले हैं.

सर के चेहरे पर खुशी तो दिखी,  पर साथ में गुस्सा भी. एक दम विचलित नहीं हुए. बोले .. कहाँ, स्कूल से आ रहे हो? मेरी हाँ सुनकर बोले, घर जाकर आए? माँ - पिताजी को मार्कशीट दिखाया ? नहीं में जवाब सुनकर बहुत गुस्सा हो गए. बोले जाओ पहले घर जाओ. माँ पिताजी सबसे पहले बाद में कोई भी. पहले उनको दिखाओ फिर किसी को भी दिखाना.

तब मैं घर गया. माँ - पिताजी को मार्कशीट दिखाया. वे बड़े खुश हुए और बोले जाओ कादिर को दिखाकर आओ. शाम को उनको अपने घर बुलाना.

मैं लौटकर फिर सर के पास आया. तब सर ने मार्क शीट देखा और बहुत - बहुत बधाईयाँ दी. बोले अब तुम अपने आप भी पढ़ सकते हो, मेरी जरूरत नहीं है रोज पढ़ाने की. हाँ कहीं कोई तकलीफ परेशानी हो तो पूछ लिया करना. इस तरह मुझे नौवीं में ही उम्मीद हो गई थी कि मुझे इंजिनीयरिंग में दाखिला मिल जाएगा.  

इतना कहकर नरेंद्र सबकी तरफ ताकने लगा. तब जाकर सबको समझ आया कि कादिर से नरेंद्र के कितने पुराने व कितने आत्मीय संबंध थे

बीच - बीच में नरेंद्र कभी कादिर की तरफ तो कभी अन्यों की तरफ देखता रहा. कादिर को तो बहुत ही खुशी हो रही थी कि एक जी एम पद का व्यक्ति बिना किसी रोक के सबके सामने किस तरह सच्ची बयान कर रहा है. वह नरेंद्र की सरलता का कायल हो गया था, जो कह रहा था कि यदि यह सर नहीं होते तो मैं इंजिनीयरिंग में होता ही नहीं. मैं तो इनको कभी भी भूल नहीं पाऊंगा.

लोग ताज्जुब कर रहे थे. उनमें किसी को कादिर के इस विधा के बारे पता नहीं था. तब जिंदगी में कादिर को पहली बार लगा कि हाँ किसी के काम आने पर यदि जब वह एक्नोलेज करता है तो कितनी खुशी होती है उसे इसका एहसास हुआ और छाती फूलने लगी. कादिर को अन्यों की सहायता करने का प्रोत्साहन मिला.

बाकी सब से बधाईयों का ताँता लग गया. फिर कुछ देर यहाँ वहां की बातें हुई . खाना खाकर सब अपने अपने घोंसले को रवाना हो गए.
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