मेरा आठवाँ प्रकाशन / MY Seventh PUBLICATIONS

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सोमवार, 31 जुलाई 2023

द्वंद्व का अंत

 

द्वंद्व का अंत

(भाग दो – द्वंद्व जारी है।)

( द्वंद जारी है ) 

जैसे-जैसे समय बदलता गया आदर्श का मन शीतल-भावनाओं से विरक्त होकर पारिवारिक कर्तव्यों की तरफ बढ़ने लगा। उसे अब धीरे-धीरे समझ में आने लगा कि शीतल जैसी लड़की के लिए अपनी जिंदगी और समय बर्बाद करने का कोई औचित्य नहीं है। इसी बीच उसकी नौकरी एक सरकारी कंपनी में लग गई। वह बीती हुई सभी बातों को छोड़कर जीवन के मजे लेने लगा। इसी बीच उसने गाँव में सबसे बड़ा घर बनाकर और एक कीमती कार खरीदकर अपने बचपन के सपने को पूरा किया । इससे गाँव में उसकी और उसके परिवार की साख और भी बढ़ गई।

गृह-प्रवेश होते ही घर वालों ने उसकी शादी की बात शुरु कर दिया। अब आदर्श का मन इन्हीं खयालों में रहने लगा कि जल्दी एक सुशील , शिक्षित, संस्कारी और खानदानी लड़की से, उसकी शादी हो जाए जिससे वह शीतल को हमेशा के लिए मन से निकाल सके।

अभी घरवालों ने लड़की देखना या कहें दुल्हन तलाशना शुरु किया ही था कि आदर्श की कंपनी ने उसका तबादला जामनगर कर दिया। बार-बार लड़की देखने के लिए वहाँ से घर आना आदर्श को भारी पड़ रहा था  जिससे संबंध तय करने में बाधा आने लगी । हर बार के बुलावे पर वह घर आ नहीं पाता था और लड़की वाले आदर्श की सुविधानुसार लड़की दिखाने में असमर्थ हो रहे थे । उधर घरवाले भी परेशान हो रहे कि घर के पास रहते ही शादी कर दिया होता तो सही रहता। नए जगह में उसको खाने पीने की जो दिक्कत आ रही थी, वह तो कम से कम बच जाती।

घर वालों को जैसे ही किसी लड़की वालों का समाचार आता , वे उसे तुरंत आदर्श को भेज देते और आदर्श लड़की के बारे में जानकर निश्चित करता कि आगे बढ़ना है या नहीं । कुछ सही लगे तो फोटो मँगवाने की बात होती । फोटो के आने पर आदर्श तय करता कि लड़की देखनी है या नहीं। देखनी हो तो समय निश्चित कर अपनी छुट्टी का जुगाड़ कर आदर्श घर पर बताता । उसी प्रकार से लड़की वालों को खबर दी जाती । यदि सहमति बनी तो तयशुदा दिन आदर्श घर पहुँचता , लड़की देखता और सोच कर बताने की कहकर वापस आ जाता । जो थोड़ा बहुत समय घर पर मिलता था उसमें वह अपने घर के सदस्यों से इस बारे में चर्चा कर लेता, पर निर्णय जामनगर आकर ही देने की बात करता।

इसी शृंखला में घर वालों ने एक लड़की का बायोडाटा भेजा । संयोगवश उस लड़की का नाम भी शृंखला ही था । बायोडाटा देखकर ही श्रृंखला आदर्श को भा गई। उसने घरवालों से फोटो मंगवाने की फरमाइश कर डाला। कुछ दिनों में फोटो भी आ गई । लड़की फोटो में भी आदर्श को अच्छी लगी किंतु पूर्ण संतुष्टि नहीं हुई। समय पाने के लिए आदर्श ने घर वालों से छुट्टी नहीं मिलने की बहाना बनाया और पंद्रह दिनों का समय माँगा। उसकी सोच थी कि इन पंद्रह दिनों में कोई और बायोडाटा नहीं आया तो वह शृंखला को देख आएगा।

अभी हफ्ता भर ही हुआ था कि सरकार ने करोना के कारण लॉकडाउन की घोषणा कर दी। आदर्श का सारा बना-बनाया प्लान चौपट हो गया । आदर्श फिर उदास होता गया। कई महीनों तक तो वह घर भी नहीं जा पाया । लड़की देखने की बात तो धरी की धरी रह गई। इस बीच उसके मन में तरह -तरह के एहसास होने लगे। अपने सपनों की रानी को लिए वह अब तड़प की स्थिति की ओर बढ़ने लगा था। दिल के किसी कोने में यह डर भी सता रहा था कि इस बीच कहीं शृंखला का रिश्ता कहीं तय हो गया तो वह उससे वंचित रह जाएगा। हालाँकि वह शृंखला से पूरी तरह तसल्ली नहीं कर सका था , पर उसे पता नहीं क्यों कहीं न कहीं दिल के कोने में एक आस थी कि मुलाकात में उसकी रही सही समस्या का भी निदान हो जाएगा। उसका शृंखला की तरफ झुकाव उसे भी महसूस होने लगा था।

समय अपनी रफ्तार पर था । वह दिन  भी आया जब सरकार ने लॉकडाउन पर छूट देना शुरु किया । आदर्श को घर जाने का मौका मिला। आदर्श इस माहौल में लड़की देखने को तैयार नहीं था , पर घर वाले चाहते थे कि मौका न गँवाया जाए और आदर्श कम से कम शृंखला को देख आए । घर वालों के दबाव में और अपने अंदर की आतुरता के कारण अंततः आदर्श एक दिन तय करके शृंखला को देखने उसके घर पहुँचा ।  शृंखला पर नजर पड़ते ही उसकी आधी समस्याएँ दूर हो गई और बात करने पर पूरी तरह से आश्वस्त हो गया।

घर वालों से बात करके आदर्श ने शृंखला से शादी के लिए अपनी सहमति जता दिया। घर वालों से बात शृंखला के घर तक पहुँची । आदर्श को वापस जामनगर भी जाना था । इसलिए कुछ ही दिनों में ही शृंखला के घरवाले भी आदर्श के घर आए। पूरे परिवार से मिले। घर-द्वार देखा और दोनों परिवारों ने आपसी और लड़का- लड़की की पसंद से रिश्तेदारी के बंधन में बँध जाने का निर्णय लिया। सामाजिक व धार्मिक परिपाटियों के तहत देवउठनी एकादशी का इंतजार करना पड़ा।

देवउठनी एकादशी के आते ही दोनों परिवारों ने मिलकर आदर्श के जनम दिन को ही  नारियल फोड़ने के लिए निश्चित किया।

नारियल फोड़ने की इस तिथि को तय करने के पीछे आदर्श का भी बड़ा हाथ था। पिछले कुछ सालों से अपने जनम दिन को भी आदर्श कुछ अनमना सा रहने लगा था । उसकी जनमदिन की खुशी में शीतल से उसी दिन बिछड़ने का भी गम शामिल हो जाता था । इसीलिए वह इस दिन की यादों में अपनी नई खुशी को शामिल करके, पुराने गम को हमेशा के लिए भुला देना चाहता था । 27 तारीख आदर्श का जनमदिन था और शायद इसीलिए 27 को आदर्श शुभ भी मानता था । इसी के साथ उसकी कड़वी यादों के दिन को खुशनुमा बनाना चाहता था। उस समय तक यह राज केवल आदर्श को ही पता था। उसने अपने जनम दिन के एहसासों को खुशी में तब्दील करने का ठोस तरीका ढूंढ लिया था।

तयशुदा दिन शृंखला के घर पर नारियल फूटा और दोनों परिवार  एक होने का निश्चय कर गए। दोनों परिवारों में खुशी की लहर चल पड़ी । उनकी खुशी का ठिकाना ही न था। शृंखला ने जनम दिन के अवसर पर आदर्श को बहुत सारे तोहफे भेजे जिसमें एक घड़ी प्रमुख थी।

दोनों परिवारों ने मिलकर प्रमुखों के सान्निध्य में मई में शादी की तारीख तय कर दिया । शुभ मुहूर्त देखकर बड़ों ने जनवरी में उनकी सगाई भी कर दिया। अब क्या था, वे एक दूजे के होने ही वाले थे। अब देर रात तक और समय – बेसमय उनकी बातचीत होती रहती थी। आश्चर्य की बात यह हुई कि एरेंज्ड मेरेज उनके दैनंदिन वार्तालाप से लव मेरेज में बदलती जा रही थी। अक्सर प्यार के बाद जोड़े प्रणय बंधन में बँधने की सोचते हैं किंतु यहां शादी तय होकर सगाई के बाद उनका प्यार पनपने लगा था । इससे दोनों में आपसी लगाव दिन दूना - रात चौगुना बढ़ने लगा और दोनों में शादी की आतुरता होने लगी। एक-एक दिन दोनों पर भारी पड़ रहा था। वे अलगाव के दिनों को कम करना चाह रहे थे जबकि मिलन तो होना अभी बाकी था।

अब जाकर आदर्श को पूरी तरह विश्वास हो गया कि जो भी होता है अच्छे के लिए होता है। अब तक जिस शीतल के छोड़ने पर वह भगवान को कोसता था , अब उसी घटना के लिए वह भगवान को धन्यवाद देने लगा। शीतल के छोड़ने पर ही उसे शृंखला मिली थी वरना वह तो इससे वंचित ही रह जाता।

अब दोनों परिवारों में शादी की तैयारियाँ जोरों पर थी। आदर्श घर का बड़ा बच्चा था इसलिए भी परिवार के लिए यह एक खास आयोजन था। उधर शृंखला के घरवाले भी धूमधाम से शादी करने की तैयारी में थे । किंतु किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।  करोना ने फिर अपना सर उठाया। लॉकडाउन वापस आ धमका। करोना के डर से लॉकडाउन के दौरान किसी भी आयोजन में 15-20 से ज्यादा लोगों के शामिल रहने की अनुमति नहीं थी। आयोजन को सादा ही रखना था किसी तरह की पार्टी या नाच गाना (डिस्को जॉकी) किसी की भी अनुमति नहीं थी। दोनों परिवारों में मायूसी छा गई कि अब आयोजन कैसे करें ?  खासकर आदर्श के घरवाले ज्यादा दुखी थे क्योंकि यह उनके घर की पहली शादी थी।

शादी धूमधाम से करने की तमन्ना धूमिल हो रही थी । करोना था कि घटने का नाम ही नहीं ले रहा था जिससे कि सरकारी बंदिशें हटें। हालातों से सामंजस्य बनाते हुए आदर्श ने लग्न की तिथि को आगे बढ़ाने- बदलने का प्रस्ताव रखा लेकिन बुजुर्गों ने यह कहकर मना कर दिया कि लग्न को बदलना अशुभ होता है।

उधर हर दिन आदर्श और शृंखला इसी बात की चर्चा करते कि किस परिवार में क्या सोचा जा रहा है ? तैयारियाँ किस तरह चल रही हैं । किन-किन रिश्तेदारों को सीमित अतिथियों में शामिल किया जा रहा है.. वगैरह-वगैरह। दोनों का दिल दुखित होता पर मन मारकर एक दूसरे को अपना दुखड़ा सुनाते हुए, आँसू बहाते । उनको लगता था कि यह सब उनके साथ ही क्यों हो रहा है ? उसके इस दुखी मन में फिर से भगवान के होने न होने का विचार आने लगा।  

होनी ने उन्हें इतने पर भी नहीं बख्शा। दोनों परिवारों का एक-एक सदस्य करोना की चपेट में आ गया। अब हालातों से मजबूर दोनों परिवारों ने सम्मिलित निर्णय लिया कि अब तो लग्न को आगे बढ़ाना ही होगा। अभी के लिए मुहूर्त टल गया। इसी के साथ आदर्श और शृंखला का इंतजार और बढ़ गया। उनमें नई तारीख की जिज्ञासा होने लगी और शादी की आतुरता चरम पर पहुँचने लगी।

आदर्श अपने विवाह में बार-बार हो रहे रुकावटों से खिन्न था । उधर शृंखला का भी करीब वही हाल था किंतु वह आदर्श को समझाती कि नियति उनकी परीक्षा ले रही है। उन्हें हिम्मत से काम लेना है। दाम्पत्य जीवन के सही शुरुआत से पहले ही वे परस्पर दुख-सुख के भागी होने लगे थे।

जब समय अनुकूल हुआ तो बुजुर्गों ने दूसरा लग्न देखा तय किया , अब 27 जून। आदर्श और शृंखला  दोनों के मन में खुशी की लहर उठी , लड्डू फूटे । एक संशय भी घर कर गया था कि न जाने सरकार कितने अतिथियों की अनुमति देगी। अब हर कोई चाह रहा था कि जो भी हों, जितने भी बंधन हों, इस लग्न पर शादी हो ही जानी चाहिए। इसी निर्णय के साथ पुनः तैयारियाँ की गई। सरकारी आदेशानुसार सीमित अतिथियों की उपस्थिति में धूम-धाम से आदर्श और शृंखला की शादी संपन्न हुई।

अब आदर्श की दुविधा का भी पूर्ण समाधान हो चुका था । जनमदिन के बीच कड़वाहट का वह बीज भी निकल चुका था और उसकी जगह खुशी ने ले ली थी। अब आदर्श के मन में द्वंद्व जैसी कोई स्थिति नहीं थी। वर्षों से चली आ रही आदर्श के द्वंद्व का अंत हो गया।

आदर्श और शृंखला दोनों एक दूसरे के साथ दाम्पत्य जीवन में खुशी-खुशी सुख से रहने लगे। द्वंद्व का समापन हो गया था।

हिंदी कुंज में - ( कहानी - द्वंद्व का अंत)

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शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

राघव का हश्र


राघव का हश्र

जूही को बचपन से ही बहुत लगाव है अपने पड़ोसी अंकल राघव से. उन्होंने जूही  के मम्मी-पापा की शादी भी एटेंड की थी. बचपन में जूही के अभिभावक बच्चों को राघव के पास छोड़ कर रात में कोई 9 बजे सारेगामा की शूटिंग देखने जाते थे. आते - आते देर रात 12 से 1230 तक हो जाते।

बच्चे देखते कि  हॉल में राघव अंकल बैठे हैं, तो सो जाते. उठते थे पानी, बाथरूम के लिए तो हॉल में नजर डालकर तसल्ली कर लेते और हेल्प से फारिग होकर फिर सो जाते.  राघव के आसपास होने पर बच्चे सुरक्षित व सुकून अनुभव करते थे. 

एक बार जब जूही अस्पताल में भर्ती थी। तब पापा और राघव दोनों रात में अस्पताल में ही थे. पापा जूही के पास बैठे थे और राघव कमरे में ही बेंच पर बैठे थे। राघव और पापा दोनों सहमत थे कि पापा के पास जूही को आराम से नींद आ जाएगी.

जूही की आँख खुली तो उसने पापा से कहा... आप जाकर बेंच पर सो जाएँ. राघव अंकल मेरे पास बैठेंगे.

पापा को अच्छा तो नहीं लगा. एक बार जूही को समझाने की कोशिश किए किंतु जब बच्ची नहीं मानी तो बच्ची के लिए मान गए.  अब राघव जूही के सरहाने बैठा हुआ था और पापा बेंच पर लेटे थे.

रात जूही अंकल का हाथ पकड़कर सोई क्योंकि उसे डर था  कि कहीं अंकल चले न जाएँ. जब भी राघव का हाथ जूही के हाथ से अलग होता, वह जाग जाती. देखती राघव पास ही बैठा  है तो फिर सो जाती. 

सुबह पापा ने यह खबर मम्मी जी  तक पहुँचाई.

शायद यह पहला झटका था.

जूही और राघव का रिश्ता गाढा होता गया. राघव ने जूही के अभिभावकों से उसे गोद लेने की भी बात की. सब तैयार, पर मम्मी नहीं मानी.  जूही को भी इसकी खबर हुई. उसे किसी में कोई ऐतराज नहीं था.

राघव की माँ को जुही दादी कहती थी. उनके हाथ के पराठे और आलू भुजिया  की जूही खास फरमाईश करती और खाती थी.

फलतः जूही घर पर ढंग से नहीं खाती थी और यह मम्मी की परेशानी की वजह बन रहा था. उन्हें पता नहीं था कि जूही राघव के घर खाकर आ रही है.

 एक दिन मम्मी जूही को खोजते - खोजते हुए राघव के घर आई और देखी कि जूही आराम से और   पराठे व आलू की भुजिया खा रही है. एक तरफ उन्हें खुशी हुई कि जूही चुपचाप कुछ खा तो रही है और दूसरी तरफ नाराजगी भी कि घर में खाती नहीं है, नखरे करती है. उन्हें लगा कि दादी उसे बिगाड़ रही है.  मम्मी ने दादी को रोकने की कोशिश की कि जूही को न खिलाएँ जिससे कि वह घर पर खाने लगे।

दादी तो मम्मी की माँ से भी बड़ी. ही थी. समझाने लगी कि बच्ची है खाने दो, कैसे मना कर.दूँ. मम्मी चुप तो हुई पर मन नहीं माना उनका. खाने के बाद उसे ले गई. 

यह दूसरा झटका था.

अब जूही बड़ी हो रही थी. जो देखती कह जाती थी. उसके मासूम मन को अच्छा बुरा समझता नहीं था.

एक दोपहर जूही अकेली पहली मंजिल से चलकर तीसरी मंजिल तक आकर राघव के घर पर बेल बजाई. अकेली,  भरी दोपहरी में, गर्मी के दिन, बात समझ नहीं आई.  राघव के घर भी सब सो रहे थे. उसने जूही से पूछ लिया...अकेले कैसे आ गई? दरवाजा खुला था क्या? मम्मी घर पर नहीं है क्या?

जूही आराम से बोली  - हैं न, सो रही है. 
दरवाजा किसने खोला -- कुंडी लगी थी, मैंने खोल लिया
दूसरा सवाल... पापा कहाँ गए? जूही बोली : मम्मी के साथ सो रहे हैं.

लगा कि समय आ गया कि अब जूही के अभिभावकों को सँभलना चाहिए. दोस्त की हैसियत से, करीबी होने के कारण उन्हे चेता देना चाहिए ऐसा राघव ने महसूस किया. पता नहीं जूही कब, कहाँ,  किसे क्या बता दे.

राघव ने  जूही के पिताजी को बताया कि अब सँभलने के दिन आ गए हैं. बिटिया जो देख रही है वह कहने की उम्र में आ गई है, कह रही है. उसने उसने मुझे ऐसा बताया. अब सँभलने का काम बड़ों का ही होगा। 

जूही के पापा को बात समझ आई और उन्होंने चाहा कि राघव घर चलकर वहाँ  अपनी जबानी भाभीजी को बताए. उस समय जूही भी वहीं थी. राघव ने भाभीजी को भी सारी बात  बताया.

इसपर तुरंत भाभीजी के तेवर दिख गए. राघव डर गया. बस रोया नहीं, पर उनसे निवेदन जरूर कर आया कि जूही को कुछ न कहें, वह अभी ना समझ नादान है.है. आप ख्याल किया करें. इस उम्र में बच्चे सच बोल जाते हैं, पर मतलब नहीं समझते. कहकर उदास राघव अपने घर लौट आया.

यह तीसरा झटका था.

बच्ची को पता नहीं डांटा गया या मारा गया, पर वह दहशत में आ गई. बस. 

जूही राघव दूर दूर रहने लग गई. राघव का मन बहुत रोया. उसका मन दिन ब दिन परेशान होने लगा. काम में, जिंदगी में किसी में मन नहीं लगता था. रातें रोते - रोते बीत रही थी. जब रहा नहीं गया तो भड़ास निकालने के लिए - मन हल्का करने के लिए  राघव ने अपनी पीर को एक कविता के रूप में लिखा... "हश्र"



राघव जूही से दूर रह नहीं पा रहा था, पर कविता में अपना दुख उतारने के बाद वह कुछ हल्का महसूस करने लगा. इसके बाद समय के सहारे उसका दर्द घटता गया. वह जूही के बिना जीना सीख रहा था. इस घटनाक्रम ने राघव का जूही के घर उठना बैठना भी करीब बंद ही हो गया था।

अगले जनमदिन पर जूही राघव को न्यौता देने आई. जिससे राघव का मन भर आया. वह जनमदिन मनाने जूही के घर गया. तबतक जूही के अभिभावकों को राघव का दुख समझ ममें आ गया था. सभी खुश थे. उसके बाद रिश्ते सुधरते गए. साल भर बाद सब कुछ यथावत हो गया. सारे आपसी रिश्ते खुशी खुशी निभने लगे.
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बुधवार, 4 मार्च 2015

द्वंद ... जारी है.

द्वंद ... जारी है.
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राजस्थान के चाँदा गाँव में स्नेहल एक घरेलू जाना पहचाना नाम था. गाँव के कान्वेंट स्कूल में पढ़ने वाली स्नेहल पढ़ाई में अव्वल थी. मजाल कि उसके रहते कोई कक्षा में प्रथम आने की सोच भी लेता. इसके साथ वह थी भी बला की खूबसूरत. घर- बाहर सब उसे प्यार करते थे, पर अपनी - अपनी तरह से. लेकिन एक बात थी जो स्नेहल को सब से दूर रखती थी – उसका घमंड. उसकी खूबसूरती व अक्ल के चर्चे के कारण उसमें ऐसा स्वभाव उत्पन्न हो गया था.

जब कक्षाएं बढती गईं तो वहाँ नए - नए चेहरे आते जाते रहे. कुछेक बरस बाद, ऐसा ही एक चेहरा था - आदर्श. जो पास के गाँव के किसी स्कूल में पढ़ा करता था. पढ़ाई में वह भी बहुत अच्छा था. अब वह और स्नेहल एक ही स्कूल के छात्र हो गए थे. दोनों में अव्वल आने की होड़ लग गई. परीक्षा तक तो दोनों को इंतजार करना पड़ा. परीक्षाएं समाप्त क्या हुईं कि कक्षा में चर्चाएं होने लगीं कि इस बार प्रथम कौन आएगा.  आदर्श बोलता कम था इसलिए उसके दोस्त भी इस स्कूल में कम ही थे. इसलिए शोर तो स्नेहल का ही था.

इंतजार पूरा हुआ और परिणाम आए - आदर्श प्रथम. अब क्या था, घमंड ने सर उठा लिया. उधर आदर्श को यह अच्छा नहीं लगा. पढ़ाई में आगे – पाछे का नतीजा, अच्छा पढ़ने की होड़ से होना चाहिए, न कि घमंड या गुरूर से. वह मन-ही-मन स्नेहल से दूर होता गया. किंतु स्नेहल का घमंड था कि कमता ही नजर नहीं आता था. कक्षा की हर परीक्षा में स्नेहल को आदर्श से कम अंक मिलते और हर बार फिर उसका सोया घमंड जाग जाता.

एक अच्छी पढ़ने वाली खूबसूरत लड़की को घमंड में जलते देख आदर्श को दुख भी होता था. वह चाहता था कि स्नेहल किसी तरह अपना घमंड छोड़े, जिससे उसे भी कोई पसंद करने वाला मिल जाता. बाकी विधाओं में तो वह, अच्छी तो थी ही. लेकिन ऐसा हो नहीं रहा था.

हाईस्कूल से इंटरमीडिएट के दौरान शीतल ने स्कूल में प्रवेश किया. पढ़ाई में वह भी अच्छी थी. खूबसूरती तो बला की नहीं, ठीक-ठीक ही थी. स्वभाव से शीतल बहुत ही मधुर थी. पढ़ाई के चलते अब स्नेहल, आदर्श और शीतल तीनों में होड़ थी. नतीजतन शीतल, स्नेहल से आगे तो आ गई, पर आदर्श को पार न पा सकी. दोनों में आए दिन होड़ रहती कि कौन बाजी मार लोगा. यही चलता रहा दोनों में होड़ होती गई और स्नेहल की ओर से लोगों  का ध्यान हटने लगा. बहुतों ने सोचा अच्छा हुआ कि स्नेहल का घमंड तोड़ने कोई तो आया, उधर हालातों ने स्नेहल के घमंड को भी चकनाचूर कर दिया.

एक दूसरे की बराबरी करने या यों कहें कि सार्थक प्रतिस्पर्धा के कारण दिनों-दिन शीतल और आदर्श में करीबी आती गई. दोनों की मंजिल पढ़ाई में अव्वल करने की ही थी. एक लक्ष्य की ओर बढते - बढ़ते न जाने कब वे आपसी मानसिकता को पसंद करने लगे. उनमें एक अपनापन पनपता गया, जिसकी दोनों में से किसी को खबर भी नही थी.

इसका पहला एहसास आदर्श को हुआ, लेकिन उसने इस बात को उजागर करना उचित नहीं समझा. हो सकता है कि पौरुष ही इसका मुख्य कारण था. वह बात को अपने तक ही रखा रहा. हाँ इसके विपरीत कोई हरकत करने की कोशिश नहीं करता था, क्योंकि यह अपनापन उसे मंजूर था. क्या पता शीतल भी मन ही मन उसकी ओर आकर्षित हो रही हो ? भले ही वह शीतल की सहेलियों से बहनों सा बर्ताव करता लेकिन वह गलती से भी शीतल के साथ ऐसा व्यवहार करने से बचता, जिससे उसे कोई गलतफहमी न हो जाए. पता नहीं यह उसकी बचकाना हरकत थी या फिर उसे आभास हो रहा था कि इनसे मुखातिब शीतल उसकी मानसिकता को ताड़ लेगी.

इंटर पूरा कर स्कूल से जाते - जाते आदर्श ने शीतल को इतना तो जता दिया कि मैं तुमसे, तुम्हारी सहेलियों के साथ सा बर्ताव नहीं कर सकता. उसकी सोच में इतना काफी था यह जताने कि लिए कि – “मैं तुमसे प्यार करता हूँ” वह इससे ज्यादा खुलकर बात कहना नहीं चाह रहा था. एक मोड़ पर शीतल ने संदेश जरूर भेजा था कि तुम्हारे कारण का तो पता नहीं पर मैं तुम्हें पसंद करती हूँ. इससे आदर्श समझने लगा कि शीतल को उसकी अनुभूति का पता चल गया है.

इंटर के बाद आदर्श ने कोटा मे किसी कोचिंग संस्था मे प्रवेश लिया ताकि वह अपनी आगे की पढाई जारी रख सके. भर्ती के दिन ही उसे दूसरी कतार में शीतल नजर आई. वह उससे छिपता - छिपाता रहा. किंतु ऐसा कभी संभव हुआ है कि दोनों एक ही संस्था में एक ही जगह पढ़ रहे हों और आपसी मुलाकात न हो. एक दिन ऐसा हो ही गया कि दोनों आमने सामने हो लिए. दोनों में कोई भी पहल करना नहीं चाहता था.

प्यार कितना भी पुराना हो जाए सावन में फिर फलने – फूलने लगता है. ऐसा ही हुआ. फिर शीतल - आदर्श की नजदीकियाँ बढ़ने लगी. जाहिर था कि प्यार की आग दोनों की तरफ लगी थी. पर बात केवल पहल की थी. अब जब पहल हो ही गई तो दिन दूनी रात चौगुनी फलने लगी. ना जानें इस जुगलबंदी में उनने कब जीने – मरने की कसमें भी खा लीं. प्यार अब परवान चढ रहा था. 

पूरी कोचिंग व बाद के दौरान अलग अलग कालेजों में होने के बाद भी वे एक दूसरे के शहर जाकर मिलते रहे. जिंदगी को बहुत करीब से एहसास किया एक दूसरे के मन को पूरी तरह भाँप लिया. एक बार शीतल ने ऐसा कुछ भी बताया था कि – उनके परिवार का एक नजदीकी लड़का, उससे नजदीकियाँ बढाने की कोशिशें कर रहा था लेकिन शीतल ने उसे घास नहीं डाला क्योंकि वह अपने जीवन में आदर्श के अलावा किसी को नहीं चाहती थी. और तो और उसने यह भी कहा था कि वह एक लड़का बिगड़ैल था. दोनों में आत्मीयता इस हद तक बढ गई कि उनके बीच कोई गोपनीयता बाकी नहीं रह गई थी.  हाँ नजदीकियाँ मन तक ही रही, तन पर काबू न कर सकीं. दोनों के अपने - अपने तर्क थे किंतु उनका एक ही मानना था कि मन के मिलन के बाद शादी और बाद में तन का मिलन. 

दोनों की अलग - अलग जगहों से पढ़ाई चल रही थी. अंतिम सेमेस्टर के दौरान - अब दौर आया - नौकरी या पोस्ट - ग्रेजुएशन की तैयारी का. आदर्श गेट की तैयारी करने लगा, जिससे दोनों की संभावनाएं साथ चलती रही. शीतल किसी भी तरह की आगे की तैयारियाँ नहीं कर रही थी.

इसी समय न जाने क्यों आदर्श को लगा कि और शायद शीतल का मन धीरे धीरे आदर्श से हट सा रहा है.. कारण का कुछ पता न चल सका. परीक्षाओं के बाद  और दीवाली की छुट्टियों में घर पर होने की वजह से आपसी संवाद में रुक सा गया था. शीतल की तरफ से फोन उठना बंद ही हो चुका था. और जो कारण सामने आ रहे थे वे विश्वसनीय भी नहीं लग रहे थे. आपस में कोई गंभीर संवाद नहीं हुआ.

ऐसा लगने लगा कि वह अपनी राह चल पड़ी है, लेकिन कारण विशेष को कहने से बचती रही. पता नही उस पर क्या गुजरी थी कि ऐसा हो गया. दिन- रात संग जीने मरने की कसमें खाने वाली अचानक बिना किसी आपसी वजह के या कोई अन्य वजह बताए इस तरह रूठ जाए समझ में नहीं आया. पर किसी ने कुछ खास नहीं कहा. हाँ, लेकिन तब तक फासले बढ़ रहे थे.
इस तरह के स्वभाव ने दोनों के बीच की खाईयों को गहरा कर दिया. अंततः एक दिन आदर्श के मन आया, कि मुझे भी कुछ और कोशिश कर आगे बढ़ना चाहिए. इसी इरादे से उसने शीतल को फिर फोन लगाया. फोन नहीं उठा. आदर्श ने फिर बार - बार कोशिश की किंतु कोई जवाब नहीं आया. अब शायद उसे लगा कि उसने अंततः शीतल को खो दिया है.

वह उधर से जवाब न आता देख वह निराश हो गया. उसकी जानकारी लेने के लिए अब वह हर संभव कोशिश करने लगा . इसी दौरान शीतल के दूर के रिश्तेदार से भी बात हुई और उससे कहलवाया कि शीतल से कहे कि कम से कम एक बार बात तो कर ले. इरादे जो भी हों सही.

एक दिन शीतल के फोन उठाते ही आदर्श बहुत ही खुश हुआ. लेकिन उसकी यह खुशी क्षणिक ही रह गई – जब शीतल ने उसे बताया कि अब वह उसे न फोन करे और न ही उससे संपर्क साधने की कोशिश करे. उसने यह भी कहा कि अब मैं तुमसे न मिल सकती हूँ न बात कर सकती हूँ, अब तुम मुझे फोन मत किया करो. क्योंकि अब हमारा कोई रिश्ता नहीं रहा – “मैं तुमसे और बात तक करना नहीं चाहती” और फोन रखा गया.. यह तो बम का धमाका था, आदर्श के लिए. जो उसकी जिंदगी और जिंदगी में सब कुछ था, वही तो लुट गया था. और आश्चर्य यह कि वही तो लूट गया था. उसके तो होश फाख्ता हो गए. समझ में नहीं आया कि आखिर यह क्या हो रहा है और क्या हो गया है.

यहाँ वहाँ से पता चला कि उसके साथ अब कोई और है. जो सुना उससे ऐसा लगा कि शायद कभी शीतल ने कहीं जिक्र भी किया था कि वह आदर्श से दूर होने वाली है लेकिन आदर्श से यह बात छुपाए रखी. कुछ आपसी मित्रों ने भी बात को सँभालने की कोशिश की लेकिन हाथ कुछ न आया .

बहुतेरी कोशिशों के बाद जब अगली बार फोन उठा तो उसने बताया कि उसकी जिंदगी में अब कोई और है इसलिए सारे पुराने किस्से दफन कर दिए जाएं. आदर्श ने जानना चाहा कि वह खुशकिस्मत शख्स है कौन- सुनने पर कि वह वही पुराना विगडैल लड़का है जो कभी नजदीकियाँ बढ़ाने की कोशिश करता था – आदर्श बिफर गया. उसने चीख कर कहा – “उस के लिए – जिसे तुम दिन में पचास गालियाँ देती थी कि किसी काम का नहीं है...नालायक है – अब उसके लिए तुम मुझे नकार रही हो”. उधर से आवाज आई देखो वह जैसा भी है – अब मेरी जिंदगी में है. मैं उसके बारे में तुमसे कुछ सुनना नहीं चाहती. बातों का लहजा कुछ ऐसा था कि जब मैं तुम्हारे पीछे भाग रही थी तो तुम थे कि मुझसे दूर भागते जा रहे थे. इतनी दूर कि मेरे पाँव व मन थक गए थे. जब मैं और भाग न सकी तो तुम्हें छोड़ दिया. एकाकी हो गई .. उस वक्त, इसने मेरा साथ दिया – हाथ थामा .. अब वह मेरा है और मैं उसकी. तुमने तो मुझे नकार ही दि.या था. अच्छा है हम- तुम अब अलग हो जाएं और अलग ही रहें. आदर्श को समझ ही नहीं आया कि शीतल किस समय की बात कर रही है लेकिन उसे यह अच्छी तकह समझ में आ गया कि उसने रास्ते और हमसफर बदल लिए हैं.

शीतल ने जाहिर कर ही दिया कि अब वह किसी और के साथ है और आदर्श उससे संपर्क करने की कोशिश न करे. ऐसा कहा जा सकता है कि शीतल ने अब आदर्श को दूध की मक्खी की तरह से निकाल फेंका.

इससे आदर्श की जिंदगी नरक हो गई. उसका जीना हराम हो गया. हालात बिगड़ने लगे ... डर था कहीं कोई गलत कदम न उठा ले. लेकिन समय, हर मर्ज की दवा, ने आदर्श को सँभाला. फिर भी वह शीतल को भुला तो नहीं पाया. अपने प्रति किए बर्ताव के लिए वह शीतल को सजा देने पर उतारू हो गया.

वह दिन आदर्श की जिंदगी का एक ऐसा दिन था जो हर दिन याद आता है. आज इतने बरसों बाद जब घर से शादी की बात चलती है, तो हर खाली वक्त शीतल की याद सताती है. एक तरफ पौरुष और एक तरफ चाह द्वंद चलता रहता है. शीतल ने तो अलग रास्ता अपना ही लिया था. कभी कभार तो दिल करता है कि शीतल को सबक सिखाया जाए ताकि वह भी उसकी तरह तड़पे – यह तो बदले की भावना थी. पर भूलना तो संभव हो ही नहीं रहा था.

समाज में आदर्श के चाहने वाले जितने भी लोग थे, सबने उसे समझाने की कोशिश की. किंतु उस पर सदमा इतना भारी था कि उससे शीतल भूली ही नहीं जाती थी. हमेशा उससे बदला लेने की भावना से वह पीड़ित होता रहा. सबने समझाया कि सच्चा प्यार पाने में नहीं, देने में है, यदि तुम शीतल से सच्चा प्यार करते हो, तो उसे खुश रहने की दुआएँ दो. लेकिन उस तड़पते दिल को यह रास नहीं आता था. कहते हैं कि प्यार अंधा होता है... अब लगता है कि आदर्श अब भी प्यार के उसी दायरे में समाया हुआ है.

कई बार वह औरों के कहने पर अपने आप को समझाने की कोशिश भी करता है फिर ऐसी हालातों में किकर्तव्य विमूढ़ आदर्श यही सोचता फिरता है कि इसका हल कहां से लाया जाए...

द्वंद जारी है.. देखें कब थमेंगा.

एम आर अयंगर.
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