मेरा आठवाँ प्रकाशन / MY Seventh PUBLICATIONS

मेरा आठवाँ प्रकाशन  / MY Seventh PUBLICATIONS
मेरे प्रकाशन / MY PUBLICATIONS. दाईं तरफ के चित्रों पर क्लिक करके पुस्तक ऑर्डर कर सकते हैंं।
राजभाषा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राजभाषा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 14 सितंबर 2022

राजभाषा के लिए कुछ करें

 

राजभाषा के लिए कुछ करें


अब हम आजादी के 75 वर्ष और अमृत महोत्सव / वज्रोत्सव मना रहे हैं । 14 सितंबर 1949 को हमने हिंदी को राजभाषा के रूप में अपनाया। संविधान के साथ ही राजभाषा भी पदासीन हुई। आजादी के अमृत महोत्सव या वज्रोत्सव में हिंदी के लिए कोई विशेष कार्यक्रम होता नहीं दिख रहा है। कहने को फेसबुक और वाट्सएप पर हिंदी में पोस्ट तो आते हैं किंतु हिंदी की बेहतरी के लिए पोस्ट नहीं आते।

भाषा संबंधी पोस्ट में भी ज्यादातर ऐसे होते हैं जिसमें हिंदी  की अंग्रेजी से तुलना होती है। कहा जाता है  हिंदी में चरण शब्द के पर्यायवाची आठ नौ हैं पर अंग्रेजी में मात्र लेग या फुट (Leg or Foot) हैं। हिंदी में चाचा, काका, ताऊ, मौसा, मामा, छोटे पापा, बड़े पापा के लिए अंग्रेजी में ही शब्द अंकल है और वैसे ही चाची, ताई, मौसी, मामी के  लिए आँटी। इसलिए अंग्रेजी से हिंदी सशक्त है। बेहतर भाषा है। इनको यह समझ नहीं आता कि अनेक पर्यायवाची होने की वजह से हिंदी के विद्यार्थी को अधिक शब्दों की जानकारी और उनके लिंग, वचन व प्रयोग की जानकारी रखनी पड़ती है। इस कारण यही विशेषता उनके लिए भाषा को जटिल बनाती है। अंग्रेजी में इतने पर्यायवाची न होने के कारण वे एक ही शब्द की जानकारी से काम चला लेते हैं। यह भाषा को सरल बनाती है। मैं यह नहीं कहना चाह रहा कि अंग्रेजी हिंदी से बेहतर है पर इसे भी मानने को तैयार नहीं हूँ कि हिंदी अंग्रेजी से बेहतर है।

मेरी सोच में भाषाओँ की तुलना गलत है। मैं इसे बेईमानी ही नहीं बेवकूफी भी कहना पसंद करूँगा। जरा सोचिए की यदि आपसे कहे – मेरी  माँ तुम्हारी माँ से अच्छी हैतो आपको कैसा लगेगा ? आप इसे मान लेंगे ? नहीं ना!  मेरी माँ आपकी माँ से सुंदर हो सकती है, ज्यादा पढ़ी लिखी हो सकती है ज्यादा हृष्ट-पुष्ट हो सकती है, पर अच्छी नहीं कही जा सकती, क्यों कि अच्छी में इनके अलावा भी अन्य कई बातें सम्मिलित हो जाती  हैं। उनका रिश्तेदारों , परिजनों , अड़ोसी-पड़ोसियों से व्यवहार और भी बहुत सी बातें समा जाती हैं। वैसे ही किसी भी भाषा के व्यक्ति को उसकी भाषा से दूसरे की भाषा को मानना स्वीकार्य नहीं होगा। इसीलिए तो मैं कहता हूँ कि भाषा की तुलना बेईमानी ही नहीं बेवकूफी भी है।

अब देखिए हिंदी निदेशालय जो राजभाषा का स्वरूप निर्धारित करती है उसने मानकीकरण व सरलीकरण के तहत निर्णय लिया कि अनुस्वार की जगह वर्ग के पंचम अक्षर का प्रयोग हो सकता है। यह हो सकता है - वाक्याँश साफ कहता है कि जरूरी नहीं हैं। लेकिन हिंदी के चहेते तो क्वोरा  (quora) पर भी लिख रहे हैं कि हिंदी वर्तनी सही है और हिन्दी गलत। ऐसे ही, और भी मानकीकरण के प्रयास हैं जो हिंदी के साहित्यिक स्वरूप को बिगाड़ती हैं, पर भाषा को सरल बनाती हैं । लेकिन वह हिंदी साहित्य को नहीं बदलतीं । जो हिन्दी वर्तनी को गलत ठहरा रहे हैं, उन्हें यह समझने की जरूरत है कि हिंदी निदेशालय राजभाषा का स्वरूप निर्धारित करती है, साहित्य का नहीं। कुछ तो सरलता के लिए और कुछ तो टाईपराइटरों में सुविधा के लिए बदलाव मान लिए गए हैं। साहित्य में आज भी हिन्दी ही सही वर्तनी है। इस पर गौर कीजिए, निदेशालय भी तो हिंदी को सरलीकृत करने की ओर बढ़ रही है। अब यह तो कहा ही जा सकता है कि अंग्रेजी तो कुछ हद तक सरलीकृत है ही। इस लिए अंग्रेजी को हिंदी से कमतर कहना असहनीय व अशोभनीय है।

हमारे हिंदी के चहेते जो हिंदी को देश के माथे की बिंदी कहते फिरते हैं , जो हिंदी को विश्व भाषा के रूप में देखना चाहते हैं – वे इन दिनों अंग्रेजी को हिंदी से नीचा दिखाने में लगे हैं। उन्हें चाहिए कि वे हिंदी के उत्थान के लिए कुछ करें। हिंदी में कंप्यूटर के प्रोग्राम लिखें गूगल जैसा की पोर्टल बनाएँ, ताकि कंप्यूटर अंग्रेजी के बिना केवल हिंदी के बल-बूते पर चल सके।

बुरा तो लगता है पर हमारी एक जुटता और क्षमता इतनी ही है कि हम इन 70 - 72 वर्षों में हिंदी को सही ढंग से राजभाषा भी नहीं बना सके। राष्ट्रभाषा की क्या कहें। आज हिंदी भाषाई राज्यों में भी सरकारी  कामकाज पूरी तरह से हिंदी में नहीं होता है, फिर दक्षिणी राज्यों की क्या कहें। ऐसी तुलना से भाषाओं में आपसी वैमनस्य ही होगा । किसी की भलाई नहीं होने वाली। हर माँ की तरह हमें हर भाषा का सम्मान करना होगा।

यह एक जटिल मुद्दा है। इस पर गंभीर चिंतन मनन की जरूरत है। किसी को नीचा दिखा कर उसका अपमान कर सकते हैं, पर हम ऊँचे नहीं उठ सकते।


सोमवार, 13 अक्टूबर 2014

देश की भाषा.

देश की भाषा.
(11.10.14 को हिंदी कुंज में प्रकाशित)
http://www.hindikunj.com/2014/10/indian-official-language.html#.VDjYY7CUdA0

हमारे देश में जाने-अन्जाने हिंदी-भाषी भी हिंदी को राष्ट्रभाषा कहने से नहीं थकते. शायद कईयों को तो पता ही नहीं है कि हिंदी आज तो क्या, कभी भी राष्ट्रभाषा थी ही नहीं. तथ्य तो यह है कि काँग्रेस से जुड़े कई राजनीतिज्ञों ने... यहाँ तक कि महात्मा गाँधी ने भी हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाना चाहा. काफी कोशिशें कीं, तैयारियाँ भी कीं. किंतु वे सफल नहीं हो सके. हालांकि इस प्रयास को बहुत ही गणमान्य व्यक्तियों और अ-हिंदीभाषी हस्तियों का  भी समर्थन था, पर (शायद) यह राजनीतिक कारणों से सफल होने से वंचित रह गई. ऐसा लगता है कि हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देना एक काँग्रेसी मुद्दा बनकर रह गया. जबकि हिंदी भाषियों की अधिक प्रतिशत तो अन्य राजनीतिक पार्टियों में ही थी. ऐसा भी लगता है कि लोगों की हिंदी के प्रति नहीं बल्कि काँग्रेस के प्रति असहमति से हिंदी को असफल होना पड़ा. अब यह एक राजनीतिक विषय बन चुका है. गाँधी जी ने बीसवीं शताब्दि के दूसरे दशक में, कांग्रेस के एक अधिवेशन में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने पर जोर दिया व अन्य सम्मेलनों में उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की रूपरेखा भी बना ली थी. पर हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं बन सकी. गाँधी जी के बाद किसी ने उस तरह का न ही कदम उठाया न हीं किसी ने इस तरफ हिम्मत दिखाई.

संसद की राजभाषा समिति ने भी देश की भाषा को राष्ट्रभाषा न कहकर, राजभाषा शब्द से संबोधित किया ताकि राष्ट्रभाषा का विवाद फिर से खड़ा न हो जाए. उस पर कानून तो बन गया पर पूर्णसहमति अब तक तो बन नहीं पाई है. राजभाषा हिंदी के साथ अंग्रेजी भी खड़ी है. संविधान की धारा 351 में हिंदी की उन्नति के लिए प्रयास करने के जिम्मेदारी  व अधिकार का जिक्र है किंतु किसी भी सरकार ने इस पर कोई विशेष कार्रवाई नहीं की. सो हिंदी – राजभाषा सन् 1950 के स्तर पर ही हिल-डुल रही है.

देश की भाषा के लिए अलग अलग शब्दाँश व वाक्याँश प्रयोग में लाए गए – किंतु किसी का भी सही अर्थ स्पष्ट नहीं है.  राष्ट्रभाषा का तो जिक्र कर ही लिया. कई लोग आज भी राजभाषा के अर्थ में राष्ट्रभाषा का प्रयोग करते हैं.

राष्ट्रभाषा के कई अर्थ निकाले जा चुके हैं कुछ निम्नानुसार हैं.

  1. राष्ट्र की प्रतीक भाषा के रूप में – जैसे राष्ट्र पक्षी – मोर, राष्ट्रगान – जन गण मन, राष्ट्रगीत – वंदे मातरम, राष्ट्रीय पशु – सिंह, राष्ट्रीय पताका – तिरंगा, राष्ट्रीय खेल – हॉकी, उसी तरह राष्ट्रीय भाषा ( राष्ट्रभाषा) हिंदी.- पर यह गलत है. ऐसा कहीं भी निर्देशित नहीं है कि हिंदी को राष्ट्र की प्रतीक भाषा का स्थान दिया गया है. हाँ दोने की पुरजोर असफल कोशिश की गई है – इसमें कोई संदेह नहीं.
  2. राष्ट्र में बहुतायत में बोली जाने वाली भाषा – इस बारे में कई संगठनों ने कई तरह के आँकड़े प्रस्तुत किए हैं किंतु कौन सा अधिकारिक है यह अस्पष्ट है. इस की वजह से इसमें आपसी होड़ है. कोई कहता है कि 80 % से ऊपर भारतीय जनता हिंदी भाषी है तो कोई इसे 20 %  आँकता है. यह भी स्पष्ट नहीं है कि इन आँकड़ों में मेरे जैसा व्यक्ति जो एक से ज्यादा भाषाएं बोल सकता है किस वर्ग में लिया गया है... मातृभाषा के वर्ग में, हिंदी भाषी वर्ग में या फिर बोल सकने वाली सारी भाषाओं के वर्ग में. ऐसे में संभव है कि सभी भाषा-भाषियों का जोड़ भारतीय जनसंख्या के तीन गुणा हो जाए. आंकड़े स्पष्ट नहीं करते कि यह संख्या उनकी है जिनकी मातृभाषा हिंदी है या वे जिनकी मातृभाषा कोई भी हो वे हिंदी बोल सकते हैं. ऐसी और भी अस्पष्टताओं के कारण इन आँकड़ो को अधिकृत जानकर निर्णय लेना संभव नहीं हो पा रहा है.

  1. देश के कामकाज की भाषा – हाँ हिंदी आज देश के कामकाज की भाषा के रूप में अनुमोदित है किंतु इस स्तर पर इसे राष्ट्रभाषा नहीं राजभाषा कहा गया है. यहां राष्ट्रभाषा शब्द का प्रयोग राजभाषा के रूप में किया जा रहा है.

  1. सारे राष्ट्र में बोली जाने वाली भाषा – यानि हिंदी को एक ऐसी भाषा समझा जाता है जो राष्ट्र भर में बोली जाती है. अर्थात आप किसी भी राज्य में चले जाएं वहां के निवासी हिंदी बोलते- समझते पाए जाएंगे. यह कुछ लोगों के अनुभव व विचार हैं . सही मायने में ऐसा नहीं है. ऐसे इलाके भी हैं जहाँ लोग हिंदी से दूर-दूर तक परिचित नहीं हैं. गाँवों में आज भी राज्य की भाषा बोली व समझी जाती है. वहाँ न अंग्रेजी चल पाती है न ही हिंदी. हाँ यह सच है कि तमिलनाड़ु में हिंदी का विरोध है और कहीं नहीं. मैं यहाँ जम्मू- काश्मीर की चर्चा नहीं कर  रहा हूँ क्यंकि वहाँ तो हमारे कई कानून नहीं चलते. शायद यह भी राजनीतिक कारणों से ही है. जब सारे राष्ट्र में बोली जाने वाली भाषा की बात करें तो हमें ज्यादातर क्षेत्रों में और सारे देश में के शब्दाँशों के फर्क को भलि-भाँति स्वीकारना होगा. इसलिए इस तरह का वक्तव्य ठीक नहीं कहा जा सकता कि  “हिदी सारे देश में बोली जाने वाली भाषा है.

एक वाद में अहमदाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारत में नेशनल-लेंग्वेज       (राष्ट्रभाषा) नाम से कोई भाषा अधिकृत नहीं है.

अब आईये राजभाषाओं पर – सरकारी तौर पर राजभाषा तो एक ही है – हिंदी. पर साथ ही सहायक है अंग्रेजी. किंतु राजभाषाओं का यहाँ कोई सही अर्थ नहीं निकलता. लोग राज्यों में बोली जाने वाली भाषाओं के समूह को राजभाषाएं कहें तो ठीक है. संविधान का अष्टम अनुच्छेद इन्हें राज्य की राजभाषाएं कहता है. कहीं कहीं राज्यभाषाएं शब्द का भी प्रयोग हुआ है. इसे कुछ हद तक सही कहा जा सकता है पर कोई प्रमाण नहीं है. सरकार के गृहमंत्री के एक संवाद में राष्ट्र-भाषाएं शब्द देखा गया है. इससे उनका आशय संविधान के अष्टम अनुच्छेद की भाषाओं से था. इसी तरह राष्ट्रीय भाषाएं, राज्यभाषाएं, स्टेट लेंग्वेजेस, नेशनल लेंग्वेजेस शब्दों का गलत प्रयोग, भारतीय संविधान के अष्टम अध्याय में सम्मिलित भाषाओं के बोधकारक के रूप में ही किया गया है. जबकि एसे कोई पारिभाषित शब्द नहीं हैं.

सारांशत- कहा जा सकता है कि हमारे देश में मूलतः राजभाषा और राज्य की राजभाषाएं है. राज्य की भाषाओं को ही समूह रूप में संविधान के अष्टम अनुच्छेद में रखा गया है जिनकी संख्या समय-समय पर अनुमोदनानुसार बढ़ रही हैं. अन्य सारे नाम इन दोनों के नाम के बदले में ही लिया जा रहा है. राष्ट्रभाषा नाम की कोई चीज मेरी जानकारी में नहीं है. यदि किसी के पास ऐसा कोई अभिलेख हो तो कृया बताएं कृतार्थ रहूँगा.

इतना ही नहीं कई तो यह भी कहते लिखते पाए गए हैं कि हिंदी हमारी मातृ भाषा है. यह उनके लिए व्यक्तिगत तौर पर सही हो सकता है लेकिन देश के संदर्भ में हिंदी मातृ भाषा तो है ही नहीं क्योंकि मा3तृभाषा हर व्यक्ति की अलग हो सकती है.

अब कुछ ऐसे मुद्दों पर विचार किया जाए जो भाषाई मुद्दों को हवा दे रहे हैं...

  1. भारत मे भाषाई राज्यों का गठन - इसकी वजह से क्षेत्रीय भाषाएं अपना गढ़ बना चुकी हैं और संगठित होकर पूरे राष्ट्र को एक भाषा में पिरोने के विरुद्ध संघर्ष में शामिल हो रहे हैं. हमने यह गलती तो कर दी किंतु इससे पार पाने में असमर्थ हैं. स्वाभाविक है कि भाषाई राज्यों में राज्य की राजभाषा (राज-काज की भाषा कही जा सकती है) सर्वोपरि होगी एवं वहां किसी को देश के लिए एक अन्य भाषा सीखने के लिए मजबूर करना शायद न्यायोचित ही न हो. जिसे राष्ट्र-स्तर पर कुछ करना ही न हो, वह राष्ट्र के स्तर की भाषा सीखे ही क्यों ? जिसे अंग्रेजी संबंधी कार्यों से कोई वास्ता ही न हो तो वह अंग्रेजी क्यों सीखे ? बात समझ में आती है. किसी गाँव के एक छोटे किसान या मजदूर का काम वहाँ की भाषा जान लेने मात्र से सम्पन्न हो जाता है तो वह किसलिए हिंदी या अंग्रेजी सीखे ?

  1. लेकिन अब भी बहुत से भारतीय अंग्रेजी सीखते हैं... कारण कि अंग्रेजी में बहुत सा ज्ञान साहित्य उपलब्ध है. प्रमाणित न ही सही पर अंग्रेजी विश्व भाषा के रूप में उभर रही है. इसीलिए वैश्विक संप्रदाय में शामिल होने व व्यापार करने के लिए लोग अंग्रेजी सीखने को मजबूर हैं. इसी के सहारे आज का हमारा आई टी नेटवर्क का भी काम हो रहा है. भारत में भी और बाहर भी उच्चतम शिक्षा के लिए अंग्रेजी का सहारा जरूरी हो गया है. दुनियाँ के ज्यादातर व हमारे देश के सारे कम्प्यूटरों में जानकारी अंग्रेजी में ही उपलब्ध है. देश-विदेश जाकर काम करने के लिए व देश-विदेशों के संपर्क में काम करने हेतु आज हमारे देश में अंग्रेजी की मजबूरी है, सो जिन्हें जरूरत है, वे सीखते हैं.

  1. इसी तरह जिन्हें देश के स्तर पर काम करने की जरूरत है जैसे सारे देश में सामान बेचने का व्यवसाय, राज्येतर कहीं और काम ढूँढने की मजबूरी हो तो वह हिंदी भी सीखता है. आज का मानव जरूरतों से मजबूर हेकर ही सीखता है. सो हिंदी के प्रचारकों को भी चाहिए कि हिंदी में इतना ज्ञान उपलब्ध कराएं कि लोगों को लगे कि अंग्रेजी से ज्यादा ज्ञान हिंदी में उपलब्ध है तो हमारे देश के तो क्या सारी दुनियाँ के लोग हिंदी सीखने को मजबूर होंगे. लेकिन इसके लिए हमें जी तोड़ मेहनत कर वह मुकाम हासिल करना होगा. कम्प्यूटरों को इस तरह विकसित किया जाए कि सारा जग अपने कम्प्यूटरों मे हिंदी की जरूरत महसूस करे. यह सब कहना तो बहुत ही आसान है पर करें कैसे. यह उन्हें सोचना है जो चाहते हैं कि कम से कम सारा भारत (विश्व न सही) हिंदीमय हो जाए. यह एक दौर है एक आँदोलन है जो समय के साथ – साथ  अपने आप को बदलता रहता है. इसका रुख हिंदी की तरफ करने के लिए हिंदी को उस हद तक समृद्ध करना होगा. केवल यह कह देने से कि हिंदी राजभाषा है इसलिए सीखना होगा या गाँधी जी ने कहा था, इसलिए सीखना होगा - तो आज के युग में किसी के कान में जूँ नहीं रेंगने वाली. समय का तकाजा कुछ और ही है.

  1. जहाँ तक तमिलनाड़ू का सवाल है वहां राजनीतिक कारणों से हिंदी पनप नहीं पाई है. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि रजनीकांत और कमल हसन जैसे सिने कलाकारों के होते हुए भी वहाँ हिंदी फिल्मों का पागलपन है. हिंदी सिनेमा भी वहाँ हाउस-फुल चलते हैं. यदि हिंदी की जानकारी न हो तो हिंदी फिल्में इतनी चलती क्यों हैँ ? इससे जाहिर है कि वहाँ भी लोग हिंदी जानते हैं किंतु अन्य कारणों से हिंदी का साथ नहीं दे पाते. जो लोग संविधान के भाषायी समिति के रिपोर्ट से अवगत हैं वे जान गए होंगे कि तमिल भारत की राजभाषा बनते-बनते रह गई थी. इसीलिए तमिल का हिंदी से संघर्ष चलता रहता है. कुछ समय तक तो तमिलनाड़ू में हिंदी खबरें न तो रेड़ियो पर सुनी जा सकती थीं और न ही टी वी पर देखी जा सकती थीं.  अब मामला शांत होता नजर आ रहा था किंतु हाल ही के फरमान ने बुझते दिए में घी डाल दिया. वह चिंगारी फिर से भड़क उठी.

  1. भारत में बहुत सारी भाषाएं साहित्य-समृद्ध हैं. इसलिए हिंदी को उनसे आगे रखना उनके लिए तकलीफदायक है. और तो और आज गुजराती भी हिंदी से होड़ लेने की बात करती है. एक ऐसा वर्ग भी है जो इस तर्क का प्रचार कर रहा है कि गुजनागरी भाषा – जिसमें देवनागरी को गुजराती लिपि में लिखा जाए - बिना अनुनासिक, अनुस्वार व शिरोरेखा के – हिंदी की अपेक्षा सरल और संपन्न है. यह वर्ग गुजनागरी को देश की भाषा के रूप में देखना चाहता है. बाकी बंगाली, मराठी तमिल, तेलगू भाषा का साहित्य तो जगजाहिर है. मेरी सोच है कि इन सब तर्कों से ऊपर उठकर हिंदी को यदि पदासीन करना है या होना है तो हिंदी को इस तरह बनाया जाए कि जनता इसके उपयोग के लिए उसी तरह मजबूर हो जाए, जैसे आज अंग्रेजी के बारे में कहा जा सकता है. केवल कानूनों और व्यक्तित्वों (व्यक्तियों) की राय व अधिकार से भाषायी आंदोलन को समग्र व सार्थक नहीं बनाया जा सकता.
        ---------------------------------------------------------------------
इस तरह यह लेख देश की भाषा के बारे में प्रकाश डालता है. भाषाओं संबंधी विभिन्न शब्दाँशों व वाक्याँशों की व्याख्या करता है . उम्मीद है यह लेख पाठकों के लिए रुचिकर होगा. पाठकों की टिप्पणियों एवं सुझावों का बेसब्री से इंतजार होगा.
 अयंगर

सोमवार, 22 सितंबर 2014

हम हिंदी क्यों पढ़ते हैं

हिंदी कुंज पर मेरे लेख हिंदी दशा और दिशा पर - समीर पिलानी - ने टिप्पणी दी.- “ Hey I want some help from u people. I hv an project on Hindi related 2 this. Topic is “हम हिंदी क्यों पढ़ते हैं. Pl give info 4 this.”

प्रोजेक्ट का विषय व टिप्पणी की भाषा देखकर लगा कि समीर पिलानी अभी स्कूल का विद्यार्थी है. सो और भी अच्छा लगा कि कोई विद्यार्थी हिंदी जानने की आशा से नेट पर मेरा लेख देख पाया. पढ़ा या नहीं पता नहीं. मुझसे कुछ और जानने की इच्छा है. मेरी खुशी का ठिकाना मत पूछिए... किसी ने कुछ जानना चाहा है. मैं तुरंत यह लिखने बैठ गया. विषय है हम हिंदी क्यों पढ़ते हैं.
===============================================================
       हम हिंदी क्यों पढ़ते हैं
 (15 सितंबर 2014 को हिंदी कुंज में राजभाषा हिंदी दिवस शृंखला अंतर्गत प्रकाशित)

हम हिंदी क्यों पढ़ते हैं ? यह एक अहम सवाल है और हर भारतीय ( या कहें हिंदुस्तानी ?) के मन में स्वभावतः उठना चाहिए.

पहली कारण यह कि जिन लोगों की यह मातृ भाषा है, उन्हें हिंदी इसलिए सीखना चाहिए कि वह उनकी मातृ भाषा है. मातृ भाषा को जानना जरूरी है – केवल इसलिए नहीं कि वह मातृभाषा है. बल्कि इसलिए भी कि सारे रिश्तेदार उसी भाषा में संपर्क करते हैं. हो सकता है कि परिवार में पत्राचार आदि भी इसी भाषा में किए जाते हैं.

दूसरा कारण यदि आप हिंदी भाषी प्रदेश में रहते हैं तो आप के चारों ओर हिंदी का माहौल होता है. निश्चित ही वहां की संपर्क भाषा भी हिंदी होगी. इसलिए हिंदी भाषी इलाके में रहने वाले को हिंदी सीखनी पड़ती है. अन्यथा वह आस - पास के लोगों से ( दोस्तों से भी) अलग-थलग रह जाएगा. कई सरकारी व इलाके के संस्थानों की सूचनाएं व जानकारी हिंदी में ही दी जाती होंगी – आप उन्हे समझने जानने से वंचित रह जाओगे.

तीसरा कारण यह कि हिंदी का साहित्य बहुत ही धनी है. हिंदी जानने से आप हिंदी साहित्य पढ़ पाओगे और उसमें समाहित जानकारी हासिल कर पाओगे. हाँ इसके लिए आपका साहित्य में रुचि होना आवश्यक है. यदि आप साहित्य में रुचि नहीं रखते तो यह कारण आपके लिए हिंदी सीखने को प्रेरित नहीं करता. साहित्य का मतलब हिंदी संबंधी लेख ही नहीं वरना कविता, कहानी नाटक, उपन्यास, कार्टून , सिनेमा, गाने  इत्यादि भी है.

चौथी बात उत्तर भारत में पूरी तरह व दक्षिण भारत में शायद 60-65 प्रतिशत शहरी लोग हिंदी जानते हैं इसलिए हिंदी जानने से आपको पर्यटन के दौरान संवाद करने में आसानी होगी. अब सवाल उठता है कि हर कोई पर्यटन क्यों करे ?  हाँ बात तो सही है परंतु पर्यटन के भी कई कारण होते हैं. जैसे बिजिनेस में सामान की बिक्री के लिए, जगह से परिचित होने के लिए व इतिहास के स्मारकों के दर्शन के लिए , प्रकृति का आनंद लेने के लिए, उच्च-उच्चतर पढ़ाई के लिए, नौकरी की खोज में और अन्येतर कारणों से लोगो को सफर में दूसरी जगहों मे जाना पड़ता है. तब संपर्क भाषा की जरूरत पड़ती है. इस विधा में हिंदी एक बहुत ही सहायक भाषा है,. खास तौर पर उत्तर भारत में हिंदी के बिना गुजारा करना भारी पड़ सकता है.

आगे बढ़ते हैं – पाँचवाँ कारण - इन सबके अलावा एक और प्रमुख कारण है कि हिंदी हमारे देश की राज भाष। है ( Official Language of our Nation ऑफिशियल लेंग्वेज ऑफ अवर नेशन). इसलिए भी हम हिंदी सीखते हैं. देश के प्रति अभिमान जताने करने का यह एक प्रशस्त तरीका लगता है. यह मेरी विचार है.

अब कुछ और बातें – अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आप निहारें तो जान पाएंगे कि विश्व के अक्सर देशवासी अपनी देश की भाषा में संवाद करने में रुचि रखते हैं , अपनी देश की भाषा को महत्व देते हैं और इसमें वे अपना गौरव समझते हैं. उन्नत, उन्नति-शील या प्रगतिशील व अप्रगतिशील के तीन विभागों में विश्व के देशों को बाँटा गया है. पहले दोनों तरह की श्रेणी के देश अपनी भाषा पर बहुत गौर करते हैं. पर हमारा भारत इसमें पिछड़ा है, क्योंकि हमारे पास कहने मात्र के लिए राजभाषा है. इसमें आज भी कई तरह के विरोध हैं. देश के नेताओं ने तो भाषा को राजनीति का विषय बना दिया है. दक्षिण भारत में खास तौर पर तमिलनाड़ू में, हिंदी का पुरजोर विरोध है. अभी हाल में ही एक लेख पढ़ा जिसमें विद्यार्थियों ने तमिलनाड़ू में भी हिंदी के शिक्षा के लिए अभियान छेड़ा है.  नेताओं को चाहिए कि अतर्युद्ध छोड़कर देश की विश्वस्तरीय स्थिति पर भी विचारें और देश में राजभाषा के स्थान को सुदृढ़करें.

अब आती है बात कि ऐसा क्या किया जा सकता है कि लोग हिंदी के प्रति रुचि लें. इस पर मेरे कुछ सुझाव हैं. इसका सर्वप्रथम मुद्दा उजागर करने के लिए मैं एक सवाल करता हूँ कि हमारे देश की राजभाषा हिंदी होते हुए भी और बहुत सी दक्षिणी भारत व पश्चिमी भारत की भाषाएँ समृद्ध होते हुए भी, लोग अंग्रेजी क्यों सीखते हैं. कुछ सोच कर बोलने वाले ज्यादातर लोग यही कहेंगे कि –

·        अंग्रेजी के बिना विदेशों में न पढ़ाई हो सकती है और न ही नौकरी.
·        अंग्रेजी के बिना IT Sector  में काम करना या धंधा करना देश के किसी व्यक्ति या संस्थान के लिए संभव नहीं होगा.
·        ज्ञान का भंडारण जो अँग्रेजी में हो रखा है वह विश्व के (शायद) किसी भाषा में नहीं है. सो उस ज्ञान के अर्जन के लिए भी अंग्रेजी जानना जरूरी है. इससे कई शोध कार्यों में सहायता मिलती है. पढ़ाई में सहायक होती है. ज्ञान वृद्धि तो होती ही है.

इनके अलावा भी बहुत से मुद्दे उभरेंगे पर वे सभी इन तीनों की अपेक्षाकृत कम महत्व के होंगे.

यदि हम इन तीनों उत्तरों को ध्यान में रखकर सोचें, तो साफ नजर आएगा कि हमें हिंदी को शिखर पर लाने के लिए क्या करना होगा. यदि हम इन विधाओं को हिंदी में भी अपना लें या हिंदी के लिए भी इन बातों को कहने लायक हो जाएं तो किसी से कुछ कहने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. लोग अपने आप अपने लिए हिंदी सीखेंगे. उन्हें ज्ञान और धन चाहिए.

अब जवाब तो मिला पर उसे कर दिखाना क्या आसान है. हिंदी भाषियों को और वे लोग जो हिंदी को देश के ललाट की बिंदी जैसी सर्वनाम देते हैं या फिर जो देश की भाषा के प्रति संवेदनशील हैं, या वे जो देश व विश्व की भाषा के रूप में हिंदी को देखना चाहते हैं - वे सब एकजुट होकर इस दिशा में कार्य करें और अन्य लोगों को जो साथ दे सकते हैं प्रोत्साहित करें कि इस दिशा में समग्र कार्य हो तो कुछ वर्षों में हिंदी का स्थान देश में और विशव में माननीय हो सकता है. आज हिंदी के नाम पर विश्व हिंदी सम्मेलन तो होता है किंतु सही दिशा में कितना काम हो रहा है यह तो वे ही बता पाएंगे जो इस विश्व सम्मेलन में भागीदार होते है.

अब यह समय बात करने का नही काम करने का है. कुछ काम हो तो आगे बढ़ें वरना जहाँ पड़े वहाँ सड़े...चरितार्थ होने जा रही है.
.......................................................................................................

माड़भूषि रंगराज अयंगर.
8462021340

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

हिंदी उच्चारण में सहयोग कीजिए


हिंदी उच्चारण में सहयोग कीजिए
(07.07.14 प्रेषित एवं 08.07.14 को हिंदी कुंज में प्रकाशित)

हर अभिभावक चाहेगा और उसे चाहना भी चाहिए कि उसके दिल का टुकड़ा आसमान की ऊंचाइयों को छुए. यदि उस मुकाम के लिए उसे हिंदी सीखनी या सिखानी पड़े तो लक्ष्य प्राप्ति के लिए वह हिंदी सीखेगा भी और सिखाएगा भी. अपने बच्चे को हिंदी के स्कूलों में भी पढ़ाएगा. तथ्यों की मेरी जानकारी के तहत भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है भाषा निरपेक्ष नहीं. इसलिए यहाँ आप किसी को भी, कोई भी धर्म अपनाने से रोक नहीं सकते, लेकिन भाषा के मामले में ऐसा नहीं है और भारतीयों को हिंदी सीखने लिए कहा जा सकता है. मेरी समझ में केवल इतना ही आता है कि राजनीतिक समीकरणों के लिए हमने हिंदी की यह हालत बना दी है.

हिंदी सीखने में थोड़ी कुछ कठिनाइयाँ हैं जैसे उच्चारण और लिंग भेद. जिनमें उच्चारण पर मैं यहाँ विचार करना चाहूंगा. विभिन्न भाषा भाषी हिंदी का उच्चारण सही तरीके से नहीं कर पाते. हिंदी के जानकारों को चाहिए कि उन्हें सही उच्चारण से अवगत कराएं, न कि उन पर हँसें. कई बार तो ऐसा समझ में आया है कि गलत उच्चारण के तर्कसंगत कारण हैं जिनका मैं यहाँ उल्लेख करना चाहूंगा.

दक्षिण भारतीय  “खाना खाया” का उच्चारण “काना काया” के रूप में करते हैं. वह इसलिए कि तामिल वर्णमाला में प्रत्येक वर्ग में दो ही अक्षर होते हैं जैसे क, ङ. वहाँ ख,, घ अक्षर नहीं होते. शब्दों के बीच में लिखने के लिए तीसरे अक्षर (ग) हेतु प्रावधान किया हुआ है.  इसालिए कमला व गमला शब्द कि लिपि तामिल में एक जैसी होगी. वैसे ही कागजगागर में प्रथम दो अक्षरों की लिपि एक ही होगी. लेकिन जब उसे पढ़ा जाएगा तो दोनों को कागज और कागर पढ़ा जाएगा. इसलिए तमिल भाषा अन्य भाषाओं के सापेक्ष कठिन भी है. वे गजेंद्र को कजेंद्र कहेंगे और लिखेंगे भी. कभी सारा दक्षिण मद्रास हुआ करता था, सो यह कमिय़ाँ (खूबियाँ) कम – ज्यादा पर सारे दक्षिण में मिलेंगी. कर्नाटक व आँध्र वासियों के साथ यह संभावना कम होती है. तमिलनाड़ू के अलावा बाकियों को हिंदी से लगाव भले न हो पर नफरत तो नहीं है. तमिल में भी केवल शायद इसलिए कि हिंदी, तमिल को पछाड़कर राजभाषा का दर्जा पाई है. यहाँ भी यह राजनीतिक कारणों से ज्यादा पनपी है अन्यथा लोगों को कारण भी मालूम न हो.

हमें लोगों की ऐसी समस्याओं को समझना चाहिए और हिंदी में उनकी रुचि का स्वागत करना चाहिए, न कि उनकी गलतियों पर हँसना चाहिए. लोग हँसेंगे ऐसी भावना आने के बाद कोई भी आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं कर पाएगा. यदि किसी उत्तर भारतीय को दक्षिणी भाषा के शब्दों का उच्चारण करना पड़े तो कठिनाइयाँ समझ में आ जाएँगी. दक्षिण भारतीयों की जुबान काफी लचकदार होती है. इसलिए क्लिष्ट से क्लिष्ट शब्दों का उच्चारण भी वे आसानी से कर लेते हैं.  और यही एक खास कारण है कि दक्षिण भारतीय उत्तर भारतीयों की अपेक्षा उत्तम व सफल स्टेनोग्राफर (खासकर अंग्रेजी के) होते हैं.

अब पूर्व की तरफ चलें. बंगाल साहित्य का बहुत ही धनी है. फिर भी वहाँ की भाषा में दो अक्षर एक जैसे हैं. क्या यह उचित माना जाए कि बंगाली जैसे समृद्ध भाषा के दो अक्षर एक से हों. अब देखिए “Biswas” शब्द को अपनी भाषा में विश्वास लिखते और बिश्वास उच्चरित करते हैं. उनके इस उच्चारण से साफ जाहिर होता है कि दोनों ‘’ के उच्चारण भिन्न हैं और ऐसा तब ही संभव होगा जब ये दो अलग अलग वर्ण रहे हों. अब अंग्रेजी के “b, w & v” वर्णों के लिए एक ही  अक्षर लिखा जाता है लेकिन उनका उच्चारण अलग अलग होता है. ऐसा नही है कि बंगाली भाषा में ‘’ का प्रयोग नहीं होता. यदि मेरी याददाश्त धोखा नहीं दे रही हो तो पहले को पेट कटा व बोला जाता था. सन् 1960 के दशक में बंगाली पत्रिका नवकल्लोल के अंतिम पृष्ठ पर अंग्रेजी में Navakallol लिखा जाता था लेकिन अब उसे Nabakallol लिखा जाता है.

बंगाली भाषा के उच्चारण के बारे में लोग मजाक करते थे कि मुँह में रसगुल्ला डालकर हिंदी बोलिए, आपका उच्चारण बंगाली भाषा की तरह हो जाएगा. इसी तरह का असर बंगभाषियों के हिंदी उच्चारण में मिलता है. कोई भाषाविद ही इस पर पर्दे के पार की खबर दे पाएगा.

बंगभाषी अक्सर कहते मिलेंगे
आमि जॉल खाबो
मद खाबो
सिगारेट खाबो इत्यादि... 

यानी मैं पानी, शराब, सिगरेट पिऊंगा / पिऊंगी. पर उनके साहित्य पढ़िए - 

वे रसपान करते हैं, 
जलपान करते हैं
धूम्रपान करते हैं
मदपान करते हैं

यह शायद समय से आया फर्क है कि लोग सेवन को खाना कह जाते हैं.

आसामी भाषा काफी कुछ बंग भाषा से मिलती जुलती है. इसलिए उनके उच्चारण में भी मिलती जुलती भिन्नताएँ है. असमी भाषा में और के लिए अलग अलग अक्षर हैं. आसाम में का उच्चारण जैसा च का उच्चारण स जैसा और का उच्चारण जैसा होता है. को भी जैसे उच्चरित किया जाता है. 

इससे यजमान का उच्चारण जजमान जैसा और 
चम्मच का उच्चारण सामोस सा होगा. 
बाहरी लोग सामोस को समोसा समझने की गलती कर देते हैं. 

गौहाटी निवास के शुरुआती दिनों में एक बार मुख्य डाक घर के सामने, मैंनें सिटी बस पर बंगाली भाषा में लिखा चिठी बस पढ़ लिया और समझ लिया कि यह पोस्ट ऑफिस कर्मचारियों की बस है. करीब दो घंटे बस के इंतजार में गँवा दिए. जब वहाँ के निवासियों से पूछा तो बताए कि आपके सामने कितनी बस जा चुकी हैं. आप चढ़े ही नहीं. जब अगली बस में उनने बताया, तो जाना कमीं कहाँ थी. मैं असमी लिपि को बंगाली लिपि समझ कर पढ़ रहा था.

इधर गुजरात के कच्छ इलाके में ‘’ को ‘’ सा उच्चरित किया जाता है. ऐसा लगता है कि इन्हीं-किन्हीं कारणों से सिंधी हिंदी, सिंधु हिंदू शब्द बने होंगे. सिंधु घाटी की सभ्यता से हिंदुओं का संबंध होने का यह भी एक असर या कारण हो सकता है. गुजराती लिपि हिंदी के काफी करीब है लेकिन हमारे बचपन में अपनाई गई हिंदी का उसमें अभी भी बाहुल्य मिलता है. अभी भी वहां अ पर ए की मात्रा से एक (अेक) लिखा जाता है. हो सकता है कि भविष्य में हिंदी – गुजराती और भी ज्यादा करीब होंगे.

पंजाब में लिखी जाने वाली गुरुमुखी लिपि में आधा अक्षर लिखने का प्रवधान नहीं है. इसीलिए पंजाबी 
स्कूल को सकूल
स्त्री को सतरी या इस्तरी
इंद्र को इंदर
शब्द को शबद कहते हैं. 

लेकिन द्वयत्व की मात्रा होने की वजह से वे मम्मा, दद्दा चम्मच कथ्था, गय्या बच्चा,  धुत्त जैसे शब्दों का उच्चारण बड़ी आसानी से कर लेते हैं. 

हिंदी में द्वयत्व की मात्रा नहीं है. हिंदी ने अब तक गुरुमुखी से इस ताकतवर मात्रा को आत्मसात नहीं किया है. अब बिना देर किए इसे हिंदी में अपना लेना चाहिए.

महाराष्ट्र में ‘’ को ‘’ सा जोर देकर उच्चरित किया जाता है. मराठी भाषा में छोटे को तू व बड़ों को तुमी कहकर संबोधित किया जाता है, जो मराठी भाषा के तू एवं तुमी के पर्यायवाची के रूप में उनके द्वारा हिंदी के तु और तुम व्यवहरित होते हैं. मराठी भाषा में तुम्हारा और आपका के लिए तुमचा व तुमीचा शब्द प्रयोग किए जाते हैं. अतः मराठी जनता अन्यों को तु, तुम, तुम्हारा शब्दों का प्रयोग बिना हिचक हिंदी में कर लेती है. अन्य इसे अपमान समझते हैं, जबकि उनका इरादा अपमान करने का नहीं होता है. हिंदी में तुमी शब्द नहीं होने तके कारण वे तुमी की जगह भी तुम का प्रयोग करते हैं जो हिंदी भाषियों को अपमान जनक लगता है. ऐसा होता है, पर इरादे गलत नहीं होते. इसलिए हिंदी भाषियों को समझना चाहिए इसके लिए उन्हें समय और स्थान देना चाहिए. जहाँ संभव हो लोगों को जानकारी देनी चाहिए. आप शब्द शायद मराठी में काफी बाद में आया है इसलिए अब इसका प्रयोग होने लगा है। मराठी जानने वालों को समझ आ रहा होगा कि इसमें कोई गलत मानसिकता नहीं है. बल्कि जानकारी की कमी लोगों को आभास कराती है कि मराठी की तरह ही तू एवं तुम का प्रयोग हिंदी में भी हो रहा होगा. मराठी में ल के साथ ळ का प्रयोग होता है बल्कि ज्यादातर ळ का ही प्रयोग होता है इसलिए हिंदी में जहाँ ल उच्चरित होता है वहाँ मराठीजन ळ का उच्चारण करते हैं. इसे समझने की जरूरत है.

एक वाकया याद आया. एक बार मैं नागपूर में सुबह निकलकर एक सड़क पर चलता गया. मनमर्जी मुड़ता गया. करीब दिन के डेढ़ बजे मुझे भूख लगी और घर का रास्ता पता नहीं था. मैंने एक पान की दुकान पर पूछा तो उसने बताया – ये रोड पर जाओ. दो फर्लाँग  के बाद एक पेड़ गिरेगा. वहाँ से पलट जाना , संत्रा मार्केट मिल जाएगा. मेरी समझ में कुछ नहीं आया कि कैसे यह जान गया कि मेरे पहुँचते ही वहाँ पेड़ गिरेगा. दूसरा कि वहाँ से पलटने पर मैं वापस यहाँ न आकर संत्रा मार्केट कैसे पहुँचूंगा. तब एक हिंदी के जानकार ने समझाया, लगता है आप बाहर से आए हैं. डरें नहीं यहां पेड़ गिरेगा का मतलब है पेड़ दिखेगा या मिलेगा. पलटने का मतलब मुड़ने से है. बाँये-दाँए बताया नहीं जा रहा है यानी सड़क के साथ मुड़ना है. तब जाकर आत्मा शाँत हुई. य़ह इसलिए बताया गया है कि इलाके की भाषा का किसी दूसरे भाषा पर कितना असर होता है. इसीलिए मुझे कोई आश्चर्य नहीं होता जब लोग हमारी अँग्रेजी के उच्चारण का मखौल बनाते हैं. यदि हम उनकी हिंदी का मखौल बनाएं तो उन्हें समझ आएगा. लेकिन ऐसा करना अनुचित है. कुत्ता मुझे काटता है तो मैं उसे नहीं काटूँगा. हाँ अगली बार न काटे ऐसी सावधानी लेकर चलूँगा.

इन तथ्यों को विचारने पर यह प्रतीत होता है कि जिस तरह ठंडे प्रदेशों में टाइट और गर्म प्रदेशों में ढीले पोशाक पहनना सामान्य है, जिस तरह ठंडे प्रदेशों में आमिष भोजन व मदिरा सेवन सामान्य सा बन गया है उसी तरह प्रदेशों की बोली में भी वहाँ के वातावरण व खानपान का समुचित असर आ गया है और दिखता भी है. ऐसा देखा गया है कि ठंडे प्रदेशों कि भाषा अपेक्षाकृत सरल उच्चारण वाली होती है और गर्म प्रदेशों की भाषा कठिन उच्चारण वाली होती है. इसीलिए दक्षिण भारतीय भाषाएं उत्तर भारतीयों के लिए काफी कठिन है. भौगोलिक कारणों से शायद दक्षिण भारतीयों के जुबान में ज्यादा लचीलापन होता है जो उन्हें कठिन शब्दों का सही उच्चारण करने में सहायक होती है. किसी उत्तर भारतीय को यदि केरल की मलयालम भाषा या तमिलनाडू का तामिल के शब्दों को उच्चरित करना पड़े तो कठिनाई का बोध होगा. यह जल-वायु के कारण बनी शारीरिक संरचना के कारण होता है. उत्तर भारत के खाने से दक्षिण भारतीय के कॉन्स्टिपेशन हो जाता है जबकि उत्तर भारतीय को दक्षिण भारतीय खाना खाकर दस्त हो जाते हैं. एक जगह का खाना हल्की पाचन शक्ति के लिए है दूसरा कठोर पाचनशक्ति के लिए. उसाी तरह भाषा पर भी असर है. नेपाल में को उच्चरित करते हैं.

एक और खासियत देखी गई है कि तटीय इलाकों की लिपि (अक्षर) गोलाकार लिए हुए होती है जबकि भूखंडों में कोने लिए हुए होती है. इसमें गुजराती और असमी कुछ हद तक अपवाद लगते हैं. कुछ हद तक बंगाली भी इसी तरह का है. हो सकता है कि भारत के चौड़े इलाको में होने के कारण इन पर पास पड़ोस की भाषाओं का ज्यादा असर हुआ हो.

हिंदी वर्णमाला में भी अक्षरों का रूप स्वरूप परिवर्तन भी काफी हुआ है. वर्तनी के नियम भी बने व बदले हैं. अ, , , , , , , श्र, क्ष, अक्षर के यह रूप बाद की देन है पहले इन्हें अलग तरह से लिखा जाता था. अक्षर ळ मराठी भाषा से अपनाया गया. बड़ी ऋ, लृ और बड़ी लृ वर्ण तो लुप्त प्राय हो गए. चंद्र बिंदु व अर्ध चंद्र तो लुप्त ही हो गए. अब बच्चे हँस और हंस के फर्क को कम ही समझते होंगे. लेखनी की सुविधा, विशिष्ट शब्दों में अक्षरों अक्षरयुग्मों के बीच संशय ने इनकी जरूरत को जन्म दिया. पहले ‘’ अक्षर ‘रव’ जैसा लिखा जाता था यदि इसे र और व  को अक्षर युग्म पढ़ें तो अर्थ ही अलग हो जाता था. जैसे रवा और खा में फर्क क्या होता होगा सोचिए यदि ख में वे आपस में जुड़े नहीं होते.  इसलिए इनके बीच जोड़ का प्रावधान देकर ख बनाया गया. वर्तनी की सुधार के लिए अब ये की जगह ए का प्रयोग उचित माना गया.

पंचाँग को सही लिखना हो तो पञ्चाङ्ग लिखना होगा सरलीकरण ने इसे नया रूप दिया. हुआ का बहुवचन हुए तथा पाया का बहुवचन पाये यानि स्वर के बहुवचन में स्वर व व्यंजन के बहुवचन में व्यंजन को स्थान दिया गया. पंचमाक्षर नियम के अनुसार किसी भी शब्द में पूर्ण बिंदु (अनुस्वार) के बदले उसके बाद आने वाले अक्षर के वर्ग का पंचमाक्षर ही लगाया जाना चहिए. या यों कहिए कि हर वर्ग के लिए एक अनुस्वार हमारी वर्ममाला में दिया गया है और उसे उस वर्ग के अक्षरों के साथ ही प्रयोग करना चाहिए. इसके उदाहरण हैं कङ्काल, पञचाङ्ग. भण्डार, चन्दन और कम्बल. लेकिन इस दुविधा से बचाने के लिए पूर्ण बिंदु (अनुस्वार) का सहारा लेकर हिंदी को सरलीकृत किया गया. अब ऊपर के शब्दों को आसानी से कंकाल, पंचांग, भंडार, चंदन व कंबल सा लिखा जा सकता है. इसके साथ वर्ण माला में अनुस्वारों की आवश्यकता खत्म हो गई है और कुछ ही समय में यह अपने आप ही लुप्त हो जाएँगे. ऐसा ही हाल हुआ उऋण के साथ जहाँ पहले बडी ऋ लिखी जाती थी, वहाँ अब छोटी ऋ का प्रावधान हो गया और बड़ी ऋ लुप्त हो गई. अब तो नई पीढ़ी को ऋतु की जगह रितु लिखते बाहुल्य में देखा जा सकता है.

आज भी मैं इस दुविधा में हूं कि "हिमांशु" के लिए कौंन सी लिपि सही है  हिमान्शु (Himanshu) अथवा हिमाम्शु (Himamshu) या हिमाँशु (?). विस्तार में यह कि पंचमाक्षर नियम ने तो वर्गों के तहत अनुस्वार की समस्या का निदान कर तो दिया लेकिन वर्गेतर अक्षरों के लिए समस्या बनी ही रही.

संयुक्ताक्षर के लेखनी का तरीका भी समयानुसार बदला है. क् व ष जुड़कर  क्ष बना, ज् व न जुड़कर ज्ञ बना, त् व र जुड़कर त्र बना. बड़ों ने बताया भी था कि एक समय गीताप्रेस गोरखपुर से छपी हिंदी वर्णमाला की किताब में क्ष,त्र.ज्ञ अक्षर होते ही नहीं थे. वैसे ही श व र मिलकर श्र बना श्रृंगार / शृंगार लिखने का तरीका पहले और आज पूरी तरह से भिन्न है. कई अक्षर अपना रुप परिवर्तन कर गए. अ, ख, ण, झ, ए के यह नए रूप हैं. 

वर्तनी के नियम से भाषा के सरलीकरण के दौर में चंद्रबिंदु (अनुनासिक) व पूर्ण बिंदु (अनुस्वार) में फर्क मिटाने की कोशिश की गई. जहाँ तक अर्थ का अनर्थ न हो वहाँ तक इसे स्वीकारा गया किंतु जहाँ अनर्थ की संभावना बन जाती है वहाँ इसे अस्वीकार कर दिया गया. जैसे प्रदेश और परदेश (अमान्य), क्रम और करम (अमान्य), हँस औकर हंस (अमान्य), गांजा और गाँजा (मान्य). लेकिन मुसीबत तो यही है कि जिसे पता है कि अनर्थ होगा वह तो वैसे भी ऐसा प्रयोग नहीं करेगा. जिसे पता ही नहीं है सो करने में हिचकेगा भी नहीं.

चलिए अब फिर लौटें राजभाषा की तरफ. हमें यह उम्मीद तो करनी ही होगी कि हर व्यक्ति साहित्यिक व शुद्ध हिंदी के प्रयोग में समर्थ नहीं होगा. इसका प्रयोग केवल साहित्य के लिए किया जा सकता है. लेकिन सरल, सौम्य व जनसाधारण को समझ आने वाली भाषा ही मान्य है और उसका ही प्रयोग होना चाहिए. हिंदी को अन्य भाषाओं के प्रचलित शब्दों को बिना विलंब के आत्मसात कर लेना चाहिए. तभी लोग खुलकर हिंदी बोलने में खुशी महसूस करेंगे और राजभाषा की उत्तरोत्तर प्रगति होगी. हमारा राजभाषा अधिनियम भी यही कहता है. 

हिंदी सीखने वालों का, भले ही कुछ गलत बोलें – सराहना व प्रोत्साहन करना चाहिए कि वे भाषा के प्रति आकर्षित हैं. उनके उच्चारण व हिज्जों की गलतियों पर ताना मारना या मजाक करना (हँसना) उन्हें हिंदी सीखने में झिझक – हिचक उत्पन्न कर देता है. भाषा से उनकी दूरी बढ़ जाती है.

    अंत में यह जरूर कहना चाहूंगा कि मैं कोई भाषाविद नहीं हूँ. इस लेख की सारी जानकारी मेरी अपनी पढ़ी (कम) और सुनी व अनुभव (ज्यादा) की है. सही कोशिशों के बावजूद भी हो सकता है उसमें कहीं कोई त्रुटि रह गई हो या कुछ सूचनाएं मेरी नजर में न आईं हों. यदि किसी पाठक की जानकारी में ऐसा कुछ आए तो जरूर सूचित कीजिएगा. संभव हो तो अपने संदेश में विस्तार से बता दीजिएगा. आपका आभार रहेगा.
............................................

माड़भूषि रंगराज अयंगर.