मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.

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सोमवार, 9 मई 2016

सम-भोग या उपभोग.

सम-भोग या उपभोग

कुछ समय से अखबारों में और टी वी चेनलों में खबर पर खबर आए जा रही है कि बहला फुसला कर, शादी का झाँसा देकर एक लड़के ने एक लड़की पर कुछ महीने दुष्कर्म किया. अब परिवार वालों को खबर लगी, तो थाने में रिपोर्ट दर्ज की गई. पुलिस ने लड़के को हिरासत में ले लिया है, पूछताछ जारी है. पहले - पहले ऐसी खबर पढ़कर मन को बहुत तकलीफ हुआ करती थी, किंतु समाचार की तादाद देखने के बाद वह तकलीफ तो करीब - करीब गायब ही हो गई. अब मन दुखी सा रहता है कि इस जमाने में भी लड़कियाँ इस तरह के झाँसे में आकर केवल शादी का विश्वास दिलाने पर अपनी अस्मिता तक समर्पित करने को तैयार हो जाती हैं.


किसी अनपढ़ बाला को भी आज के जमाने में बरगलाना संभव नहीं है. ऐसे हालातों में, ऐसे जमाने में, खबरें यूँ होती हैं कि छः महीने तक लड़का उसके साथ दुष्कर्म करता रहा. समझ नहीं आता कि लड़की अब तक चुप क्यों थी ? इसका जवाब भी खबर में होता है कि वह शादी का झाँसा या कहिए विश्वास दिलाता रहा. तो क्या मैं
यह समझूं कि आज के जमाने में भी लड़कियाँ इतनी भोली हैं कि शादी के विश्वास दिलाने मात्र से वे अपनी अस्मिता भी दान कर देती हैं. यदि हाँ तो बाद में यह हल्ला गुल्ला या थाने में एफ आई आर क्यों ?

पता नहीं क्यों – आज भी जमाना मानने को तैयार नहीं है कि एक लड़की के लिए किसी भी हालात में शादी के पहले (विश्वास मात्र से) अपना सर्वस्व समर्पण करना अनुचित है. किंतु समाज का मानना है कि इस घटना में भी मात्र पुरुष का ही दोष है, मेरा मानना है कि पुरुष का दोष तो है ही कि उसने स्त्री को गलत विश्वास दिलाया और उसके विश्वास का नाजायज फायदा लिया. लेकिन साथ ही स्त्री का भी दोष है जो विवाह पूर्व संभोग को न चाहते हुए, भी पुरुष की बातों का विश्वास कर अपनी अस्मिला का दान भी कर देती हैं.

विवाह पूर्व संभोग को स्वीकारने वाली स्त्री, पुरुष के साथ संभोग का सम-भोग करती है. इसके लिए वे गर्भ धारण से बचने के हर संभव उपाय करते हैं. किंतु कभी - कभी चूक हो जाती है. ऐसे ही एक चूक पर गर्भ धारण हो जाता है. तब गर्भ धारण की अवस्था में समाज व परिवार में इज्जत बचाने के लिए – वे पुरुष के विरुद्ध
आग उगलने लगती हैं. इसके अलावा उसके पास कोई रास्ता भी तो नहीं है. कितनी लड़कियाँ इतनी हिम्मतवाली होती हैं कि वे अपना ऐच्छिक संभोग व गर्भधारण स्वीकारें. इसी संदर्भ में जब घर वाले इस अशुभ समाचार की खबर पाते हैं तो वे पुरुष के प्रति विष उगलने लगते हैं और चाहते हैं कि जितना हो सके उसका
नुकसान कर सकें और उचित सजा के प्रावधान के लिए थाने में रिपोर्ट दर्ज की जाती है. उसे यथा संभव बदनाम किया जाता है. किंतु स्त्री की करतूत पर किसी का ध्यानाकर्षित नहीं होता. उसके कृत्य को कोई भी नहीं नकारता. सारा दोष पुरुष का ही होता है. भले ही संभोग का सम-भोग स्त्री द्वारा भी किया जा रहा था.
अन्यथा क्या यह संभव है कि एक स्त्री पर लगातार कुछ महीनों तक दुराचार होता रहे और वह चुप रहे.

सड़क चलते किसी लड़की को आपके नजर में कोई खोट दिख जाए तो वह थाने पहुँच जाती है और सरकार द्वारा दिए गए कानूनी अधिकारों का सहारा लेकर वह तुरंत रिपोर्ट लिखा देती है. सरकार ने कानून भी तो ऐसे बना रखे हैं कि लड़की पर गलत नजर की खबर या उससे ऊपर की शिकायत होने पर 24 से 72 घंटे तक के लिए बिना कारण बताए हिरासत में रखा जा सकता है. भले ही वे 72 घंटे कभी खत्म ही न हों.

ऐसे ही हालात लिव इन रिलेशनशिप में भी होते हैं. जब तक दोनों पक्ष सहमत हैं सब मजे से चलता है और जब कोई मुसीबत सर पर आ जाए तो लड़का दोषी हो जाता है. यह कौन सा न्याय है ? मजे दोनों कर रहे हो तो मुसीबत भी दोनों झेलो. लड़का अकेले ही क्यों झेले. किसी ने आज तक लड़की से नहीं पूछा कि उसने इतने दिनों , महीनों या वर्षों तक इसे परदे में रखना क्यों स्वीकारा. कुछ तो कहती हैं चाकू की नोक पर धमकाता था. कुछ कहती हैं सोशल नेटवर्क पर डालने की धमकी देता था, तो कुछ कहती हैं कि घर वालों को फोटो भेज देगा. तब उन्हें नहीं लगा था कि घर वालों को यदि खुद ही बता दे तो सबसे निपटा जा सकता है. शाँति से सोचा जाए तो साफ जाहिर हो जाता है कि कुल मिलाकर संभोग में लड़का - लड़की दोनों की आपसी सहमति थी और जब लड़की अपनी गर्दन पर समाज व परिवार से ताने मिलने व इज्जत का बखेड़ा बनने की तलवार लटकते दिखती है तो अपना ब्रह्मास्त्र प्रयोग कर लेती है. लड़का तो समाज में आराम से बदनाम किया जा सकता है. उसके साथ किसी की सहानुभूति नहीं होती. लड़की के साथ सबकी सहानुभूति होती है क्योंकि उसकी अस्मिता लुटी है. कोई नहीं सोचता कि उसने अपनी मर्जी से पूरे होशो-हवास में स्वेच्छा से अपना समर्पण किया है और संभोग का सम-भोग भी किया है. बेचारा लड़का मारा जाता है, न कानून साथ देता है, न समाज और न ही परिवार. वह हर तरह से झेलता है.

ऐसे में एक लड़की अपने पसंदीदा लड़के के साथ दोस्ती करके, उसके साथ ऐच्छिक अनैतिक संबध बनाकर उसे आसानी से शादी के लिए मजबूर कर सकती है या फिर आराम से जेल भेज सकती है. सरकार और समाज ने कितना बड़ा हथियार सौंपा है उनके हाथ ? किंतु कहने को यह समाज नर प्रधान है. क्या पता कईयों के लिए
यह कमाई का एक साधन भी हो. बेचारा लड़का जाए तो जाए कहाँ. लड़की की सहमति उस वक्त स्टैंप पेपर पर लेकर नोटरी तो नहीं कराई जा सकती.

महात्मा गाँधी ने पिछड़ी जातियों को देश की मुख्य धारा में लाने के लिए आरक्षण की परिकल्पना की थी. वोट के राजनीतिज्ञों ने उन्हें अनुसूचित जाति- जनजाति में बदल दिया. उसमें अब तक न जाने कितने और वर्ग जोड़ दिए गए. लाभ हुआ तो केवल राजनीतिज्ञों को, जिनने वोटों की गिनती बनाए रखा. उसी तरह अबला कही 
जाने वाली नारी को सबला बनाने के लिए सरकारों ने उसे अलिखित अनुसूचित लिंग बनाकर पुरुषों व किन्नरों से अलग कर दिया है.

समाज में कहा जाने लगा कि नर व नारी समान हैं दोनों को कंधे से कंधा मिला कर चलना चाहिए जबकि कंधे से कंधे को रगड़ने के लिए हर संभव इंतजाम किए गए. लड़कियों को न जाने कैसे - कैसे कानूनी अधिकार दिए गए कि उनकी एक शिकायत पर कोई भी शख्स 72 घंटे तक की हिरासत में लिया जा सकता है. अब तो स्त्री को पुरुष से आगे बताना एक फेशन सा हो गया है. इसका शायद मकसद यह है कि इतने वर्षों तक नारी झेलती रही है अब पुरुष को भी कुछ झेलाया जाए. पुरुष तो सही मायने में यहॉँ नारी के बाद की नागरिकता पाता है. कानून के ऐसे
कदमों के कारण कितने ही पुरुष हैं जो अपनी स्त्रियों की प्रताड़ना झेल रहे हैं. अब तो इन अधिकारों का खुल्लमखुल्ला दुरुपयोग हो रहा है.

मैं आज भी असमंजस में हूँ कि इसे संभोग कहा जाए कि सम-भोग. बल्कि मुझे लगता है कि इसे नर का नारी द्वारा उपभोग क्यों न कहा जाए.

ऐसी हालातों में एक सद्पुरुष को किसी पराई नारी से बात करने में ही कतराता है कि न जाने कब कौन सी बात उन्हें गलत लग जाए और वह जाकर थाने में एक विरोधी रिपोर्ट दर्ज करा दे. बेचारे की जिंदगी भर की कमाई इज्जत मिनटों में मिट्टी में मिल जाएगी. अखबारों व टी वी की सुर्खियों में होगा वो अलग. ऐसी खबरों के दैनंदिन प्रकाशन से शायद निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि संभोग करना, अब नारी मात्र का एकाधिकार है. जब वह चाहे तब ही यह संभव है. उसकी चाह पर पुरुष सहमत हो तो ठीक अन्यथा अपनी राह जाए. उस पर भी नारी यह
हक रखती है कि पुरुष पर किसी भी समय बरगलाने का रिपोर्ट दर्ज करा सकती है. उसके लिए उसे कोई सबूत जुटाने नहीं पड़ते.

मैं यह तो नहीं कहता कि पुरुष बहुत ही सीधे सादे हैं. उनमें भी एक बड़ा तबका है जो नारी के नाजायज फायदे लेना पसंद करता है. किंतु यह किसी को अधिकार नहीं देता कि पूरे पुरुष समाज को ही बदनाम कर दे और नारी के नर के विरुद्ध बेहद अधिकार दे कि वह किसी भी पुरुष पर इल्जाम लगा सके. यह तो वही बात हुई कि हरेक सिख आतंकवादी हो गया और हर मुसलमान तालिबानी हो गया.

यह नाजायज है.
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