मेरा आठवाँ प्रकाशन / MY Seventh PUBLICATIONS

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बुधवार, 6 मार्च 2024

मैं और कैरम

 

मैं और कैरम

कैरम का रिश्ता मुझसे कब से है यह शायद मुझे भी नहीं पता। जब से मुझे खुद की खबर है, तब से कैरम मेरे साथ है। मुझे 1958-59 के वो दिन भी याद हैं जब हम दोस्त नैसर्गिक परिधान में ही कैरम खेलते थे। घर में कैरम पहले से था। कहाँ से आया इसका सही पता नहीं है। ऐसे सुना था कि वाल्तेयर रेल्वे स्टेशन पर दिन भर के इंतजार के बाद शाम को रेलगड़ी पर चढ़ने तक जब इसका कोई हकदार नहीं आया, तो हम इसे अपने साथ ले आए थे। किंतु भैया बताते हैं कि जब वे नानी के घर रहकर पढ़ते थे, तब पिताजी ने उन्हें यह बोर्ड खरीदकर दिया था। वह एक साधारण बोर्ड था बच्चों के लिए और वह बोर्ड उनके साथ ही हमारे घर बिलासपुर लाया गया था। उसी पर खेलकर मैंने कैरम सीखा। मेरे कैरम की इस यात्रा में लंबे समय तक मेरे बड़े भाई का बहुत अधिक साथ रहा। मेरे उस्तादों में सबसे पहले मेरे पिताजी का नाम आता है।

1966-67 के दैरान कोलकाता के गार्डेनरीछ के रेल्वे अस्पताल में फेफड़ों की तकलीफ के लिए भर्ती होना पड़ा था। उस दौरान मैं वहाँ सबसे छोटी उम्र का मरीज था । सबसे बहुत प्यार मिलता था। दिन भर यहाँ-वहाँ फुदकता रहता था। एक दिन वहाँ कहीं से कैरम आ गया। मैंने भी खेलने की इच्छा जताई। एक काकू (बंगाल में बड़े पुरुषों को काकू या दादू कहकर ही संबोधित किया जाता है) सहमत हुए किंतु बोले - मैं शर्त लगाकर ही खेलता हूँ। 

तब तक शर्तिया खेलों का मुझे ज्ञान नहीं था। उन्होंने मुझे समझाया। मेरे पास उस वक्त केवल 15 पैसे थे। वहाँ मुझे कुछ खरीदना नहीं होता था। अस्पताल से मरीजों को बाहर जाने की इजाजत भी नहीं थी। मेरी जरूरतों के लिए पिताजी ने एक अंकल को कह रखा था, जो प्रतिदिन सुबह शाम आकर मिलते थे और जरूरत का सामान दे जाते थे। इसलिए मुझे 15 पैसों की शर्त लगाने में कोई परेशानी नहीं हुई।

उन्होंने मंजूर किया कि मैं जीतूंगा तो वे चवननी दे देंगे, पर हारने पर मुझे मेरे पंद्रह पैसे उनको दे देने होंगे। उन्होंने मुझे बहुत डराया कि तुम  निल (शून्य) पर ही हार जाओगे, तुम बच्चे हो। पर मेरा आत्मविश्वास मुझे साथ दे रहा था कि मैं हारने वाला नहीं हूँ। खेल शुरु हुआ। अन्य सारे मरीज हम दोनों को घेरकर खड़े थे। खेल चला और अंततः मैं जीत गया। काकू भी मेरा खेल देखकर बहुत खुश हुए और शर्त के चार आने भी दिए । यह कैरम में मेरी पहली कमाई वाली जीत थी। उसके बाद अस्पताल के कई कर्मचारी और मरीज मेरे साथ कैरम खेलने वहाँ आने लगे।  मैं दो बार तीन-तीन महीने के लिए वहाँ भर्ती रहा। खेलते-खेलते मेरे खेल में भी निखार आता गया। अस्पताल से छुट्टी मिलते समय मेरा खेल बहुत ही सधा और सुधरा था।

196869 तक तो घर के उसी बोर्ड पर शान से खेले और तरह-तरह के शाट मारते थे। गर्मी के दिनों में दोपहर बिताने का वही एक सहारा था, हम बच्चों का। 1969 से जब रेल्वे स्कूल में दाखिला लिया , तब से रेल्वे इंस्टिट्यूट में जाकर खेलना शुरु किया।

वहाँ प्रैक्टिस बोर्ड होते थे। जो आज के मैच बोर्ड से बड़े होते थे। आउटर पाकेट ही होते थे पर आज के दो रुपए के सिक्के के आकार के। कैरम मेन (गोटियाँ) आज के एक रुपए के सिक्के से बराबर होते थे। इसलिए बल का नियंत्रित प्रयोग जरूरी था।स्ट्राइकर का साइज निर्धारित नहीं था। वैसे भी उस पाकेट में कोई स्ट्राइकर गिर ही नहीं सकता था। इससे मेरे स्ट्राइक की गति व निशाने में अत्यधिक नियंत्रण संभव हुआ।

वहाँ तरह-तरह के खिलाड़ी मिले और देख-खेल कर मैंने अपने खेल को और भी धार दिया। करीब-करीब रोजाना ही घंटा-दो-घंटा कैरम पर गुजरता था। धीरे-धीरे बड़ी कक्षा में आने पर रात भोजन के बाद मुहल्ले में ही चौपाल जमाकर कैरम खेलने लगे। गर्मी की रातों में बिस्तर भी बाहर लगाते थे और रात 1-2 बजे तक खेल चलता रहता था।

गर्मियों के दिन, जब भी मुहल्ले का कोई परिवार शहर से बाहर छुट्टी बिताने जाता था तब वे रखवाली के लिए हमें घर सौंप जाते थे।  बाहर के कमरे में हमारी चौपाल जमती थी। देर रात तक खेलकर वहीं सो जाया करते थे। यह तो एक जरिया ही बन गया था गर्मियों में कैरम को जगह-जगह ले जाकर खेलने का। 

शौक इतना बढ़ गया कि हर हारने वाली टीम से दो रुपए लगवाकर रात के किसी पहर में रेलवे स्टेशन (उस समय पास कहीं और चाय मिलती नहीं थी) से चाय-नाश्ता भी मंगवाया जाता था। किसी-किसी दिन आपस में पैसे जोड़ भी लेते थे। यदि किसी को नौ गोटियों से हार मिली हो तो उसे उसके अलग पैसे लगाने होते थे। हालांकि खेल में पैसे लगते थे किंतु कोई जीतता नहीं था। चाय नाश्ता में सभी शामिल होते थे। 

कुछ खिलाड़ी तो चाय पीकर ही सोने चले जाते थे और बाकी खेलते रहते थे। इस चौपाल के खेल में नए – नए शाट खेलने की आदत पड़ी। इसने खेल में एक नया मोड़ ला दिया। बोर्ड पर कहीं की भी गोटी मारने की महारत हासिल करने की तरफ बढ़ने लगे थे। इसी दौरान श्री चौधरी भास्कर कैरम में मेरे स्थायी साथी बने। दोनों की जोड़ी इतनी जमी कि मुहल्ले की कोई भी जोड़ी हमारा सामना करने से डरती थी। 1975 में इंजिनीयरिंग में भर्ती होने तक यह चौपाल चला। इसके बाद कैरम का सिलसिला रुक गया।

उन्हीं दिनों की बात है – एक दिन मेरे दोस्त के साथ उनके जीजाजी के घर गए थे। वहाँ कोई महोदय पहले से ही बैठे थे। दुआ सलाम होने के बाद चाय पीकर जब फुरसत मिली तो जीजाजी ने पूछा – राजू , इनके साथ कैरम खेलेगा, ये बहुत अच्छा खेलते हैं। जीजाजी को पता था कि मैं भी अच्छा कैरम खेलता हूँ। जब मैंने हामी भरी तो जीजाजी ने बताया कि ये बहुत अच्छा खेलते हैं, इसलिए सोच लेना कि हारने पर रोना धोना नहीं है। पता नहीं क्यों पर मेरा मन मानने को तैयार नहीं था कि मैं हार जाउंगा। हिम्मत पूरा साथ दे रही थी। खेल हुआ और मैं जीत गया। तब मुझे बताया गया कि हारने वाले जनाब मध्यप्रदेश के राज्यस्तर के खिलाड़ी हैं। न उस वक्त मुझे पता था कि कैरम में राज्य स्तर की प्रतियोगिताएँ भी होती हैं, न ही किसी ने इस बारे में सुझाया।

जब इंजिनीयरिंग कालेज में दाखिला हुआ तो वहाँ कुछ समय बाद ही स्पोर्ट्स मीट हुआ। मैंने भी कैरम प्रतियोगिता में भाग लिया । फाइनल तक तो पहुँच गया लेकिन फाइनल में 28-28 के स्कोर पर (तब गेम 29 पाइंट का होता था और लाल के पाँच अंक हुआ करते थे) मेरी बारी में मैंने अपनी गोटी डाल दी। मैं चहक रहा था कि मैं जीत गया, किंतु दर्शकों ने व निर्णायक ने कहा कि नहीं आपने पहले प्रतिद्वंदी के गोटी को टच किया है तो आप का ये फाउल हो गया। मेंने कहा भी कि ऐसा कोई नियम तो मैच शुरु होने के पहले बताया नहीं गया था, पर किसी के कान में जूँ तक नहीं रेंगी। उन दिनों ए आई सी एफ नहीं था इसलिए कैरम में आयोजक अपने हिसाब से नियम बना लिया करते थे। प्रतिद्वंदी की गोटी को पहले या अकेले मारना नहीं है, बिगाड़ना नहीं है। थंबिंग की स्वीकृति नहीं है, इत्यादि। इससे मुझे निराशा हो गई और मैं फाइनल हार गया। इसके बाद इंजिनीयरिंग कालेज के दौरान मैंने वहाँ कभी भी कैरम नहीं खेला। 

1980 में बल्लारपुर पेपर मिल में मिली पहली नौकरी से वहाँ के क्लब में फिर से कैरम शुरु हुआ। यहाँ मुझे स्थाई साथी श्री संजय अदलाखे जी मिले। हम दोनों की जोड़ी ने वहाँ खूब धूम मचाया। स्टाफ और ऑफिसर्स दोनों क्लबों में खिलाड़ी हमारी जोड़ी संग खेलने से कतराने लगे थे। बल्लारपुर की नौकरी में तो कैरम भरपूर खेला। वहाँ का क्लब शाम 7 बजे से रात 12 बजे तक खुलता था। इस दौरान हम (मैं और मेरा साथी संजय) कैरम पर ही होते थे। हमने ऐसी महारत हासिल कर ली थी कि मैं बोर्ड शुरु करूँ तो वह पूरा करता था या वह शुरु करे तो मैं पूरा करता था। चौथे खिलाड़ी को खेलने का मौका ही नहीं मिलता था। शनिवार को क्लब शाम 7 बजे से रविवार रात 12 बजे तक खुला रहता था । साथ ही हम दोनों  भी पूरे वक्त क्लब में ही रहते थे। एक समय ऐसा भी आया कि खाली बोर्ड पर कहीं भी रखी गोटी को पाकेट करना बाएँ हाथ का काम था। स्टाफ व ऑफिसर्स क्लब में कोई भी जोड़ी हमारे साथ खेलने के लिए चार बार सोचती थी। 

1982 में मैं पेपर मिल की नौकरी छोड़कर इंडियन ऑयल में आ गया। यहाँ साक्षात्कार में ही पूछा गया - क्या आप कैरम खेलते हो ? क्या आप मेरे संग कैरम खेलना पसंद करोगे ? मैंने अपने आवेदन में ही कैरम के प्रति रुझान के बारे में बताया था।  मैंने तुरंत हामी भरकर कैरम का इंतजाम करने को कह दिया। मैंने तो इंटरव्यू बोर्ड के मुखिया को ही ललकारा था कैरम के लिए। खैर कैरम तो नहीं आया, पर मेरा चुनाव हो गया। 

वहाँ पालियों में ड्यूटी होती थी। तब खासकर शाम के समय 7 बजे से रात 11-12 बजे तक कैरम खेलते थे। रात की पारी में यदि काम का बोझ कम हो तो यथासंभव कैरम खेलते थे। इससे कैरम के शॉट्स पर पकड़ बढ़ने लगी। अंबाला में पहली नियुक्ति पर मुझे मेरे कैरम साथी सर्व श्री आलोक अग्रवाल, किशन गुलियानी, अमरीक सिंह मिले।

एक बार ऐसे ही जोश में शर्त लग गई कि इस आखरी गोटी को कैसे मारोगे?  मैंने अपनी तरकीब बताई। लोगों को लगा कि यह असंभव है। एक ने तो दाँव लगाने की भी कहा। मैं भी जोश में आ गया और शर्त मंजूर कर ली। अब सब शांत – इंतजार कि शाट का क्या होगा, कौन जीतेगा ? मैंने बहुत सावधानी से शाट मारा और तय तरह से गोटी पाकेट हो गई। शर्त के अनुसार उन दिनों (शायद 1984-85) में मैंने केरला-कर्नाटक सुपरफास्ट एक्सप्रेस के ए. सी. द्वितीय श्रेणी में अंबाला कैंट से बेंगलोर सिटी का आने – जाने का किराया जीता था, जो शायद रु.1300 के आस पास था। इसमें अंबाला कैंट से नई दिल्ली जाने का किराया भी जुड़ा हुआ था। यह उस समय मेरे एक महीने की तनख्वाह से भी ज्यादा थी। 

नौकरी के दौरान जब दिल्ली में जब नियुक्ति मिली तो देखा वरिष्ठ लोग कैरम खेल रहे हैं। मैं खड़ा - खड़ा उन्हें खेलते देखता-घूरता रहा लेकिन उन्होंने मुझसे कभी भी मेरे खड़े रहने का कारण भी नहीं पूछा। जब इस सम्भाग से कैरम खिलाड़ी कार्पोरेट टीम में चयन में जाने की बात मालूम हुई तो मैंने भी सेलेक्शन में जाने का निर्णय लिया, पर सेलेक्शन का पता ही नहीं चला। जब खिलाड़ी खेलकर आ गए तो मैंने प्रबंधन से सवाल जवाब किए और अगली बार ऑल इंडिया इंडिया कैरम फेडेरेशन के अधिकारियों को बुलवाकर आँतरिक प्रतियोगिता करवाया और उसे जीतकर मैंने 1993 में अपने संभाग का प्रतिनिधित्व किया। 

पहले लीग राउंड था फिर नॉक आउट। लीग राउंड के पहले मैच के पहले बोर्ड में मेरे 7 फाउल हुए क्योंकि मुझे फेडरेशन के नियमों की जानकारी नहीं थी। फिर भी मैं बोर्ड 10 पाइंट से जीता। नॉक आउट के पहले राउंड में इंडिया नंबर दो से भिड़ना हुआ और मैं हारकर बाहर हो गया। यही हाल 1994 में भी हुआ। 1993 में कैरम प्रतियोगिता के टूर से मिले भत्ते से मैंने रूलबुक और कैरम का हाथीदाँत का स्ट्राइकर खरीदा। आज वह स्ट्राइकर कानूनन निषिद्ध किया गया है। 

दिल्ली में नियुक्ति के दौरान वहाँ की कालोनी के क्लब में भी मैं कैरम खेलता था। प्रतियोगिताओं में भी शामिल होता था। पहले साल तो टूर्नामेंट खेलकर फाइनल जीता। दूसरे साल फाइनल के पहले कोई भी खिलाड़ी मुझसे खेलने नहीं आया। सबने वाक ओवर दे दिया। तीसरे साल तो गजब ही हो गया। पूरे टूर्नामेंट में शुरू से फाइनल तक भी कोई मुझसे खेलने बोर्ड पर नहीं आया । अधिकारियों ने मुझे विजयी घोषित कर सर्टिफिकेट भी देना चाहा  किंतु बिना बोर्ड पर एक भी गेम खेले जीतना मुझे नहीं भाया और मैंने सर्टिफिकेट लेने से इंकार कर दिया। 

जयपुर में तबादले पर मुझे कालेनी में तीन कमरों वाला घर मिला था। उसका हाल तो कैरम क्लब ही बन गया था । दिन रात वहाँ कोई न कोई कैरम खेलते हुए मिल जाता था। सामने ही मेस था तो खिलाड़ियों  को  घर के हॉल में ही चाय मिल जाया करती थी। उनमें सर्व श्री - पी के कश्यप , डी एन त्रिपाठी , आशीष गोखले, संजीव गुप्ता और आर एन धोलकिया  प्रमुख रहे। 

उन दिनों रात-बे-रात स्टेशन और बस स्टैंड जाकर कॉफी – चाय पीना, आइसक्रीम खाकर-लेकर आना तो एक दैनिक आदत सी बन गई थी। कुछ एक बार तो ऐसा भी हुआ कि कैरम से उठकर बाहर बरामदे में खड़ा था तो देखा एक भाभी जी डोलू हाथ में लिए लौट रही हैं। मैंने जिज्ञासा वश पूछ लिया - भाभी जी इतनी रात में कहाँ से? (मेरे अंदाज में डेढ़ - दो बज रहे थे।) जवाब मिला रात! भाई साहब सुबह के साढ़े चार बज रहे हैं - दूध लेकर आ रही हूँ। तब ध्यान आया कि खेल में संलिप्त होकर समय का ध्यान ही उतर गया और सुबह 4 बजे तक खेलते ही रह गए। 

गुजरात के द्वारका जी के पास प्रतिनियुक्ति पर वहाँ मुझे एक बना बनाया क्लब मिला। सहकारिता पूर्ण समाज मिला। वहाँ मैं कर्मचारियों और बच्चों में कैरम के प्रति शौक जगाने में सफल रहा और इससे हम सब के खेल में उन्नति हुई । कुछ लोगों ने तो वहाँ कैरम सीखा भी। साल भर किसी न किसी रूप में कैरम की प्रतियोगिताएँ होती रहती थीं और सभी उसमें भाग लेने के इच्छुक रहते थे। कुछ पुराने नामचीन खिलाड़ी भी वापस खेल की सुध लेने लगे। इससे मुझे बहुत उत्साह मिला। 

कुछ समय बाद वहाँ कांडला पोर्ट ट्रस्ट के खिलाड़ी भी आने लगे। हमने उनका स्वागत किया जिससे मेरे व अन्य कैरम खिलाड़ियों को विविधता मिली। जिस से हम सब के खेल में उन्नति हुई। 

नौकरी के अंतिम पड़ाव में छत्तीसगढ़ के कोरबा में नियुक्ति हुई। मेरे लिए कोरबा जाना- पहचाना शहर था। 1974 में जब मैं बिलासपुर (छ.ग.) में पढ़ रहा था, तब मेरे भैया ने कोरबा से ही कोल इंडिया में नौकरी शुरु किया था । तब मैं करीब महीने में दो बार तो वहाँ जाया करता था। उस दौरान बालको और एन टी पी सी के प्लाँट बन रहे थे। हम उसके अंदर जाकर घूम आया करते थे।

कोरबा रिहाइश के दौरान एन टी पी सी कालोनी में ही आवास मिला और फिर उनके क्लब में प्रवेश। मेरे कैरम से वहाँ के खिलाड़ी खुश हुए और बहुत सारे पुराने खिलाड़ियों ने क्लब में आना शुरु किया। उस क्लब में कैरम के खेल का दौर फिर चल पड़ा। कुछ राष्ट्रीय स्तर खिलाड़ियों व अंपायरों से संबंध बने। वहाँ सर्व श्री - विश्वेश्वर मिश्रा, सदानंद दुबे , बी. एम. धुर्वे, प्रेमलाल और संजीव मालपुरे विशेष साथी रहे। तब से ही मैं कोरबा कैरम संघ का आजीवन सदस्य हूँ। 

कोरबा के कैरम संघ के सचिव श्री आलेक गुहा को खबर लगी । उनसे मुलाकात हुई और उन्होंने मुझे कोरबा जिला कैरम प्रतियोगिता करवाने के लिए टूर्नामेंट डायरेक्टर घोषित कर दिया। मुझे इसके लिए अवकाश प्रदान करने हेतु उन्होंने मेरे कार्यालय को भी पत्र लिखा। 

टूर्नामेंट के वक्त जबलपुर निवासी श्री सतीश श्रीवास्तव जी, जो कोरबा कैरम संघ के अध्यक्ष थे और हैं, मिलने आए और उन्होंने टूर्नामेंट की सराहना की। टूर्नामेंट सफल हुआ देखकर सचिव ने मुझे अंपायर की हैसियत से आल इँडिया कैरम फेडेरेशन कप, रायगढ़ (छ.ग.) में आमंत्रित किया। यहाँ से मेरा कैरम में अंपायरिंग का सिलसिला शुरु हो गया। इस शृंखला में मैं राष्टीय कैरम प्रतियोगिताओं (नेशनल सब जूनियर, नेशनल जूनियर, डिस्ट्रिक्ट और स्टेट के रैंकिंग, हर स्पर्धा व फेडेरेशन कप के खेलों में भी अंपायरिंग कर चुका हूँ। एक दो स्पर्धाओं में मैं चीफ रेफरी और चीफ गेस्ट भी रह चुका हूँ।  इसी दौरान मैंने हिंदी भाषियों के लिए  लास आफ कैरम का हिंदी में अनुवाद भी प्रस्तुत किया है जिसका विस्तृत उल्लेख इस पुस्तक में भी है। 

2015 अक्टोबर में मैं इंडियन आयल की नौकरी सेवाओं से निवृत्त होकर हैदराबाद में बस गया हूँ। अब भी साथियों के साथ करीब रोज घंटे – दो घंटे कैरम खेल लेता हूँ। यह मेरे दिनचर्या का एक अभिन्न अंग बन गया है।

उपर्लिखित सभी के सहयोग से ही कैरम में इतना आगे बढ़ पाया। इन सबके बिना मैं आज इस पुस्तक के बारे में सोच भी नहीं पाता। मैं अपने इन सभी आदरणीय साथियों का तहे दिल से आभार व्यक्त करता हूँ। 

हिंदी भाषा से प्रेम की वजह से मैंने अपनी हिंदी की कुछ पुस्तकें प्रकाशित की हैं। साथियों ने मुझे प्रेरित किया है कि में अपनी कैरम की जानकारी के साथ बच्चों के लिए एक पुस्तक तैयार करूँ।अब कोशिश है कि मेरा सीखा हुआ कुछ समाज के बच्चों व कैरम के नौसिखियों के लिए प्रस्तुत करूँ। इसीलिए अपनी अन्य प्रकाशनों की शृंखला में कैरम पर भी एक पुस्तक प्रकाशित करने जा रहा हूँ ।

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सोमवार, 22 मई 2017

पुस्तक प्रकाशन





पुस्तक प्रकाशन

हर रचनाकार, चाहे वह कहानीकार हो, नाटककार हो या समसामयिक विषयों पर लेख लिखने वाला हो, कवि हो या कुछ और, चाहेगा कि मेरी लिखी रचनाएं पुस्तक का रूप धारण करें. हाँ शुरुआती दौर में लगता है कि यह  किसी के लिए थोड़े ही लिखी जा रही है, कि प्रकाशित कराऊं? पर बाद बाद में लगता है मेरी रचनाएं समाज दुनियाँ पढ़े और लोग मेरे रचनाकर्म को सराहें.

व्यक्तिगत संवाद भले रोक लिए जाएं पर सामान्य रचनाएं बाहर की ओर झाँकती हैं. पहले डायरी में, फिर दोस्त-सहेलियों के बीच, फिर ब्लॉग और पत्र पत्रिकाओं की तरफ से होते – होते, अंततः पुस्तक रूप में आने का निर्णय देर सबेर हो ही जाता है.  इसमें कुछ गलत भी नहीं है. अन्यथा कई बार तो पुस्तक प्रकाशन करें न करें की दुविधा में अच्छी रचनाएं डायरियों और कापियों में रहकर ही दम तोड़ देती हैं. उन्हें पाठकों तक पहुँचने का सौभाग्य ही नहीं मिलता.

और सब काम की तरह पुस्तक प्रकाशन के बारे में भी सोचना बहुत आसान है. बाह्य दृष्टि से बहुत सरल प्रतीत होता है. पर सही में प्रकाशित करने में कई तरह के पापड़ बेलने पड़ते हैं. हालाँकि सोच समझकर प्रकाशन का निर्णय लेने में भी बहुत समय लगता है, पर यह निर्णय लेना वास्तविक प्रकाशन करवाने से बहुत सरल साबित होता है. एक बार निर्णय हो जाए, तो काम शुरू किया जा सकता है.

सबसे पहला काम होता है - निर्णय लेना कि पुस्तक किस विधा एवं विषय पर होगी. अक्सर कविता, गीत, शायरी, कहानी, नाटक लिखने वाले लिखना शुरु होने के बाद ही ऐसा निर्णय ले पाते हें. तब उन्हें निर्णय करने में तकलीफ नहीं होती कि पुस्तक किस विधा पर होगी. पर कुछ ऐसे वक्त आते हैं जहाँ लगता है कि अपना ज्ञान बाँटने के लिए पुस्तक लिखी जाए. किसी विषय पर पकड़ देखकर साथी उकसाते हैं कि आप इस पर पुस्तक क्यों नहीं लिख देते. वहाँ यह निर्णय करना दूभर हो जाता है कि किस विषय पर लिखी जाए. एक से अधिक विधा के रचनाकार दुविधा में रह जाते हैं कि पुस्तक केवल कविता की हो या कविता-कहानियों की या कुछ और.

मान लीजिए निर्णय किया कि कविता की किताब (लिखनी है) प्रकाशित करनी है.

अब रचनाएं इकट्ठे करना का काम शुरु होता है. भाषा पर प्रमुख रूप से ध्यान देनी पडती है. पुनः-पुनः पढकर भाषा सँभालनी पड़ती है कि कोई गलत बात न बन जाए या कोई बनती बात न बिगड़ जाए. फिर आता है रचनाओं को क्रमबद्ध करना यह इसलिए भी जरूरी ही कि पुस्तक में प्रवाह हो. पाठक को यथा संभव बाँध कर रखा जाए. क्रमबद्ध करने से मतलब है कि व्याकरण की पुस्तक में सर्वनाम पहले और फिर संज्ञा न हो. जीवनी में पहले जन्म हो, फिर उपनयन, फिर शादी और फिर परिवार – ऐसा क्रम.

अब सवाल उठता है कि प्रकाशन कहाँ से हो. खासतौर पर नए लेखकों के लिए प्रकाशक पाना और चुनना अपने आप में एक बहुत बड़ी समस्या है. आज कल सेल्फ पब्लिकेशन हाउस तो कुकुरमुत्तों की तरह उगे हुए हैं.  कोई भी प्रकाशक अपनी पूरी जानकारी नहीं देता. परेशान करने के पचासों बहाने लिए बैठे होते हैं. खासकर रॉयल्टी के बारे में तो विश्वास ही नहीं  करना चाहिए, उनकी बातों पर. अच्छा हो हर बात लिखित में ही की जाए.

कुछ प्रकाशकों को चुनकर, उनको आवेदन प्रस्तुत करना होता है कि मुझे आपसे कविता (विधा) की पुस्तक प्रकाशित करवानी है. तब प्रकाशक आपकी रचना के नमूने मँगवाता है और निर्णय लेता है कि वह आपकी पुस्तक प्रकाशित करने में इच्छुक है या नहीं. यदि आपकी रचनाएं सम्मति पाती हैं तो प्रकाशक आपको अपनी शर्तें बताता है. उसमें यह सब भी होता है कि प्रकाशन में वह क्या - क्या करेगा और रचनाकार को क्या - क्या करना होगा. किस तरह से कितनी रकम कब - कब जमा करनी होगी इत्यादि. अलग - अलग प्रकाशकों से उत्तर मिलने पर जो सबसे ज्यादा सहमत होने योग्य हो, उसे चुना जाता है.

कवर पृष्ठ कैसा हो. उसे सोचना, खोजना, बनाना दूसरा प्रमुख काम हो जाता है. वैसे प्रकाशक कवर डिजाईन करते हैं. पर कुछ लोग अपनी पसंद का बनाना चाहते हैं. ऐसे लोग अपने कुछ चित्र प्रस्तुत करते हैं जिन्हें प्रकाशक कवर का रूप देकर पुस्तक का नाम और रचयिता का नाम अंकित करता है.

अब आता है प्रकाशक द्वारा दिए गए पुस्तक की प्रूफ रीडिंग करना. उसे बताना कि कहाँ किस तरह की गलती है और किस तरह सुधार करना है, गलतियाँ हों सुधार सुझाए. यह काम जरा पेंचीदा होता है. कई बार सुधार करवाने पड़ते हैं.

यहाँ मैं चाहूँगा कि प्रूफ रीडिंग पर विस्तार में जानकारी के लिए पाठक मेरा लेख एक पुस्तक की प्रूफ रीडिंग पढ़ें.  



कहाँ, किस तरह, क्या सुधार करना है, इसके लिए एक तालिका बनाकर देना सर्वोत्तम होता है. तालिका में क्रमाँक, पृष्ठसंख्या, पेरा या कविता के छंद का क्रमाँक, लाइन व त्रुटिपूर्ण खंड देते हुए, बताना होता है कि सही क्या हो. इस तरह कम से कम तीन बार तो करना ही पड़ता है. बड़ी रचनाओं या विशेष विधाओं में यह ज्यादा बार भी हो सकता है.

वैयाकरणिक सुधारों के साथ इसमें alignment (दायाँ – बायाँ), गद्य में मार्जिन जस्टिफिकेशन, फाँट टाइप और साइज, रंग, पृष्ठ संख्या, रचना क्रमाँक कई तरह की बातों पर ध्यान देना पड़ता है. फॉर्मेटिंग का विशेष ध्यान देना लेखक के लिए बहुत ही हितकारी होता है.

कवर पृष्ठ तैयार होने पर इसे ISBN के लिए भेजना पड़ता है. इसमें पुस्तक को एक दस अंकों वाला या तेरह अंको वाला एक क्रमाँक दिया जाता है जिससे यह पुस्तक दुनियाँ भर में जानी जाती रहेगी.

आई एस बी एन (ISBN) के लिए आवेदन के पूर्व प्रकाशक कुल रकम के 50 % की माँग करते हैं. सर्वोत्तम है कि राशि इंटरनेट से ही स्थानाँतरित की जाए. वैसे चेक द्वारा भी भुगतान हो सकता है.  कैश जमा करने पर अब बैंक वाले बहुत ज्यादा कैश हेंडलिंग चार्ज लेने लगे हैं. इसलिए इससे परहेज करना ही उचित होगा.


अब आएँ पेपर वर्क और रॉयल्टी पर.

पुस्तक प्रकाशन के लिए लेखक को प्रकाशक के साथ एक करार करना पड़ता है . जिसमें उनकी सेवाएँ, रचनाकार की जिम्मेदारी, व्यय, किश्तों की संख्या व समय (यदि आवश्यक हो तो) और उनकी अन्य शर्तें लिखी होती है. साथ में यह सब भी होता है कि पुस्तक पर यदि रॉयल्टी है तो किस तरह उसका आकलन होगा, किस तरह उसका भुगतान होगा.

इन सबके लिए लेखक को अपनी कुछ व्यक्तिगत सूचनाएं भी देनी पड़ती हैं. अपना नाम, पता, जन्म तारीख, बैंक एकाउंट की सूचना अभिभावकों के नाम, पुस्तक प्रकाशन के लिए पावर ऑफ एटार्नी और प्रकाशक के विशिष्ट फार्म पर आवेदन. इनके साथ पेन कार्ड की कापी, दो पते के प्रूफ, आधार कार्ड, चालू बैंक खाते का (रद्द किया हुआ) चेक भी संलग्न करना पड़ता है.
खास बात है कि कोई भी प्रपत्र (Document) मूल रूप में नहीं भेजना होता है. सब स्वयं प्रमाणित फोटोकापी मात्र.

प्रूफ रीडिंग पूरी होने पर प्रकाशक बकाया आधी राशि की माँग कर लेता है. उसके बाद ही पुस्तक का प्रकाशन करता है.

इस दौरान कुछ बातें विस्तार में करनी होती हैं. प्रकाशक हमेशा अधूरी भाषा में बातें करता है. कुछ लिखित में देने से डरता है या कहें परहेज करता है. हाँ बड़े प्रकाशक हों तो यह सब झंझट नहीं रहते. उन्हें उनकी साख उन्हें पकड़ती है.

जैसे पटल पर अंकित होगा कि 100 प्रतिशत रॉयल्टी पाएं. इससे एक नया लेखक समझता है कि पुस्तक के दाम 80 रुपए हों तो लेखक को प्रति पुस्तक रु.80 रॉयल्टी में मिलेंगे. पर वास्तव में ऐसा नहीं होता. पुस्तक की कीमत से लागत निकालकर उसकी प्रतिशत रॉयल्टी में दी जाती है. किंतु लागत की बात प्रकाशक कभी नहीं करता. लेखक के करने पर वह कन्नी काटता है. अंततः प्रकाशक लेखक को लागत के बारे अवगत कराने से बचता रहता है.

मेरी पहली पुस्तक दशा और दिशा के समय ऐसा ही हुआ. पेपरबैक पर 70 प्रतिशत व ई बुक पर 85 प्रतिशत रॉयल्टी बताई गई. बार बार लिखित में माँगने पर भी लागत के बारे में कुछ भी लिखित नहीं आया. प्रकाशक का जो कर्मचारी मुझसे संपर्क में था उसने मुझे बताया कि लागत रु.60 आ रही है तो एम. आर पी रु.120 रख सकते हैं. मैंने हिसाब किया (120-60) का 70 प्रतिशत रु.42.00. यानी रु42 प्रति पुस्तक रॉयल्टी.

वैसे ही ई बुक की कीमत लगाई रु.49 जिसका 85 प्रतिशत रु.41.65 होता है. एक मोटे तौर पर विचार था कि प्रति पुस्तक करीब रु.42 मिलेंगे. इसी हिसाब से कीमत पर रजामंदी दी थी.

जब ऑनलाइन देखने के मिला तब देखा प्रति पुस्तक ईबुक के तो ठीक मिल रहे हैं किंतु पेपरबैक पर रु.22.85 दिया जा रहा है. प्रकाशक को बार बार लिखने पर भी रॉयल्टी के हिसाब नहीं मिले, न ही मिला लागत का लिखित रूप. फिर खबर आई कि लागत बढ़ गई है रु.90 हो गई इसलिए एम आर पी बढ़ानी होगी या रॉयल्टी घटानी होगी. मेरी इच्छानुसार मेल भेजा गया कि लागत बढ़ गई है इसलिए कीमत बढ़ाकर रु150 करने की अनुमति दीजिए. दिया, यह सोच कर कि अब 150 व 90 के बाच 60 रु का फर्क है तो रॉयल्टी रु.42 पर आ जाएगी. लेकिन नहीं रॉयल्टी वहीं रही रु.22.85 पर और कहा गया कि पहले ही पुस्तक की लागत करीब रु 90 थी तो रॉयल्टी रु.22.85 मिल रही थी. लागत रु30 बढ़ी तो कीमत भी     रु30 बढ़ा दी. जिससे आपकी रॉयल्टी बनी रही वरना कुछ भी नहीं मिलता आपको. इस तरह प्रकाशक ने आधी रॉयल्टी का चूना लगाया. कुल मिलाकर 250 से ऊपर प्रतियाँ बिकने पर भी लागत नहीं लौटी. सारा माखन प्रकाशक ले गया. मैंने उन्हें उपभोक्ता शिकायत मंच पर लाने की बात कही है. कभी तो होगा. सारे संप्रेषण सँभाल रखे हैं मैंने. ऐसा होता है पैसों के मामलों में प्रकाशकों का व्यवहार.

इन सब से बचने के लिए प्रकाशक से लागत व कीमत पर रॉयल्टी की जानकारी करार में ही लिखित करवा लेना जरूरी होता है. हाँ इसमें प्रकाशक को बहुत तकलीफ होती है, पर धंधा करना हो, तो मानेगा. लेखक के लिए जरूरी है कि वह किसी भी तरह प्रकाशक को लिखित में देने के लिए बाध्य करे. ई बुक में ऐसी परेशानी नहीं रहती क्योंकि उसमें की अलग लागत नहीं लगती.

एक बात जो इन सबसे परे है, वह यह कि एक शर्त ऐसी होती है जिसके अनुसार जब पुस्तक प्रकाशक के पोर्टल से बिकती है उसमें तो 100% रॉयल्टी पर इनके चेनल पार्टनर पर बिके तो 70% , मतलब अलग अलग रॉयल्टी दी जाती है. पता करने से बताया जाता है कि चेनल पार्टनरों को कमीशन देना पड़ता है.

यह सब खेल हैं. प्रकाशक को चाहिए कि चेनल पार्टनर से ऐसा करार करे कि प्रकाशक के पास कीमत पूरी आए. इसके लिए वहाँ पुस्तक ज्यादा में बिकेगी. इससे प्रकाशक को फायदा है कि ग्राहक प्रकाशक की तरफ झुकेंगे. पर प्रकाशक चेनल पार्टनरों की बिक्री में भी कमाते हैं, इसलिए वे ऐसा करना नहीं चाहते.

जायज तरीका होगा कि एक कीमत तय की जाए पुस्तक की कि कितने में बिकनी है. उस पर जो कमीशन चेनल पार्टनर को दिया जाता है उसे जोड़ें . इस तरह सब चेनल पार्टनरों के हिसाब में जो सबसे ज्यादा आता है उसे एम आर पी कहा जाए. एम आर पी पर चेनलों की कमीशन के हिसाब से उन्हें डिस्काऊंट दे दिया जाए, जिससे उतने में बिकने पर कीमत के पैसे प्रकाशक तक आएँगे. प्रकाशक के पोर्टल पर सबसे ज्यादा डिस्काऊंट होगा और पुस्तक कीमत पर ही बिकेगी. पर इतनी ईमानदारी शायद प्रकाशकों को भाती नहीं है.

यह सब बातें तय होने पर ही प्रकाशक को बकाया रकम की सुपुर्दगी देनी चाहिए. अब पुस्तक पूरी तरह प्रकाशन के लिए तैयार है. प्रकाशन पर लेखक अपने सभी जानकारों को नेट पर पुस्तक के उपलब्धि की सूचना दे सकता  है. अच्छा होगा यदि प्रकाशक लेखक को लिंक दे, जिससे लेखक अपने जानकारों को लिंक देकर पेमेंट कैसे करना है, ईबुक कैसे डाउनलोड करना है, बता सकता है.

अब समझ आया होगा हमारे साथी लेखकों को कि प्रकाशन कितनी दुविधाओं से घिरा है. पुस्तक छपकर आने से खुशी तो होती है पर जब तक छप नहीं जाती पारा सातवें आसमान पर ही होता है.
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