मेरा आठवाँ प्रकाशन / MY Seventh PUBLICATIONS

मेरा आठवाँ प्रकाशन  / MY Seventh PUBLICATIONS
मेरे प्रकाशन / MY PUBLICATIONS. दाईं तरफ के चित्रों पर क्लिक करके पुस्तक ऑर्डर कर सकते हैंं।

रविवार, 15 जून 2025

दहेज – एक समाजिक समस्या

 

दहेज एक समाजिक समस्या


        दहेज  प्रथा भारत में बहुत पुरानी है। बदलते जमाने के साथ यह प्रथा एक कुप्रथा में परिवर्तित हो गई है। जनता इससे परेशान है। अमीर और रईसजादों ने इस परंपरा को हवा दी है और आज के मुकाम तक पहुँचाया है। अमीरों के लिए तो यह कोई समस्या नहीं है क्योंकि उनके पास देने के लिए सफेद और काला दोनों तरह का भरपूर माल उपलब्ध है और गरीबों के लिए यह समस्या ही नहीं है क्योंकि उनके पास देने के लिए कुछ है भी नहीं।

             समस्या है तो सिर्फ और सिर्फ मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए। जिनके पास नहीं है कहना भी अनुचित है, पर भरमार भी नहीं है कि वर पक्ष की चाहतों को पूरा कर सकें। न ही वह गरीब है, न ही अपार संपत्ति युक्त अमीर। पर समाज की आज की संरचना के तहत वे भी अपने आप को संपन्न प्रदर्शित करना चाहते हैं और उसके लिए दहेज की मात्रा भी एक नियामक बन गई है। हमने अपने बेटी की शादी धूमधाम से की और इतना दहेज भी दिया, गाड़ी भी दिया, मकान-प्लॉट भी दिया – ऐसा कहने की मंशा तो रखते हैं। किंतु हैसियत तो इतनी है ही नहीं। समाज में प्रतिष्ठा पाने के लिए ये मध्यम वर्गीय परिवार दिखावा करने की होड़ में रहते हैं। फलस्वरूप कोशिश यह रहती है कि बेटी की शादी में जितना हो सके दिया जाए ताकि बेटी ससुराल में खुश रह सके। इसलिए दोनों पक्षों के बीच एक प्रकार का सौदा होता है, (जिसे समझौता नहीं कहा जा सकता) जहाँ हर-हमेशा वर पक्ष ही हावी होता है। बेचारा वधू पक्ष अपनी नाक निचोड़ कर बैंकों, परिवार या दोस्तों से कर्जे लेकर, जमीन जायदाद देकर या बेचकर अपनी बेटी की इच्छाओं पर खुद को समर्पित कर देता है। वधू पक्ष वरपक्ष की मांगों पर खरा उतरना चाहता है और वर पक्ष है कि अवसर को भुनाने में लगा हुआ है, कोई परहेज नहीं करता। मकान, जमीन, वाहन (मोटर सायकिल या कार ब्रांड सहित) और साथ में रकम भी – की भरपूर मांग करते हैं। बेचारा वधू पक्ष बेटी का मजबूर पिता - भाई अपने सभी तरह के बचत व जायदाद से वंचित होकर वर पक्ष को खुश करने में लग जाते हैं।

           बरसों पुराना समाज सुधारकों का दहेज प्रथा के विरुद्ध दहेज उन्मूलन अभियान केवल कानून बनकर कागजों-फाइलों में दब गया। यथार्थ में उन कानूनों की आज कोई हैसियत नहीं है। कानून फाइलों में दबा है और दहेज प्रथा अपने जोरों पर है, कुलाँचे मार रही है। 

            अभिभावकों ने लड़की को पढ़ाकर इस काबिल बनाया कि वह कल की जरूरत पर आत्मनिर्भर हो सके। किंतु  नतीजतन ज्यादा पढ़े लिखे वर चाहिए और इसके लिए ज्यादा दहेज भी चाहिए। इस बढ़े हुए दहेज के कारण वे अब विदेशी वर की तलाश करते हैं। इससे दहेज प्रथा का उन्मूलन तो क्या हुआ बल्कि उसको बढ़ावा मिल गया । कभी नारे लगे थे कि दुल्हन ही दहेज है। पर अब वह सब धरा का धरा रह गया। इस सब के बावजूद भी घर या ससुराल में कोई पढ़ी लिखी लड़की बिना आय के रहना नहीं चाहती क्योंकि उनको अपनी पढ़ाई का उद्देश्य आर्थिक स्वतंत्रता ही नजर आती है। कमाने में कोई बुराई नहीं है बशर्ते घर के काम में उसका साथ देने के लिए कोई तैयार हो या वह उससे मुक्त होकर कोई सहायक रख सके। पर समाज में ऐसा नहीं होता। स्त्री का काम तो उसका है ही, साथ में पढ़ाई की वजह से वह कमाएगी भी। उस पर दोहरा भार पड़ जाता है । स्त्री भी नौकरी छोड़ेगी नहीं और घर सँभालने और नौकरी के बोझ तले दबकर रोना रोती रहेगी।

           हाल ही में समाज में कुछ बदलाव आया है। कुछ पुरुष स्त्री के साथ रसोई में हाथ बँटा रहे हैं। कभी-कभी खाना बाहर से मँगा भी रहे हैं जो उनकी सेहत पर बुरा असर करता है। किंतु यह बात  सुविधा के परदे में उनको नजर नहीं आती।

            कुछ ऐसे वर पक्ष सामने आ रहे हैं जिनको दहेज नाम की व्यवस्था से परहेज है। वे शगुन के तौर पर एक रुपया ही लेकर विवाह कर लेते हैं। पर उनमें से कुछ वही खर्च तिलक व स्वागत में करा देते हैं । जैसे ही वधू बिना दहेज वाले वर को देखती है तो पिता से अपने शौक "डेस्टिनेशन विवाह" की मांग करने लगती है। डेस्टिनेशन वेडिंग एक नई परंपरा है, जो दिखावे का नया रूप है। अंततः पिता का खर्च तो हो ही गया, कचूमर निकल ही गया। तब बिना दहेज के विवाह में पिता को क्या सहूलियत हुई? कुछ तो बिना दहेज की शादी के बाद अपनी मांगों की गठरी खोलते हैं। पता नहीं फिर उनके लिए बिना दहेज की शादी का अर्थ क्या होता है? वस्तुतः यह तो दहेज का प्रतिरूप ही हुआ ना!

            अब तक हमने जिक्र किया वर पक्ष को कारनामों की, अब आइए वधू पक्ष की तरफ। वे बिना दहेज की शादी से तो अति प्रसन्न रहते हैं। किंतु लड़की शादी के बाद अपने रंग दिखाती है। बार-बार समस्या खड़ी करती है और पति पर अपनी माँगों का जोर आजमाती है। सास-ससुर, देवर-ननद इत्यादि के साथ नहीं रहना है, घर अलग करो। बुजुर्गों को वृद्धाश्रम भेजो – इत्यादि। पर नारी पर कभी यह दोष नहीं मढ़ा गया कि वह बुजुर्गों को वृद्धाश्रम भेजने का कारण बनी है। इकलौते वारिस की जायदाद चाहिए किंतु उनके बूढ़े मां-बाप की सेवा नहीं करनी है। वाह रे नारी समाज। चित भी अपना, पट भी अपना और अंटा.... । इधर बेटे अपनी जवानी को भुनाने के लिए बीबी का गुलाम बनकर सारी मुसीबत या कहें बदनामी अपने सर ले लेता है। पत्नी चाहती है कि पति की कमाई के पैसे-पैसे पर उसका एकाधिकार हो और पूरी रकम भुनाने का हक केवल उसके ही पास हो।

            इनमें से एक भी मांग की सही आपूर्ति न होने पर गृह-क्लेश बढ़ जाता है और यही सब अंततः विवाह विच्छेद की तरफ बढ़ता जाता है। सारा इल्जाम वर व वर पक्ष पर थोपा जाता है। सरकार ने उनकी सुविधा के लिए "498कानून" जैसे कानून भी तो नारी के बचाव में बनाए हैं। ऐसा कोई कानून पुरुष वर्ग के लिए नहीं है। शायद उस वक्त सरकार को वोट पाने का यही एक रास्ता सर्वोत्तम सूझा था।

            ऐसा नहीं है कि वर पक्ष अपनी तरफ से कोई समस्या खड़ी नहीं करता पर ज्यादातर समस्या इन दिनों इसी तरह की आ रही हैं जिनका इस लेख में उल्लेख है।

            विवाह विच्छेद के साथ ही दहेज (यदि दिया हो तो) की वापसी और वर के जायदाद (चल-अचल संपत्ति) के बँटवारे की बात आ जाती है। वधू पक्ष जायदाद के आधे-आधे बँटवारे से बाज नहीं आता और साथ में रखरखाव (Alimony) पर भी जोर देता है। यहाँ वधू पक्ष को इस तथ्य से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वर पक्ष ने बिना दहेज की शादी की थी। खर्च तो बेटी ने ही अपनी इच्छा पूर्ति के लिए करवाया था। वधू की जायदाद के बँटवारे की बात किसी को भी मंजूर नहीं होती, शायद कानून भी इसके पक्ष में नहीं होता । पर क्यों ? इसमें तर्क क्या है?  मेरा तो मेरा है और तुम्हारा हमारा? यह कौन सा न्याय हुआ ? जैसे स्त्री रखरखाव मांगती है वैसे पुरुष को रखरखाव क्यों नहीं दिया जा सकता? अब तो स्त्री पुरुष दोनों ही कमाते हैं । इसलिए या तो दोनों ही रखरखाव के हकदार हों या दोनों नहीं। केवल नारी को रखरखाव क्यों दिया जाए? जब आज का समाज स्त्री और पुरुष दोनों को समान मानता है।

            ऐसी हालातों में यह कहना अनुचित नहीं, उचित ही होगा कि दहेज उन्मूलन कानून फाइलों में दबे-दबे सड़ सा गया है। अब इस कानून का न होना ही माना जाना चाहिए।

            समाज के वर पक्ष को बचाने के लिए अब समाज सुधारकों को फिर से जागना होगा। शादी के पहले दोनों पक्षों को एक करारनामा करना अनिवार्य कर देना चाहिए कि शादी में किसी भी पक्ष से, किसी भी पक्ष द्वारा, किसी भी प्रकार की मांग नहीं होगी। वैसे ही किसी भी कारणों से विवाहोपरांत यदि विवाह विच्छेद की स्थिति आए तो वधू पक्ष द्वारा किसी तरह की मांग (चाहे वह रखरखाव की हो या चल - अचल संपत्ति के बँटवारे की हो या किसी अन्य तरह की हो) नहीं होगी। इससे विवाह विच्छेद की घटनाएँ भी कम हो जाएँगी। इसके बाद शादी समारोह से पहले इस करारनामे के साथ शादी की पंजीयन को भी अनिवार्य करना होगा। यह सुनिश्चित करना होगा कि विवाह पत्रिका में शादी के पंजीयन का जिक्र पंजीयन संख्या के साथ हो। करारनामे व पंजीयन की प्रतियाँ दोनों पक्षों के पास सुरक्षित हों।

            हाँ , इस विधि में अगर अभिभावक अपने पक्ष को कुछ स्वेच्छा से देना चाहें तो इस पर कोई रोक टोक नहीं होना चाहिए जो किसी भी तरह से दहेज के अंतर्गत नहीं आना चाहिए।

 ---

 

बुधवार, 2 अप्रैल 2025

शोभित

शोभित


मैडम,

गुड मॉर्निंग,

 

मैडम ने पीछे मुड़कर देखा तो एक 65-70 साल का बूढ़ा हाथ जोड़े खड़ा था।

 मैंने पहचाना नहीं।

मैडम के चेहरे पर शिकन देखकर उसने कहा - मैडम, मैं शोभित। आप हमें स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाती थीं।

संबलपुर के ओड़िया स्कूल में। शायद 1965-66 की बात होगी।

मैडम को फिर भी कुछ याद नहीं आया । शोभित फिर कहने लगा - मैडम संबलपुर, ओड़िया स्कूल में गीता, शारदा, रामू, नारायण - हम सब पाँचवीं में थे। आपकी शादी होने वाली थी इसलिए आपने पढ़ाना छोड़ दिया था। रेलवे लाइन के उस पार आपके मकान में फोटो भी खींचा था, सब का। अभी भी है मेरे पास।

 मैडम सहमते हुए बोली बेटा याद नहीं आ रहा है। तुम पाँचवीं की बात कर रहे हो और तुम खुद भी बूढ़े हो गए हो। कितनी पुरानी बात है। फोटो है तो भेजना, शायद कुछ याद आ जाए।

 फिर मोबाइल नंबरों का आदान-प्रदान कर वे अपनी अपनी राह चल पड़े।

 घर आकर शोभित पुराने एल्बम खोजने में लग गया। बीबी-बच्चे समझ ही नहीं पा रहे थे कि शोभित को हो क्या गया है ? काफी मशक्कत के बाद शोभित के हाथ वह एल्बम लग ही गया जिसमें मैडम और उनके घर मे सारे बच्चों की तस्वीर थी। उसने तुरंत अपने मोबाइल से दोनों तस्वीरें खींच कर मेडम को वाट्स एप पर भेज दिया । साथ में नीचे एक संदेश में बच्चों के नाम चित्र के क्रमानुसार लिख दिए।

 देर रात फुर्सत पाकर मैडम ने जब तस्वीर देखी तो उन्हें याद आ गया अपना पुराना मकान और उस तस्वीर की कहानी। रात ही उन्होंने शोभित को एक वाइस मेसेज से इसकी सूचना दी और कहा कल सुबह बात करते हैं।

 दोनों को उस सुबह का इंतजार था।

 सुबह  नाश्ते से बाद मैडम ने शोभित को फोन किया। फोटो पर अपनी राय देते हुए यादगार पलों को साझा किया। शोभित को पता चल गया कि मैडम अब उसे पहचान रहीं हैं और उन बीते दिनों को याद कर पा रही हैं।

 फिर दोनों में मिलने की ललक जागी। एक दिन समय लेकर शोभित मैडम के घर पहुँच गया। बहुत सारी बातें हुई, बीते दिनों की, पुराने टीचर्स और साथ पढ़े बच्चों को याद किया। कुछ के फोन नंबर भी लिए दिए गए। कुछ को काल करके दोनों ने बात भी किया। शोभित को अपना बचपन याद आ गया।

 अपने बचपन की शिक्षिका से मिलन पर शोभित बहुत खुश था। उसके दिमाग में यही चल रही थी कि इस बंधन को पुनः मजबूत कैसे किया जाए। तरह-तरह के विचारों के बीच कुछ दिन बाद उसे सूझा कि क्यों ना एक पुस्तक मैडम को अंकित किया जाए। यह बाजार से खरीदकर भेंट देने की बात नहीं थी।

 वक्त के साध चलते-चलते शोभित पहले पढ़ाई, फिर नौकरी पूरी करने के बाद, अपनी रचनाओं को पुस्तक रूप में प्रकाशित करने लगा था। कविता तो वह 13 वर्ष की उम्र से ही करता था, पर उससे पहले ही मैडम से बिछुड़ चुका था इसलिए मेडम को इसकी जानकारी नहीं थी।

 अब तक शोभित की कुल छः पुस्तकें छप चुकी थीं और सातवीं छपने के लिए तैयार थी। उसमें हिंदी भाषा सीखने-सिखाने के कुछ लेख थे। शोभित को लगा कि क्यों न यही पुस्तक मैं मैडम को समर्पित कर दूँ। किंतु समर्पित करना हो तो इस आशय का जिक्र तो पुस्तक की भूमिका में आनी चाहिए और इसके लिए मैडम की स्वीकृति भी चाहिए।

 कुछ दिनों बाद मैडम से फोन पर बात करते-करते उसने मैडम से पुस्तक समर्पित करने की मंशा जाहिर किया। मैडम ने बिना किसी प्रतिवाद के स्वीकृति दिया। फिर शोभित ने पुस्तक की भूमिका लिखते समय इसका उल्लेख भी किया।

 कुछ समय में पुस्तक प्रकाशित हो गई थी। अब मैडम से बात करके उन्हें समर्पित करने जाना था।

 जब शोभित ने इस बारे में मैडम से बात किया कि किस दिन किस समय उनके घर पुस्तक समर्पित करने आया जा सकता है ?

 जवाब मिला कभी भी आ सकते हो, पर पहले फोन कर लेना क्योंकि आए दिन मेरे क्लासेस और लेक्चर होते हैं। ऐसा न हो कि तुम आओ और मैं न मिलूँ। शोभित ने हामी भरी और फोन रख दिया।

 जब पुस्तक की कापियाँ शोभित को मिली, तब उसे यह भी जानकारी मिली कि गुरुपूर्णिमा नजदीक ही है। उसने गुरुपूर्णिमा के दिन मैडम के घर जाकर पुस्तक समर्पित करने का सोचा और इसीलिए मैडम के फुरसत के वक्त उन्हें फोन किया। मैडम से बात हुई। उन्होंने शोभित को सुझाया कि गुरुपूर्णिमा के दिन तुम्हारे घर के पास ही एक समारोह है गुरु पूर्णिमा के ही उपलक्ष्य में। वे चाह रही थीं कि यदि ऐतराज न हो तो शेभित उसी समारोह में आ जाए और समर्पण का काम भी वहीं कर लिया जाए । यदि नापसंद हो तो शाम को समय वह घर पर भी आ सकता है।

शोभित को यह बात अच्छी लगी। उसने सोचा समारोह में और भी लोग होंगे। उसे लगा कि आगंतुक ‍श्रोताओं को भी पुस्तक की जानकारी मिल जाएगी और पुस्तक ज्यादा लोगों तक पहुँचेगी। यह सोचकर उसने मैडम के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। मैडम ने कहा - "तो ठीक है, मैं एक दो दिन पहले तुम्हें सही जगह और समय बता दूंगी।"

दो दिन पहले मैडम ने जगह और समय की सूचना दी और कहा कि इस सम्मेलन के बाद वहीं तुम अपना समर्पण का कार्यक्रम कर लेना। इस पर सहमति हो गई। मैडम ने प्रबंधक- संचालकों से भी बात कर लिया। सही दिन शेभित बताए जगह पहुँच गया। उसने पुस्तक की 5-6 प्रतियाँ साथ ले लिया था।

कार्यक्रम शुरु हुआ तो विद्वज्जन गुरुओं के बारे में बताने लगे। कुछ ने श्रेष्ठ गुरुओं के कुछ प्रसंग भी बताया । किसी ने गुरु महिमा के गीत गाए तो किसी ने वेद अंश का पाठ किया।

इसी बीच संचालक महोदय ने शोभित का परिचय देते हुए उसे स्टेज पर आमंत्रित किया कि वह इस अवसर पर गुरु के बारे में कुछ कहे।

शोभित को पता ही नहीं था कि उसे ऐसा कोई भाषण देना है। उसे बताया भी नहीं गया था। वह इसके लिए तैयार  भी नहीं था। पर अब तो नाम भी पुकारा जा चुका था। वह मना करके माहौल बिगाड़ना भी नहीं चाहता था। उसे अभी मैडम को अपनी पुस्तक भी समर्पित करना था। किंकर्तव्यविमूढ़, मरता क्या न करता, वह स्टेज पर जा पहुँचा और गुरुओं के बारे में कुछ-कुछ बोलता गया। विशेष बात यह थी कि उसने बताया कि गुरु शब्द में गु – अंधकार के लिए है और रु प्रकाश के लिए। इसलिए गुरु का अर्थ हुआ – अज्ञानता के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश तक ले जाने वाला। साथ उसने यह भी कहा कि गुरु का अर्थ है बड़ा - किसी भी क्षेत्र में। जरूरी नहीं कि उम्र में ही बड़ा हो। एक विधा में बड़ा होने पर भी वह दूसरी विधा में छोटा हो सकता है। वैसे हर व्यक्ति, हर दूसरे से कुछ न कुछ सीख सकता है और अकसर सीखता भी है। इसलिए इस जगत में सब गुरु भी हैं और शिष्य भी। ऐसा भी होता है कि कोई किसी के लिए गुरु हो पर दूसरे का शिष्य। लेकिन प्रचलन है कि विशेष तरह से  किसी से नियमित शिक्षा पाने पर ही हम उन्हें गुरु कहते हैं। सारा माहौल तालियों की गड़गड़हट से गूंज उठा।

 जैसे ही शोभित अपनी बात पूरी करके स्टेज से हटा, आयोजकों ने सुझाया - "आप अपनी पुस्तक का विमोचन समर्पण का कार्यक्रम अभी कर लें"। समर्पण तो ठीक पर विमोचन का कोई प्रस्ताव तो था ही नहीं।

 शोभित ने सबसे पहले अपना संक्षिप्त परिचय दिया और बताया कि कब और कैसे मैडम से संपर्क हुआ, कब उनसे पढ़ा। फिर कब कैसे मिले। फिर अपनी रचनावली का संक्षिप्त परिचय कराते हुए मैडम के हाथ में एक पुस्तक दिया और झुक कर चरणस्पर्श किया।

 मैडम को पुस्तक देकर प्रणाम करने के बाद शोभित ने मंच पर विराजमान मैडम के अन्य वरिष्ठ गुरुओं को भी प्रणाम करते हुए पुस्तक कि एक - एक  प्रति समर्पित किया।

 इसके पूरे होते ही वरिष्ठतम गुरुजी खड़े होकर, शोभित द्वारा  गुरु - शिष्य परंपरा के मनस्फूर्त  निर्वाह पर अभिभूत होते हुए बोले - आज के इस नए जमाने में करीब 55 (से ऊपर के) वर्षों के अंतराल के बाद अपने गुरु को खोज निकालना और 5-6 पुस्तक की रचना करने के बाद भी बेझिझक सरेआम ऐसी सभा में निस्संकोच पादाभिवंदन एक आदरणीय गुण है। यह कहते हुए वे शोभित की तरफ झुके। शोभित असमंजस मैं पड़ गया कि यह क्या हो रहा है?

 शोभित ने देखा कि गुरुजी उसे प्रणाम करने दी दिशा में बढ़ रहे हैं। उसने गुरुजी को बोलकर - पकड़कर रोका किंतु वे तैयार ही नहीं थे। अंततः जब किसी तरह उन्हें रोककर पूछा गया कि वह यह क्या कर रहे हैं? तब उन्होंने सुसंयत मन से उत्तर दिया कि मैं शारीरिक शोभित को नहीं उनकी गुरुभक्ति, गुरु-श्रद्धा व गुरु के प्रति समर्पण भाव को प्रणाम करता हूँ।

 मंच पर आसीन सभी ने, सभी आगंतुकों और गुरु पूर्णिमा का उत्सव मनाने आए सभी गुरुभक्तों ने अनुमोदन स्वरूप करतल ध्वनि से गुरुवर का  स्वागत किया।

 तत्पश्चात गुरुवर ने शोभित को फिर से मंच पर बुलाया , बिठाया और सारे मंचासीनों को अपने पास की शोभित की पुस्तक को प्रदर्शित करने को कहकर एक परिचित को तस्वीर खींचने को कहा।

 फिर गुरुवर ने शोभित व पुस्तक के बारे में कुछ प्रशंसनीय शब्द कहे और पुस्तक विमोचन संपन्न किया। आगंतुक शोभित की तरफ बढ़ने लगे। कुछ लोगों ने पुस्तक खरीदना चाहा। शोभित के पास जितने बचे थे, वह उसने दे दिए और अन्यों से निवेदन किया कि वे या तो उसके घर से ले लें या पता भेजें तो पुस्तक डाक से भेज दी जाएगी।

 अंत में सभी ने आयोजित भोजन का आनंद लिया। सभी सभासद शोभित की भूरी प्रशंसा करते हुए अपने अपने गंतव्य को चल पडे।

 उसदिन शोभित और मैडम अति प्रसन्न थे। शोभित इसलिए कि वह अपनी पुस्तक मैडम को समर्पित कर सका, वह भी इस सभा में और मैडम इसलिए भी खुश थीं कि शोभित के आने से सभा में रौनक हो गई थी। उससे पुराने शिष्य से संबंध भी पुनः मजबूत हो रहे थे।

 

()()()()()()()()() 

बुधवार, 4 सितंबर 2024

List of my books with MRP

 


List of my Book list with MRP

 

1.   Dasha aur Disha.                   Poetry, short stories articles.                       रु. 250    

      Best seller at publisher

2.   Man Darpan, 2017                poetry                                             Rs. 175       

                                                      Till then my best poetry

3.  Hindi Pravah aur Parivesh                             रु. 250          Liked by Hindi readers

  Articles on Hindi language.

 4.   Antas Ke Moti,2019                       Stories.                                    Rs.300      

 5.    Guldasta             Articles on publication and journalism.         Rs 250

 6.   Ose ki boonden, 2021                      Poetry                                   Rs. 250          

 7.   Hindi Sujhav Aur vimarsh       Articles for learning and                               

Suitable to Hindi students teaching Hindi and teachers as well.                              

Highly appreciated by Hindi teachers and students.

8.    Bikhare Suman,2023                                      Rs. 250

Extension of firstPublication Dasha aur Disha

 9.   4M – Mini Matters                Episodes as short stories               Rs. 200          

  Matter More, 2023 Adopted by FLAME University, Pune for Industrial Relation subject for MBA (HR) final year students in session 2023-24 (In English Language

10.     4M2 – Mini Matters      Episodes as short stories               Rs. 250       

          Matter More,                   (In 2023English Language)                                         

    Part -2. 2024      Adopted by FLAME University, Pune for Industrial Relation subject for MBA (HR) final year students in session 2024 (In English Language 

 Serial. 1-8  are in Hindi and 9n-10 are in English.  

  Books in pipeline for publishing :-

 1.  Understand, Learn and Play Carrom -  For carom learners and players with guidance.

2.  Telugu translation of my book - Antas ke Moti.


बुधवार, 3 जुलाई 2024

प्रेशर कुकर

 


प्रेशर कुकर

 

आज शायद ऐसा घर ही नही होगा, जहाँ प्रेशर कुकर का प्रयोग न होता हो।

 विज्ञान के अनुसार दबाव बढ़ने से वस्तुओं के उबाल तापक्रम में कमी आती है। इसलिए प्रेशर कुकर में पानी जल्दी (कम तापमान पर) ही उबलता है और उसकी गर्मी से अनाज या सब्जी, जो भी भीतर हो पक जाता है। इसीलिए पकने में या गलने में मुश्किल लगने वाली चीजों को कुकर में पकाना फायदेमंद होता है। ज्यादातर लोग माँसाहारी भोजन के लिए कुकर जरूरी समझते हैं।

 प्राथमिक तौर पर कुकर दो ही तरह के होते हैं। एक को प्रेस्टिज टाइप और दूसरे को हॉकिन्स टाइप कहा जाता है।

हॉकिन्स तरह के कुकर अवयव बर्तन, ढक्कन, रबर गेस्केट और सीटी। 

हॉकिन्स तरह का कुकर बंद करने पर (प्रेस्टज कंपनी द्वारा बनाया हुआ)

बंद करने के बाद प्रेस्टिज तरह का कुकर।



 प्रेस्टिज टाइप का ढक्कन ऊपर बाहर की तरफ से पकड़ बनाता है और अंदर का दबाव बढ़ने से ढीले होने की तासीर रखता है। जबकि हॉकिन्स के कुकर का ढक्कन ऊपर से अंदर जाकर लगता है। इसलिए कुकर में दवाब बढ़ने पर यह और भी जोर से बंद हो जाता है। इससे भीतर का दबाव बहुत तेजी से बढ़ने लगता है। दोनों ही हालातों में दबाव बढ़ने से कुकर की ढक्कन में लगे भार (सीटी) द्वारा उसके भीतर के भाप को बाहर निकाला जाता है। यदि किसी कारण से सीटी से भाप नहीं निकल पाती है तो अंदर दबाव अनपेक्षित रूप से बढ़ जाता है। तब सीसा का सेफ्टी प्लग (वाल्व)  पिघलकर भाप को बाहर जाने का रास्ता देता है। इस तरह प्रेशर कुकर में समस्या आने पर प्राथमिक आपदा प्रबंधन भी किया गया है। प्रायमरी सेफ्टी सीटी (वेट) से और दोहरी सेफ्टी प्लग से होती है। यदि दोनों ही काम न करें तब ही हादसा होता है।

कुकर-धमाका होने पर हालात - 

तोड़ मरोड़ कर उछलकर गिरा ढक्कन कढ़ाई के नीचे पहुँच गया है. कढ़ाई की रसोई भी बिखर गई है। कुकर का बर्तन धुल चुका है। 


                                        


तुड़े - मुड़े ढक्कन की बदहाली इस तस्वीर में साफ देखी जा सकती है। यह तो नसीब की बात है कि रसोई और ढक्कन गृहिणी पर नहीं गिरे अन्यथा हादसा और भी गंभीर हो जाता।



 इन सबके बावजूद भी आए दिन प्रेशर कुकर के फटने की घटनाएँ सुनाई पड़ती हैं। सवाल यह है कि ऐसा क्यों होता है और इससे बचने के क्या उपाय हैं?

उपयोग करते वक्त  -

स्टोव पर रखने के लिए पहले कुकर में सही मात्रा में अनाज – सब्जी और पानी डालें। सही तादाद को अनुभव से या अनुभवी लोगों से ही जाना जा सकता है। कुछ प्राथमिक जानकारी कुकर के साथ दिए गए पुस्तिका में भी होती है।

कुकर सही ढंग से बंद करें और उसके बाद स्टोव जलाकर उस पर कुकर रखें।

जब तक सीटी से भाप न निकले स्टोव को  "हाई" पर रखें और भाप निकलते साथ उस पर सीटी रखकर उसे "सिम" पर कर दें।

भाप निकलने पर ही कुकर पर सीटी रखें।

पकने वाली वस्तु के अनुसार पुस्तिका में सुझाए अनुसार सीटियाँ गिनें और उसके एक - दो मिनट बाद में ही कुकर को स्टोव पर से उतार लें । स्टोव का काम न हो तो स्टोव बंद करके कुकर को उस पर रहने भी दिया जा सकता है। 

जरूरत हो तो स्टोव पर से कुकर हटाकर कुछ और पका लें।

थोड़ी देर में ठंडा होने पर (दबाव खत्म होने पर) सुरक्षित तरीके से कुकर पर से सीटी निकालें और परोसने खाने की तैयारी करें।

यदि तुरंत नहीं खाना हो तो सीटी को कुकर पर ही रहने दें जिससे पकी हुई रसोई कुछ और समय तक गरम रहेगी।

यह तो हुई पकाने के समय की विधि। इस पर तो गृहिणियाँ मुझसे बेहतर जानकारी रखती होंगी।

 अब जानिए कुकर का रखरखाव करना –

 जब उपयोग में न हो तब कुकर के रबर गेस्केट (रिंग) को गुनगुने पानी में रखें। गर्मी – ठंडी की वजह से गेस्केट फटने – टूटने (क्रेक होने) लगता है। इस कारण उसे जल्दी-जल्दी बदलना पड़ता है।

अंदर से बंद होने वाले कुकर का ढ़क्कन सही तरीके से बंद करने व खोलने की जरूरत है वरना यह बर्तन के किनारों को घिसता और खराब करता है।

गेस्केट को सही जगह सही तरीके से लगाने पर ध्यान देना जरूरी है वरना पकते समय भाप गेस्केट के पास के रास्ते से लीक (रिसने) होने लगेगी। इससे पकने में ज्यादा समय लगेगा और पानी की मात्रा भी कम पड़ सकती है जिससे रसोई जलने की संभावना रहती है।

कुकर को धोते समय खास ध्यान दें कि जहाँ गेस्केट और ढक्कन आपस में मिलते हैं वहाँ पकने वाली वस्तु चिपकी न रह जाए।

 सीटी वाली नोजल को अच्छे से फूँक कर तसल्ली करें कि उसमें कुछ फँसा तो नहीं है। यदि ऐसा है तो उसे किसी बारीक वस्तु से बाहर निकालें। आप चाहें तो पानी की धार का भी प्रयोग कर सकते हैं। 

अच्छा हो कि कुकर पर ढक्कन लगाने से पहले भी आप सीटी में एक फूँक मार कर तसल्ली कर लें। मुँह लगाने की वजह से जूठन की तकलीफ हो तो फूँकने के बाद उसे फिर अच्छे साफ पानी से धो लें।

अब आती है सीटी की बारी। सीटी में वैसे तो भाप के अलावा कुछ नहीं जाता किंतु कभी-कभी पानी की मात्रा के ज्यादा कम होने के चलते अंदर के पकवान का पतला हिस्सा (रसा) दबाव के कारण सीटी से बाहर आता है और उसके ठोस कण सीटी में जमने लगते हैं। यह सीटी पर दबाव बनाते हैं और दबाव के कारण सीटी के उठने  में अवरोध होता है। इस कारण कुकर में दबाव बढ़ जाता है। छोटे-मोटे अवरोध से कोई अंतर तो नहीं पड़ता क्योंकि एक दो मिनट में दबाव बढ़ने से सीटी अवरोध के बावजूद भी उठ जाती है और भाप बाहर निकल जाता है। यदि पकवान के कण वहाँ जमते जाएँ तो सीटी पर अवरोध बढ़ते है और वह थोड़े बहुत दबाव के बढ़ने से भी नहीं उठ पाती। ऐसे में एक तय दबाव के बनने पर पानी के भाप के अत्यधिक ताप के कारण सीसे का बना सेफ्टी प्लग (वाल्व) पिघतकर भाप को बहिर्गमन का रास्ता देता है। ऐसा होने पर खराब सेफ्टी प्लग को बदलकर एक नया प्लग लगवाना पड़ता है।

 यदि सीटी को साफ नहीं रखा गया या सेफ्टी वाल्व के आस पास भी रसोई या गंदगी जमी रही यानी कुकर की सही रख रखाव में लापरवाही बरती गई या कुकर की सीटी किसी जगह गिर कर उसके भीतर के पिन का नोक बिगड़ गया हो तो न ही सीटी बजती है, न ही सेफ्टी वाल्व काम करता है । 

इस कारण कुकर में बेइंतहा दबाव बनने लगता है। अंततः अधिक दबाव के कारण कुकर का ढक्कन अपना रूप बदलते हुए मुड़-तुड़कर जगह छोड़ देता है और ऊपर निकल जाता है। उस समय कुकर के अंदर के आत्यधिक  दबाव के कारण ढक्कन रसोई घर की छत से टकराता है और साथ ही भीतर की रसोई भी पूरे कमरे की दीवालों व छत पर फैल जाती है। सामने खड़ी गृहिणी पर भी आ सकती है। ऐसी हालातों में कुकुर का नुकसान , कमरे की सफाई झेलने से ज्यादा गृहिणी की तकलीफ ज्यादा दर्दनाक हो जाता है। गर्मी और भाप की वजह से चमड़ी जलने की संभावनाएँ भी बन जाती हैं।

 इसलिए कुकर की सीटी को बीच-बीच में साफ करना पड़ता है। भाप के साथ निकले अनाज – सब्जी के कण सीटी में चिपकते हैं और गंदा तो करते ही हैं, साथ ही साथ सीटी में फँसकर उसके उठने में भी अड़चन पैदा करते हैं। इसलिए सीटी को कुछ-कुछ दिनों में एक बार अच्छे से साफ करने की अत्यंत आवश्यकता होती है।

तरह-तरह की सीटियों के अंग 

1. (पिन भार में फँसा हुआ है)


2. सारे भाग अलग - अलग (नट अलग तरह का है।)




3. अलग तरह का कैप



4. गंदी हालत में वेट







5. पिन


    यह कोई बहुत बड़ा काम नहीं है बस ज्यादा से ज्यादा आधे घंटे का काम है। सीटी के कैप के ऊपर का नट खोलिए। यह घुमाकर खुल जाता है। फिर ऊपर से हल्की सी ठोकर देकर भीतर का पिन निकाल लीजिए जो ऊपर की तरफ चूड़ीवाला और भीतर की तरफ नुकीला होता है। ज्याद रसोई के कण जमने पर यह आराम से निकलता नहीं है। ऐसे में सीटी को कुछ देर गरम पानी में रखने से पिन सरलता से निकाली जा सकती है। यही पिन कुकर के सीटी की जान है। सीटी का सबसे भारी हिस्सा ही भार कहलाता है। इसीलिए कुछ लोग सीटी को वेट भी कहते हैं। अब सीटी के  नट, कैप, पिन और वेट को अच्छे से साबुन के पानी से धो लें। उसके बाद साफ पानी से साबुन निकलने तक धोएँ। फिर साफ करें और सुखा लें।  सूखने के बाद सीटी के भागों को उसी तरह फिट कर लें जैसे वह था यानी पिन की चूड़ियों को वेट के भीतर डालें और चूड़ियों पर कैप रखकर नट कस दें। नट भीतर से नुकीली होता है। कसते समय वह घूमने लगता है। इसे किसी पतली पेंसिल या लकड़ी के किसी डंडी से दबाकर पकड़कर आप नट को कस सकते हैं। इस तरह आपका वेट साफ हो जाता है।

सारांशतः आपको निम्न सावधानियाँ बरतनी है –

1.    उपयोग में नहीं होने पर रबर की गेस्केटों को गुनगुने पानी में रखना।

2.   रबर सही लगाना और ढक्कन ठीक से बंद करना। ढक्कन ढीला रहने से भाप रबड़ के पास से लीक करती है और पकाने की क्रिया में बाधा उत्पन्न करती है।

3.   कुकर को धोते समय और कुकर को स्टोव पर चढ़ाते समय, कुकर के ढक्कन पर सीटी की जगह को फूँक कर देखना चाहिए कि वह खुला है।

4.   सीटी को साफ करते रहना चाहिए।


 सीटी को जितना हो सके सहेजें। सीटी के पिन की नोक बिगड़े तो कुकर सही काम नहीं करता है।

बस इतनी सावधानियाँ यदि बरती गईं तो निश्चिंत रहिए कि आपका कुकर कभी फटाका नहीं बनेंगा।

 

*****

 

 


सोमवार, 24 जून 2024

प्रेम

 

    

प्रेम

 


प्रेम का पवित्रतम रूप – एक तरफा प्रेम ।

अगला प्रेम करे या न करे, इस से परे अपना प्रेम जारी रखना ही सच्चा और एक तरफा प्रेम है।

यह प्रेम वह रोमंटिक प्रेम नहीं जो आज की युवा पीढ़ी करती है। उनका मकसद अपने प्रेमपात्र को अपना जीवनसाथी बनाना होता है। उसे अपनी ओर झुकाने के लिए वे तरह-तरह के करतब करते हैं। उसे मँहगे तोहफे देते हैं। जो कपड़े, गहने और अन्य पसंदीदा वस्तुओ के रूप में हो सकता है या फिर घुमाना-फिराना, खिलाना-पिलाना और कई तरह के होते हैं जो प्रेमपात्र के पसंद के हों। प्रेमपात्र को तोहफे देने में कोई गलत बात नहीं है, बशर्ते उसका मकसद उसे बरगलाकर, बहला-फुसलाकर अपना बनाना न हो। यदि ऐसा है तो फिर इसमें स्वार्थ निहित है , यह निःस्वार्थ प्रेम तो नहीं हुआ। इसे स्वार्थी प्रेम या फिर वासना या भी कहा जा सकता है।

आज के युवा प्रेम की परिणति परिणय में मानते हैं और चाहते भी हैं।

सच्चा प्यार त्याग करता है, पाने की इच्छा नहीं रखता । वह निःस्वार्थ त्याग व समर्पण करता है। प्रेमपात्र की खुशी के लिए वह निस्वार्थ कुछ भी कर सकता है।  प्रेमपात्र की खुशी, तसल्ली, सहायता में वह अपनी निजी खुशियों को भी लुटा देता है। प्रेमपात्र की खुशी में ही वह खुशी पाता है, सुख अनुभव करता है।  उसे इस बात का गम नहीं होता कि उसका प्रेमपात्र किसी और से प्रेम करता है। पवित्र प्रेम को इस से कोई फर्क नहीं पड़ता । वह इन सबसे विचलित भी नहीं होता।

प्रेम अपनी चरम सीमा में भक्ति का रूप धारण कर लेता है। भारत रत्न श्रीमती एम एस सुब्बालक्ष्मी द्वारा प्रस्तुत आदि शंकराचार्य कृत भजन भज गोविंदम के प्रारंभ में चक्रवर्ती श्री राजगोपालाचारी ने भी यही कहा है – ज्ञान अपनी परिपक्वता पर भक्ति का रूप धारण कर लेता है, अन्यथा वह ज्ञान का सही स्वरूप नहीं है, बेमतलब है, व्यर्थ है

भक्ति निःस्वार्थ एवं बेशर्त-अपनापन, प्रेम और समर्पण का ही दूसरा नाम है। यही एक तरफा प्यार प्रेम का चरम है और एकदम पवित्र है। किसी भी तरह की चाह सम्मिलित हुई तो समझिए प्रेम दूषित हो गया।

भगवद्भक्ति में भी मन्नत माँगने की रीति उसे स्वार्थी प्रेम की परिभाषा में ला खड़ी करती है। मन्नत का मतलब तो लेन-देन की बात हो गई यानी आप मेरा काम करो मैं आपका करता  हूँ - आदान – प्रदान। इसमें भक्ति कहाँ और ईश्वर से प्रेम कहाँ ? यह तो धंधा हो गया।

दंपति बच्चे का आवाहन यह सोचकर नहीं करते कि यह बुढ़ापे में हमारा सहारा बनेगा। उसका मनस्फूर्ति से पालन-पोषण करते हैं। उसकी परवरिश में हर संभव कोशिश होती है कि वह एक अच्छा नागरिक बने। जब तक वह आत्मनिर्भर नहीं हो जाता , उसकी जिम्मेदारी का बोझ खुद उठाते हैं। तत्पश्चात यह बच्चे की मर्जी कि वह माता पिता का एहसान माने या न माने। मजबूरी न हो तो कोई भी अभिभावक अपनी संतान के आगे हाथ नहीं फैलाता। जब ऐसी मजबूरी आन पड़ती है, तब हालातों के आगे निःस्वार्थ प्रेम में स्वार्थ का आगमन होता है। इस समय प्रेम दूषित तो होता है किंतु तब तक का प्रेम निःस्वार्थ था जो किसी पूजा या साधना से कम नहीं आँका जा सकता।

प्रेम के कई रूप हैं। माँ की ममता प्रेम है। भाई-बहन का प्यार राखी प्रेम का ही धागा है। पिता-पुत्र के बीच का अपनापन प्रेम है। पति-पत्नी के बीच का रिश्ता प्यार है। मित्रता भी प्रेम का एक रूप है। ईश्वर की निष्कपट भक्ति भी प्रेम है।

मूल रूप में देखा जाए तो प्रेम तो बस प्रेम है। उसे निःस्वार्थ विशेषण की कोई आवश्यकता नहीं है।

इस घोर कलियुग में सत्य के भी रूप निर्धारित हो गए हैं। यह तो आज के कलियुग का कमाल है कि वह सत्य में भी भेद करता है - वास्तविक सत्य और काल्पनिक सत्य।  सत्य तो परम है. कहा गया है कि साँच  को आंच नहीं। जैसे मैं रोज सुबह उठकर एक शख्स को नमस्कार कहता हूँ, आज भी किया। किंतु आज रोज आने वाला जवाब नहीं आया। मैंने उसके नंबर पर फोन किया तो पता लगा कि रात हृदयाघात से उसकी मृत्यु हो गई है। अब सच तो यह है कि मेरे संदेश भेजते वक्त वह जीवित नहीं था किंतु मैंने तो संदेश यही सोचकर भेजा तथा कि वह जीवित है। इसमें कहा गया है कि अटल (वास्तविक) सत्य है कि संदेश भेजते समय वह जीवित नहीं था। इसमें काल्पनिक सत्य यह है कि मेरी कल्पना में वह जीवित था इसीलिए तो मैंने उसे संदेश भेजा । इस कलियुग मे हर जगह सापेक्षता घर कर गई है। ऐसे ही प्रेम में निःस्वार्थ प्रेम को अलग-थलग खड़ा कर दिया गया है। आज प्रेम का साधारण अर्थ रोमांस से ही है। आज माँ का बच्चे से अपनापन ममता कहलाता है – प्रेम या प्यार नहीं।

यदि प्रेम के बदले में कोई किसी भी तरह की चाह रखे तो उसे सिर्फ स्वार्थ ही कहना काफी है। उसे स्वार्थी प्रेम नहीं कह सकते क्योंकि यह शब्द युग्म बेमतलब या कहिए अर्थहीन हो जाता है।

मूल रूप से प्रेम स्वार्थी नहीं होता, निःस्वार्थ ही होता है।

वैसे देखा जाए तो दुनिया का हर रिश्ता स्वार्थ की चादर में लिपटा है क्योंकि ईश्वर ने मानव को मूलरूप से स्वार्थी ही बनाया है। माता-पिता भी बच्चों को पालते हैं तो उनसे कुछ अपेक्षा जरूर रखते हैं। मित्र भी उम्मीद से बँधे ही होते हैं कि मुसीबत में मदद मिलेगी। जहाँ रिश्ता आ गया, वहाँ अपेक्षा और उम्मीद आनी ही है। इसीलिए मैं प्रेम की सिर्फ इस व्याख्या को सही मानता हूँ कि -

"सिर्फ अहसास है ये

रूह से महसूस करो

प्यार को प्यार ही रहने दो

कोई नाम ना दो"

इन पंक्तियों से बेहतर और सरलतम व्याख्या प्रेम की, ना कोई थी और ना होगी।

इस अहसास के साथ जीने में जिस स्वर्गीय आनंद की अनुभूति होती है , उसे तो वही जानता है जो हर पल इसी अहसास के साथ जीता है। ये अहसास उसकी रूह का हिस्सा हो जाता है और ये रिश्ते रूहानी हो जाते हैं।

प्रारंभ में तो इस अहसास को जताने की आतुरता होती है कि कैसे मैं उसे समझाऊँ, दिखाऊँ, कैसे अभिव्यक्त करूँ ? जब यह भाव परिपक्व हो जाते हैं तब इस बात से कोई भी फर्क  नहीं पड़ता कि सामनेवाला भी उसे चाहता है या नहीं ।

इसी भाव में डूबकर प्रेम दीवानी मीरा गा उठती है -

जो तुम छोड़ो कान्हा, मैं नाहीं छोड़ूँ रे !

इस स्तर पर आकर प्रेम अब भक्ति में बदल चुका होता है।

कोई चाह नहीं, कोई उम्मीद नहीं, कोई लालसा नहीं।

 

*****