मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.

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शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

रिटायरमेंट




रिटायरमेंट

कुछेक दिन पहले की ही बात है. मैं कोरबा से रायपुर जा रहा था. रेल में आरक्षण कर रखा था, सो रेल में चढ़ते ही अपने बर्थ पर जाकर सो गया. कुछ देर बाद निंद्रा टूटी. पता नहीं रेल किस जगह थी, पर चल रही थी.

सामने की बर्थ पर दो तीन जवान लड़के बैठे थे और आपस में बातें कर रहे थे. उनकी बातों से लग रहा था कि वे प्रदेश के वन विभाग में कार्यरत हैं और सामान्य जीवन में काफी जागरूक हैं.

एक ने कहा...- सरकार ने फिर से रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाकर 62 कर दी है. चलो दो साल ज्यादा नौकरी करने मिलेगी...
दूसरे ने कहा – हाँ यार सरकार बढ़िया कर रही है... कुछ बुढ़ापा कट जाएगा.
तीसरे ने अपनी बात कही ... यार बच्चे तो और बेरोजगार हो जाएँगे.

इस तरह चर्चा आगे बढ़ी.

पास बैठे एक सज्जन ने कहा – ऐसी बात नहीं है... सरकार के पास पैसों की कमी है. इसलिए रिटायरमेंट के बाद देय पैसों को बचाने के लिए या कहिए पैसे न दे पाने की शर्म से बचने के लिए सरकार रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाकर चेहरा छुपा रही है.

शायद यह बात उनको जँच गई. सबने हाँ में हाँ मिलाया.

एक बीच मे ही बोल पड़ा. इसीलिए सरकार ने पहले रिटायरमेंट को 55 पर रखा था , फिर धीरे से 58 कर दिया.
फिर जब बात नहीं सँभली तो 58 से 60 कर दिया. अब 62 कर रही है.
दूसरा बोला - अभी तो केवल छत्तीसगढ़ में हुआ है. धीरे धीरे सारे देश में रिटायरमेंट 62 की हो जाएगी.

सब के सब मुँह खोले रह गए... किसी ने कहा - अरे यह तो खतरनाक है
बात आगे बढ़ी – चर्चा में विभिन्न मशविरे आते गए.

एक मुसाफिर जो अब तक चुप था और सबकी बातें बड़ी शिद्दत के साथ सुन रहा था – लंबी साँस लेकर बोल पड़ा – भाई साहब देखते जाइए... अभी तो खेल शुरु हुआ ही है... यह 62, 65 और 70 भी होगा और सरकार की यही हालत रही तो कोई आश्चर्य नहीं कि किसी दिन यह फरमान भी आए कि – जब तक चाहो नौकरी करो.. जब तक कर सको करो. काम करते रहोगो तो तनख्वाह मिलेगी. काम नहीं करोगे तो नौकरी से जाओगे...निकाले गए तो गए. किसी को रिटायर नहीं करेंगे और न ही पेंशन, ग्रेचुइटी या पी एफ कुछ देंगे.

मैं आँखें बंद किए लेटा जरूर था पर उनकी बातों में इतना आनंद आ रहा था कि नींद आ ही नहीं रही थी.

अंतिम वाकया सुनकर मुझे जोरदार हँसी आ गई और मैं उठ कर बैठ गया. मेरे साथ साथ आस पास के सभी यात्री हँस पड़े और सभी ने उस मुसाफिर के दूरदृष्टि को स्वीकार किया.

मुझे लगा कि पढ़ना लिखना ही दुनियादारी की सीख नहीं है. जीवन यापन अपने आप में एक बहुत ही बड़ा अनुभव है. साथ साथ इस बात की घबराहट भी हुई कि इस तरह सरकार यदि रिटायरमेंट बंद ही कर दे तो ???

फिर एक सांत्वना भी हुई कि अभी तो शुरुआत है जब तक रिटायरमेंट बंद होगा तब तक रिटायर नौकरी से ही नहीं .. शायद जिंदगी से भी हो जाँएँ.

लेकिन हाँ बच्चों के लिए यह विचारणीय और खेदप्रद जरूर है.

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एम.आर. अयंगर.
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