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शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

संप्रेषण और संवाद





संप्रेषण और संवाद 



आपके कानों में किसी की आवाज सुनाई देती है. शायद कोई प्रचार हो रहा है. पर भाषा आपकी जानी पहचानी नहीं है. इससे आप उसे समझ नहीं पाते. संवाद तो प्रसारित हुआ, यानी संप्रेषण हुआ, प्राप्त भी हुआ, पर संपूर्ण नहीं हुआ क्योंकि वह प्रेषिती द्वारा समझा नहीं गया. यही है भैंस के आगे बीन बजाना.

संवाद की संपूर्णता तब ही मानी जाती है जब प्रेषक की बात प्रेषिति को पूरी तरह समझ में आ जाती है. मैंने कहा आपने सुना, तो इतने से संवाद पूरा नहीं हुआ, यदि बात आपके समझ में नहीं आई.

जब किचन से आवाज आती है तो आप भागते हो कि किसी पर तेल तो नहीं पड़ गया ? क्योंकि वह कढ़ाई गिरने की आवाज थी. यदि चम्मच गिरने की आवाज होती, तो कोई हरकत नहीं करते. आवाज से आपको पता लग जाता है कि यह किस चीज की आवाज है या किसकी आवाज है. ऐसे ही किसी की चीख से आप जान जाते हो कि किसको किस हद की चोट लगी है. आवाज के जिस गुण से इस तरह की पहचान होती है उसे स्पंदन कहते हैं. स्पंदन की तीव्रता और अन्य गुणों पर ही सारा संगीत और संगीत यंत्र निर्भर हैं.

लिखित शब्दों में संप्रेषण और उसकी संवेदनाएँ कोई भी पढ़ा लिखा - पढ़ सकता है, समझ सकता है. बस उस भाषा में साक्षरता से यह बखूबी संभव है. हाँ, अनपढ़ों - निरक्षरों को परेशानी हो सकती है.

मौखिक शब्दों संग, शब्दों से परे संप्रेषित संवेदनाओं को पढ़ने समझने के लिए, अति पढ़ा लिखा साक्षर होना कोई जरूरी नहीं है. इसे पढ़ना एक कला है. इन्हें समझने के लिए एक दूसरे को समझना भी कभी - कभी जरूरी हो जाता है.

जब शब्द युग्म अपने में एक से अधिक भावनाओं या संवेदनाओं को समन्वयित कर लेता है, तब यह निश्चय करने के लिए कि कौन सी संवेदना / भावना शब्द युग्म के साथ प्रेषित है और कौन सी अवाँछित ही साथ चल पड़ी है, आपसी जानकारी बहुत ही उपयोगी होती है. अन्यथा अर्थ का अनर्थ होने की पूरी संभावनाएं उभर जाती हैं. खासकर जब दो व्यक्ति कभी औपचारिक तौर पर मिले ही न हों और उनके संवाद की नींव लिखित शब्द ही हों तो शब्दों से परे संप्रेषित संवेदनाओं को सही तौर पर समझ पाना मुश्किल तो है ही.

साँकेतिक संवाद में कभी तो चेहरे की जरूरत नहीं होती, पर ज्यादातर वाकयों में चेहरे के भाव साँकेतिक संप्रेषणों को समझने में बहुत मदद करते हैं. शरीर के अन्याँग भी साँकेतिक संवाद में सहायक होते हैं.

जैसे - जैसे परिचय पुराना होता जाता है, वैसे वैसे संवाद में शब्दों की अहमियत घटती जाती है. शब्द-संवाहित संवेदन जल्दी और सही समझ आने लगते हैं. अंगों का चलन, कथनी करनी का लहजा, चेहरे के हाव भाव, चलने की अदा यह सब बता देते हे कि मानसिकता क्या है और संवाद उसी रंग में रंग जाता है. पर इसमें की गई एक गलती, सारे संवाद को गलत अर्थ दे जाती है. इसकी संभावनाएँ भी कम नहीं होती. यह एक बहुत बड़ी कमजोरी है. जैसे कि विश्वासपात्र के साथ ही अविश्वसनीय विश्वासघात होता है, उसी प्रकार बहुत पुराना साथी, जिससे गलत समझने की आशा ही न हो, वही गलत समझे तो बात बुरी तरह बिगड़ जाती है. सँभालना बहुत मुश्किल हो जाता है.

चेहरे की चमक, या ढ़ीलापन, चढ़ी हुई त्यौरियाँ, मुस्कुराते या खिंचे होंठ, उठती गिरती निगाहें और पलकें, सुर्ख गुलाबी गाल और होंठ, लाल खड़े कान, नाक और तो और भाल पर पड़ी लकीरें - सिलवटें न जाने क्या क्या कह जाती हैं. आँखों में आँखे डालकर बात करने से बात की विश्वसनीयता और बढ़ जाती है. ऐसा कहा जाता है कि आँखों में आँखें डालकर झूठ बोला नहीं डजा सकता. लिखावट को देखकर भी व्यक्तित्व का काफी बखान कर लेते हैं. पर यह विज्ञान अभी पूरी तरह परिपक्व हुआ नहीं लगता. फिर भी 80-95 % तक सही बताने वाले दिख जाते हैं.

मौखिक संवाद में वक्तव्य का लहजा और लिखित में विराम चिह्नों की उपयोगिता पर सारा दारोमदार होता है. वह वक्तव्य मतलब ही बदल देता है.  नीचे लिखे अंग्रेजी वाक्य में देखिए.

A woman without her man is incomplete.

अब पढ़िए.

A woman, without her man, is incomplete.
यहाँ नारी की अपूर्णता की बात हो रही है.

A woman without her, man is incomplete.
यहाँ पुरुष के अपूर्णता की बात हो रही है.

A woman without her man, is incomplete.
यहाँ फिर नारी की अपूर्णता की बात हो रही है.

अंतर दोनों - तीनों में मात्र अर्धविराम की जगह का है. मौखिक में भी अल्पविराम के काऱण उच्चारण में फर्क आ जाएगा. हिंदी में ऐसा ही एक वाकया बहुत चलन में है.

जाने दो मत पकड़ो.

अब पढ़िए -

जाने दो, म
त पकड़ो. 
जाने दो मत, पकड़ो.

ऐसे ही –

रुको मत, चलो.
रुको, मत चलो.

लिखने में अल्पविराम दिखता है और उच्चारण में विराम का पता चलता है. गलत उच्चारण मतलब में हेरफेर कर सकते है . इससे संवाद पूरी तरह भ्रष्ट हो जाता है.

अल्पविराम से उच्चारण में भी बदलाव होता है और तो और मायने भी बदल जाते हैं.

उच्चारण की गलतियों से फर्क पड़ने वाले अन्य कुछ

तुम सलामत रहो.
तुम साला मत रहो.

भले ही अंजाने में हो, पर मतलब तो बदला और सुनने वाला क्या समझे कि सही तौर पर क्या कहा गया है.

एक और :

मेरे एक बंगभाषी दोस्त बस में चढ़ने की आशा करने वाले यात्रियों से अक्सर कहा करते थे –

बस जायगा है पर जाएगा नहीं.
(यात्री 
समंजस में पड़ जाते थे)

आशय  : बंगाली में जगह को जायगा कहते हैं
वे कहना चाहते हैं कि बस में जगह तो है, पर जहाँ आप जाना चाह रहे हैं वहाँ यह बस नहीं जाएगी. यह उनके भाषायी जन्य उच्चारण की देन है पर संवाद तो भ्रष्ट हुआ और संप्रेषण अपूर्ण.

एक और मजेदार किस्सा संवाद पर...

संप्रेषण की एक कार्यशाला में प्रशिक्षक ने प्रशिक्षुओं को लाइन में खड़ाकर एक छोर पर खड़े प्रशिक्षु से एक वाक्य कहा –

उसने उसकी बीवी को मारा.

फिर पूरे प्रशिक्षणार्थियों के मुखातिब होकर कहा कि आप यही वाक्य अगले को बताएं.

शर्त यह है कि आपसे पहले वाले या वालों के अनुसार वाक्य का जो अर्थ निकलता है, आप उससे अलग अर्थ निकालकर वाक्य कहेंगे. इस
लिए आप जोर से कहिए ताकि सब सुन सकें.

सबने अलग अलग लहजे में वाक्य का उच्चारण किया.

कुछ खास जो थे –

उसने, उसकी बीवी को मारा.
उसने उसकी बीवी, को मारा.
उसने उसकी बीवी को, मारा.
उसने? उसकी बीवी को मारा ?

ऐसे ही आश्चर्य चिह्न व प्रश्नार्थक चिह्नों के साथ अलग अलग विराम चिह्न अलग अलग स्थान पर लगाते हुए तरह तरह से वाक्य कहे. हाँ कुछ दोहराए भी गए.

जब बात घूमकर प्रशिक्षक तक लौटी तब तक तो उसी वाक्य के कई मतलब निकल चुके थे जो संवाद में लहजे व विरामचिह्नों की उपयोगिता को विस्तार देते थे.

अब प्रशिक्षु सारे यह सोच रहे थे कि प्रशिक्षक उन सब लहजों का विश्लेषण करेंगे और उन पर सभा में चर्चा होगी. पर हुआ कुछ और. सबका ध्यानाकर्षण करते प्रशिक्षक ने कहा आप सबने बहुत ही अच्छी तरह से वाक्य को अलग अलग अर्थों में दोहराया है. पर एक विधा फिर भी अछूती रह गई. फिर वे सर से इशारा करते हुए बोले –

(एक की तरफ इशारा) उसने, (दूसरे की तरफ इशारा) उसकी बीवी को मारा.

सारी कार्यशाला शाँतता पर आ गई. किसी ने इस सांकेतिकता की ओर ध्यान ही नहीं दिया था.

तो ऐसा है संप्रेषण और संवाद. इसमें बहुत सी बारीकियाँ होती हैं. लोग इन्हें नजरंदाज करते हैं और बात को गलत समझ लिया जाता है.

जैसे अलग अलग भाषा में संवाद की लिपि अलग अलग होती है वैसे ही अलग उम्र में भी अलग शब्द प्रयोग में आते हैं. कुछ समूहों के संवाद तो दूसरों को समझ में भी न आएँ. आज के युवों के एस एम एस की भाषा देखिए, उनके लिए एक एक अक्षर लिखना दूभर होता है वे Gr8 लिखते है Great के लिए. For you के लिए 4U लिखते हैं. ये तो दो उदाहरण हुए ऐसे हजारों - लाखों मिलेंगे.

छोटे बच्चे सही उच्चारण नहीं कर पाते सो अलग, पर वे शब्द भी अपने ही प्रयोग करते हैं. मुमु पानी के लिए और मंमं खाने के लिए... हर घर के अपने शब्द हैं. बच्चों की तोतली बोली की बात सभी जानते हैं. उस पर और चर्चा की जरूरत महसूस नहीं होती.

अब आते हैं शब्द रहित संप्रेषण की तरफ. दो दोस्त साथ पढ़ रहे हैं, एक ही टेबल पर.

एक उठ जाता है और भीतर जाकर तैयार होकर आता है. दूसरे से कहता है मैं पिक्चर की टिकट लेने जा रहा हूँ – चलना है. दूसरा सुनता तो है पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देता मतलब मौन. इसका अर्थ पहला क्या समझे ? संभावनाएं -

1. दूसरे ने सुना नहीं होगा.
2. सुना है पर उसे पिक्चर जाने का शौक नहीं है.

पर पहला अक्सर यही मतलब लेकर चलता है कि इतने पास से तो बताया, सुना तो होगा ही वह जाना नहीं चाहता. पर हो सकता है कि पढ़ाई में तल्लीन उसने बात पर ध्यान ही न दिया हो. यहाँ मौन असहमति हुई.

दूसरे किस्से में मानिए पहला दोस्त कहता है कि मैं पिक्चर की टिकट लेने जा रहा हूँ, तुम्हारे लिए भी ला रहा हूँ. फिर भी जवाब नहीं आता तो पहला यही समझेगा ना कि उसे कोई ऐतराज नहीं है. यहाँ मौन सहमति हुई.

इस तरह मौन दोनों अर्थ दे सकता है. हालातों और वक्तव्यों पर यह निर्भर करता है.

शब्द रहित संप्रेषणों पर थोड़ा और –

कुछ महीनों का बच्चा माँ के साथ सो रहा है. माँ का हाथ बच्चे पर होता है. जैसे ही माँ का हाथ किसी भी कारण से बच्चे पर से हट जाता है, बच्चा जाग जाता है और रोने लगता है. माँ फिर अपना हाथ बच्चे पर रख देती है, बस बच्चा चुप, वापस नींद में. यह भी एक प्रकार का संप्रेषण ही है, जो स्पर्श से हो रहा है. हालाँकि इसमें मनुष्य का किया कराया कुछ नहीं है. सब परवरदिगार उस मालिक की मेहरबानियाँ हैं. पर है तो संप्रेषण ही न.

ऐसा ही कुछ होता है जिसका कारण मुझे तो पता नहीं, पर शायद किसी को पता हो, जब लगता है / महसूस होता है / आभास होता है कि फलाँ के साथ कुछ ठीक नहीं है या वह किसी मुसीबत में है. फोन लगाते हैं तो पता चलता है कि उसका एक्सीडेंट हो गया, बीमार है या कुछ - पर तकलीफ है. इसे टेलीपेथी कहते हैं. यह कैसे होता है पता नहीं, पर हाँ खबर तो है कि ऐसा होता है. अनुभव भी किया है.

मुझे ऐसे एक शख्स के बारे में पता है कि वह भोर सुबह उठकर पत्नी को जगाते और कहते मुझे स्वप्न आया है, पिताजी का तबीयत नासाज है मैं अभी स्टेशन जा रहा हूँ. जो भी साधन मिले गाँव जाकर मिल आऊँगा. एक नहीं कई बार ऐसा हुआ है और हर बार उनकी बात में सत्यता पाई गई. मैंने इस अनुभवी व्यक्ति के मुँह से ही इसे कई बार सुना है.

बहुत से ऐसे संप्रेषण होते हैं जिसमें शब्दों की आवश्यकता नहीं होती. चेहरे के हावभाव बहुत कुछ बता देते हैं. इसी लिए चेहरे को मन का आईना कहा गया है.

स्वभाव में तनिक फर्क भी मन की बात कह देता है. रोज दफ्तर से लौटकर पत्नी बच्चों की खबर लेने वाला पति किसी दिन धम्म से सोफे पर बैठकर अपने से टाई - जूते खोलने लगे, तो पत्नी को शक तो होता है कि आज कुछ तो ठीक नहीं है. वह पूछने लगती है क्या हुआ ?

दफ्तर से एक महीने की छुट्टी के लिए आप दरख्वास्त देते हो. बॉस बुलाकर कारण पूछता है. आप कहते हो बहन की शादी है मैं भाईयों में सबसे बड़ा हूँ. पिताजी बूढ़े हो चुके हैं सारी जिम्मेदारी मुझ पर ही है इसलिए एक महीने की छुट्टी जरूरी है. उधर मेनेजमेंट की तरफ से बॉस चाहता है कि आप कम से कम छुट्टी लें या न ही लें. आपको समझाता है. ठीक है जी आप बड़े बेटे हो, इसका मतलब नहीं कि सारा बोझ आपके कंधों पर ही हो. छोटों से कहो कि पहले चले जाएं, जरूरत पर आपसे बात करते रहें. वैसे जरूरी हो तो एक बार दो दिन के लिए हो आओ. हाँ शादी में सप्ताह - दस दिन के लिए हो आना. आपको लगा कि बॉस दस दिन की कह रहा है. महीने की छुट्टी तो मना ही कर देगा. चलो बीस दिन में मना लेते हैं. आप कहते हैं सर हफ्ते दस दिन में बात कैसे सँभलेगी ? कम से कम बीस दिन तो जरूरी हैं. बॉस कहता है देखो काम ज्यादा है, प्रोजेक्ट लाँच सर पर है पंद्रह दिनों से ज्यादा छुट्टी नहीं मिल सकती . अब जाओ अपना काम करो. आप मन मसोस कर पंद्रह दिन की आह भरते हुए लौट जाते हो. शाम को घर पर खबर देते हो कि पापा पंद्रह दिन से ज्यादा छुट्टी नहीं मिल पाएगी काम बहुत है . प्रोजेक्ट सर पर है, वगैरह. 

अब जरा सोचिए इसमें क्या हुआ. पहली बार यदि ऐसा हो रहा है इसका मतलब यह कि आपके बॉस को सूचना मिल गई कि इसकी छुट्टी सीधे 50% काटी जा सकती है. उसे समझ आ जाता है कि कितने दबाव में इसे डिगाया जा सकता है. ऐसे ही और बातें हैं जो आपके क्रियाकलापों से संप्रेषित हो जाती हैं.

साराँशतः यह कहा जा रहा है कि आपके प्रत्येक क्रिया से कुछ न कुछ संवाद संप्रेषण होता है, जो आप जान नहीं पाते पर पढ़ने वाले पढ़कर उसका जायज - नाजायज उपयोग कर लेते हैं.

इस तरह इस लेख में संप्रेषण के विभिन्न विधियों की बात की गई. जाने अन्जाने होने वाले संप्रेषणों की बात की गई. मौन का अलग - अलग अर्थ समझा. विभिन्न क्रियाओं से होने वाले संप्रेषणों को जाना और विराम चिह्नों के प्रयोग से पड़ने वाले अंतर को समझा.

साथ ही साथ भाषायी फर्क के कारण उच्चारण के फर्क से संप्रेषण में पड़ने वाली बाधाओं पर गौर किया. इस तरह अन्य कई कारण व संप्रेषण पर प्रभाव होंगे जिनका यहाँ जिक्र नहीं है. 

इस लेख में गद्य रूपी संप्रेषण या संवाद पर ही ध्यान दिया गया है. काव्यालंकृत कविता, शायरी व गजल जैसी विधाओं की चर्चा नहीं हुई है.
………………

शनिवार, 15 अक्टूबर 2016

अनुवाद

अनुवाद

अनुवाद का शाब्दिक अर्थ किसी कही हुई बात को (उसी तरह) पुनः कहा जाना – को अनुवाद माना जा सकता है. उसी तरह - के बहुत मतलब निकाले जा सकते हैं. पहला हूबहू..कहना... यह नकल करना कहा जाता है. दूसरा तथ्य को रखते हुए उसे अन्य शब्दों में कहना.. इसे कुछ लोग टिप्पणी भी कहते हैं.. इसे विस्तारण भी कहा जा सकता है. शब्दानुवाद.. जिसमें केवल शब्दों के समानार्थी लगाकर कहा जाता है जिससे कि लोगों को बेहतर समझ आए. किंतु भावों को सँभाला न जाए तो अर्थ का अनर्थ भी हो सकता है. इसके बाद है अर्थानुवाद – कथ्य के अर्थों को सँभालते हुए, उसे स्पष्ट करते हुए, अपने शब्दों में प्रस्तुत करना.. और अंत में आता है - भावानुवाद – जिसमें अनुवाद की हर विधा को रखते हुए भी कथ्य के भाव को सँजोया जाता है.

ऊपर के संवाद में कही भी भाषा का पुट नहीं आया. साधारणतः अनुवाद में भाषान्तर निहित होता है. सामान्यतः एक भाषा से दूसरी भाषा में तर्जुमा (परिमार्जन) को ही अनुवाद माना जाता है. बाकी सब टीका टिप्पणियाँ मानी जा सकती हैं. अब भाषा में परिवर्तन लाते हुए उपरोक्त विधाओं पर ध्यान दें तो अलग - अलग प्रसंग सामने आएँगे. ये ही अनुवाद के प्रकार हैं.

इन सब की चर्चा से समझ में आ ही जीना चाहिए कि अनुवाद कोई साधारण काम नहीं है. दो एक पत्रों का अनुवाद या किसी कथा विशेष का अनुवाद करना और बात है और किसी उपन्यास, कहानीकार का संकलन और काव्य खंड का अनुवाद और बात है. भाव की समझ व परख होने के कारण रचनाकार खुद ही अपनी रचना का सर्वोत्तम अनुवादक हो सकता है, बशर्ते उसे अनुवाद करने के लिए नई भाषा का ज्ञान हो. दोनों भाषाओं का ज्ञान होने पर वह खुद ही सर्वेत्तम व सफल अनुवादक साबित हो सकता है.

अनुवाद के लिए प्रथमतः मूल भाषा व नई भाषा (जिसमें अनुवाद करना है) दोनों में अच्छी पकड़ जरूरी है – जिससे अनुवाद के उपराँत भी कथ्य या वक्तव्य का गूढ़ार्थ बना रहे. उदाहरणतः -

“I am well”  का अनुवाद
मैं कुआँ हूँ”    ... सर्वथा अनुचित है...
यह जानने के लिए कि well  के दोनों अर्थों में कौन सा यहां पर चुनना है – अनुवादक को पता होना अनिवार्य है कि  --

1.     Well  अंग्रेजी शब्द के दो अर्थ हैं –
2.     जिनके दो हिंदी रूपांतर भी हैं.
3.     इनमें से किस अर्थ का प्रयोग करना है वह कथ्य के वातावरण पर निर्भर करेगा. इस लिए भाषा के वाक्याँशों की समझ जरूरी है.
4.     यहाँ तो हमने कह दिया कि मैं कुआँ हूँ अनुवाद सर्वथा अनुचित है किंतु यदि यही वाक्याँश कुएं की आत्मकथा में लिखा हो तो ???  
5.     मैं कुआँ हूँ” – लिखना ही उचित होगा.

इसी कारण अनुवादकों को दोनों भाषाओं में पकड़ चाहिए. जितनी महारत हासिल होगी, उतना ही सफल व श्रेष्ठ अनुवादक हो सकेगा.

यह तो बात हुई एक वाक्याँश का अनुवाद करने की. अब सोचिए एक कथानक, कथा या काव्य के अनुवाद की और उसमें जगह - जगह पर समान अर्थों व भावों की पकड़ रखने वाले शब्दों का समावेश के बारे में. समानान्त कविता में समानान्त वाले शब्द खोजने होंगे. इसलिए अनुवादक को उन दोनों भाषाओं में शब्द सामर्थ्य भी रखना जरूरी होगा.

भाव प्रधान लेख व कविताओं में शब्द सामर्थ्य की और ज्यादा जरूरत होती है  . वहाँ अन्य के अलावा भाव  का भी ध्यान रखना पड़ता है. कुल मिलाकर अनुवाद एक असाधारण कला है, जिसमें कई बंधनों में रहते हुए भी भाषांतरण करना होता है. शब्दों के हाव – भाव बने रहने चाहिए, कथ्य का अर्थ परिवर्तत नहीं होना चाहिए. समानान्त कविता हो तो वह भी सुचारू होनी चाहिए और इन सबके बावजूद पाठक वर्ग को ध्यान में रखकर भाषा के उन शब्दों का चयन जरूरी होता है कि उस वर्ग को समझ में आए.

इन्हीं कारणों से अनुवादक को साहित्य में एक विशेष स्थान दिया गया है. अनुवादक के सहारे ही पुस्तकों का भाषाँतरण होता है. एक भाषा के पाठक दूसरी भाषा के रचनाकारों की रचनाओं को पढ़ पाते हैं. हाँ अनुवादक की क्षमता स्वरूप रचनाकार के पुस्तक की गुणवत्ता बनती है और नए पाठक उसी अनुसार पुस्तक को आँकते हैं, विश्लेषण करते हैं. पुस्तक व मूल लेखक की साख अन्य भाषा के पाठकों में अनुवादक की वजह से ही बनती या बिगड़ती है. अनुवादक चाहे तो अपनी करतूतों से मूल लेखक की मिट्टी-पलीद कर सकता है.. हाँ उसे और अनुवाद का काम नहीं मिल पाने की संभावना बन तो जाती है.

इन सब कारणों के मद्देनजर कई विश्वविद्यालयों ने अनुवाद के पाठ्यक्रम शुरु किए हैं. जिसमें मूलतः अनुवाद किस तरह होना चाहिए,
उइसमें किस किस पर ध्यान देना आवश्यक होता है व वह कैसे किया जा सकता है - के बारे में सिखाया जाता है. विधा बताई जाती है किंतु उसमें विद्वत्ता तो खुद अनुवादक को ही प्राप्त करनी पड़ सकती है. जैसे हिंदी पुस्तक का अँग्रेजी में अनुवाद के लिए - हिंदी व अंग्रेजी में पकड़ की आवश्यकता है – यह तो अनुवाद के पाठ्यक्रम में बताया जा सकता है किंतु हिंदी - अंग्रेजी तो अनुवादक को ही सीखना होगा ना.

इसलिए - एक ही पाठ्यक्रम पूरा करने पर भी अलग अलग अनुवादक के अनुवाद अलग अलग ही होंगे. कोई जरूरी नहीं है कि सारे अनुवाद को जनता पसंद करे. कुछ अनुवाद बहुत ही प्रचलित होते हैं किंतु कुछ तो चल भी नहीं पाते. किंतु सत्य यह भी है कि बिना अनुवादक के भाषाँतर पुस्तकों को अन्येतर भाषा के पाठकों तक पहुँचाना भी संभव नहीं होगा. इसलिए अच्छे अनुवादक साहित्य व समाज की जरूरत हैं - मात्र अच्छे, अन्यथा साहित्य की गरिमा ही मिटती चली जाएगी. इसी कारण यदि भाषाओँ पर पकड़ है तो मूल रचनातकारों को ही प्रथमरीत्या अपनी पुस्तक – रचना का अनुवाद करना चाहिए जिससे रचना का भाव पूरी तरह बना रहता है, जो उसकी जान होती है. कहा भी यही जाता है कि मूल रचनाकार से अच्छा अनुवादक हो ही नहीं सकता यदि उसे दोनों भाषाओं की जानकारी है.

अनुवाद को विभिन्न तरह से बाँटा गया है. कुछ की मूल चर्चा हम ऊपर कर चुके हैं. कुछ इस तरह हैं..-

1.     गद्यानुवाद
2.     पद्यानुवाद.

साधारणतः गद्य का अनुवाद गद्य में व पद्य का अनुवाद पद्य में किया जाता है. लेकिन कुछ ऐसे उदाहरण मिलते हैं जिसमें पद्यों का अनुवाद गद्य में किया जाता है. यह पाठकों की सहायता के लिए भी किया जाता है. ज्यादातर संस्कृत के काव्यग्रंथो का हिंदी व अन्य भाषाओं में अनुवाद गद्य रूप में ही ज्यादा हुआ है अपेक्षाकृत काव्य में. इसका विलोम यानी गद्य का अनुवाद पद्य में करीब नहीं ही होता है. यह जटिल भी है. शायद निर्दिष्ट पाठकों की समझ के अनुसार ऐसा किया जाता है.

इसके अलावा तात्पर्य के अनुसार भी वर्गीकरण होता है...

1.     शब्दानुवाद –

औरंगजेब का अनुवाद जैसे किया गया – AndColourPocket.
ख्यातिनाम कवि श्री सुरेंद्र शर्मा कहते हैं – अंग्रेजी में अनुवाद करो—
एक कुँवारी लड़की नीचे खड़ी है और स्वयं जवाब बताते हैं – MisUnderStanding.

एक और वाकए में वे कहते हैँ , अंग्रजी में अनुवाद करो..
यह काम होगा नहीं.. यदि होगा तो होता रहेगा होता रहोगा होता रहेगा...
जवाब भी वे खुद देते हैं – 
This work will not be done… if done, done, done danadan, danadan.

इस तरह के अनुवाद व्यंग के लिए तो बहुत सुंदर हैं किंतु साहित्यिक दृष्टि से अनुचित लगते हैं.

2.     अर्थानुवाद -  

यह गंदा है. 
का अनुवाद अंग्रेजी में लिखा जा सकता है कि

This is dirty.
This is nasty.
This is clumsy.
This is untidy.  

शायद और भी कई शब्द होंगे.

3       भावानुवाद - अर्थ के अनुसार ऊपर के सभी अर्थ सही हो सकते हैं. किंतु कथ्य व कथानक के अनुसार कौन सा वाक्याँश उसके अनुरूप बैठता है यह तो देखने सोचने वाली बात है. जब तक पूरी कथ्य की जानकारी नहीं होगी इसके बारे में निर्णय लेना सही नहीं होगा. वैसे ही --

The point rests here.
का हिंदी अनुवाद –

बिंदु यहाँ विश्राम करता है

की त़ुलना में –

बिंदु /  विषय यहाँ ठहरता / स्थिर होता है

ज्यादा उचित प्रतीत होता है.

इन सबके अलावा कई जगहों में समानान्त वाले समभाव शब्दों के चयन के लिए आवश्यक शब्द सामर्थ्य के धनी अनुवादक ही सफल हो पाते हैं. किसी रचनाकार की मूल भाषा-एतर प्रकाशनों पर साख, अनुवादक की श्रेष्ठता व सफलता पर ही पूर्णतः निर्भर करती है. रचनाएं अन्येतर भाषाओं के पाठकों तक पहुँचाने का श्रेय भी अनुवादकों को जाता है. इसीलिए कई साहित्यिक संस्थानों में अनुवादक नियुक्त किए जाते हैं और अच्छे रचनाकारों को भी अपनी रचना के अनुवाद के लिए सशक्त अनुवादकों की जरूरत होती है. अनुवादित प्रकाशनों व सस्करणों में उनकी य़श प्राप्ति व धन प्राप्ति के लिए काफी हद तक अनुवादक जिम्मेदार होता है.

सरकारी महकमें में अनुवादक तो मजबूरी में नियुक्त होते हैं उनका मुख्य काम तो परियोजना संबंधी कागजातों का अनुवाद और परिपत्रों के अनुवाद तक ही सीमित रह जाता है.

अच्छे अनुवादकों के लिए विश्वविद्यालय, प्रमाणित अनुवादक तैयार करते हैं, जो एक निर्धारितत पाठ्यक्रमानुसार तैयार किए जाते हैं.

साराँशतः अनुवादक की श्रेष्ठता व सफलता के लिए उसे दोनों भाषाओं का परिपूर्ण ज्ञान होना चाहिए. शब्द सामर्थ्य दोनों भाषाओं में जरूरी है और सबसे जरूरी हो कि वह दोनों भाषाओं में कथ्य के गूढ़ को पकड़ – समझ सके व अपने शब्द सामर्थ्य के चलते दूसरी भाषा में उसका पुनर्प्रतिपादन कर सके.

अब इन सब चर्चित विषयों से समझ तो आ ही गया होगा कि अनुवादक साहित्यिक संसार का एक विशेष अंग है. जिसकी मेहरबानी से ही विभिन्न  भाषा के साहित्य का आदान - प्रदान संभव हो पाता है.  मेरे विचार में अच्छे साहित्यकारों को तो अनुवादकों का आभारी - ऋणी होना चाहिए कि उनकी रचनाएं इन्हीं के कारण प्राँत, प्रदेश, देश, द्वीप व भाषा लाँघ कर सारे विश्व में पहुँच जाती है. रचना विश्व व्यापी बन जाती है.

अनुवाद, अनुवादक, रचनाकार, साहित्यकार, भाषा, भाष्याँतर, गूढ़ार्थ, शब्दानुवाद, भावानुवाद, गद्यानुवाद, पद्यानुवाद, तर्जुमा, परिमार्जन.