मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.

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शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

दूरदृष्टि

दूरदृष्टि

पिताजी सरकारी नौकरी से रिटायर हो चुके थे. छोटा भाई कोई पाँच - सात साल पहले ही सरकारी नौकरी में लगा था.  अब तक पिताजी, छोटी बहन की शादी के लिए रिटायरमेंट के बाद भी उसके साथ ही रहते थे, जो उनके सेवा निवृत्ति के स्थान पर ही नौकरी भी करती थी. भाई की उम्र हो चली थी पर वह कि शादी के फेरों में पड़ने से भाग रहा था.

नीलेश को सूझी कि अब परिवार वाला हो गया हूँ, तो कोई स्थिर ठिकाना कर ही लिया जाए. उसने पहले तो पत्नी रीता से चर्चा की फिर सोचा, एक बार भाई से भी बात कर लेता हूँ. घर तो आज नहीं तो कल उसे भी बनाना ही पड़ेगा. क्यों न साथ में एक ही जगह एक बड़ा घर बना लिया जाए. दोनों रिटायरमेंट के बाद भी साथ ही रहेंगे. नौकरी के दौरान भी दोनों अपने - अपने मौकों पर जाकर घर को देख कर आ सकते हैं. सुरक्षित भी रहेगा. इसी आशय के साथ नीलेश ने राकेश को फोन लगाया और अपने मन की बात कह दी.

भैया से ऐसी बात सुनकर राकेश बहुत खुश हुआ. भैया हमेशा ही उसे अपने साथ ही लगा कर रखते थे. कभी महसूस ही नहीं होने दिया कि दोनों के शरीर में अलग-अलग दिल व मन हैं. हमेशा राकेश की सुख सुविधा का पूरा ध्यान रखते थे. अब सोचना क्या था... राकेश तुरंत ही भैया की राय से सहमत हो गया. अब बात आई पैसों की और निर्णय की कि किस जगह मकान बनाया जाए.

दोनों के मन में एक ही बात आई. पिताजी रिटायर्ड हैं, उनको तो कही न कहीं रहना है दोनों में से एक के पास या फिर कहीं मकान खरीद कर या किराए पर. क्यों न उनकी सलाह ले ली जाए, ताकि उनकी इच्छानुसार जो भी जगह वह पसंद करेंगे, मकान वहीं बना लिया जाए. जब तक दोनों नौकरियों पर हैं तब तक तो माँ - पिताजी निश्चिंत ही वहाँ रह सकते हैं. रही बाद की बात, तब भी वे जिस भाग में चाहें रह लें. उनका कहा किसने टालना है या कौन उनकी मर्जी के खिलाफ जाएगा.

पैसों की बात कुछ ऐसे हुई कि दोनों को अपनी - अपनी कंपनियों से कर्ज मिल जाएगा. किसको कितना मिलेगा जान लिया जाए और बची लागत अापस में बाँट लिया जाए. जगह के साथ साथ पैसों के जुगाड़ की भी बात आगे बढ़ाई जाए, ताकि स्थान का निर्णय होते ही जगह तलाशकर जल्द से जल्द मकान बनाने का काम शुरु कर दिया जाए.

अगली बार जब दोनों भाई, पिताजी के पास घर आए तो एक मकसद यह भी लेकर आए कि इस बार बैठकर पिताजी से चर्चा कर ली जाए कि वे कहाँ स्थिर होना चाहते हैं ताकि स्थान का निर्णय होते ही, मकान बनवाने के बारे मे अन्य पहलुओं पर ध्यान दिया जा सके. 

समय पाकर बात छेड़ी गई कि पिताजी की मंशा जानी जा सके. उन्हें बताया गया कि हमारा इरादा है कि आप जहाँ कहीं भी स्थिर होना चाहते हैं वहीं हम घर बना लें ताकि आप भी सुखी – खुशी वहाँ रहें और रिटायरमेंट के बाद जहाँ भी स्थिर होना होगा, उसके बारे में बाद में सोचा जा सकता है. आशा थी कि पिताजी अपनी राय देंगे और कहेंगे सोच लो, यदि तुम्हें संभव लगता है तो ऐसा कर लो. पर नहीं, - ऐसा आभास हुआ कि पिताजी को इसका अंदेशा था और वे जवाब के साथ तैयार थे. जब उनसे पूछा गया कि पिताजी आप किस जगह स्थिर होना चाहते हैं ?  तो वे तुरंत जवाब में बोले – आप लोग कहाँ मकान बनाना चाहते हो. इधर तो इसका निर्णय हो चुका था कि जहाँ पिताजी स्थिर होना चाहेंगे मकान वहीं बनाया जाएगा – और यही बात उनसे कह दी गई. अब पिताजी गंभीर हो गए. बोले बेटा – मैं बहुत ही खुश हूँ कि तुम लोगों ने मेरे स्थिरता को ध्यान में रखकर निर्णय लिया है. लेकिन मैं कहीं भी स्थिर होना नहीं चाहता. मैं चाहता हूँ कि इस तरह के किसी भी बंधन में न पड़ूँ और मुक्त पंछी की तरह कहीं भी जाने - रहने के लिए मुक्त रहूँ. हाँ इतना जरूर है कि जब मैं उस जगह जाऊगा, जहाँ तुम्हारे मकान होंगे, तुमसे संपर्क जरूर करूंगा, ताकि यदि संभव हो और मकान खाली हो, तो मैं वहाँ रह सकूँ. यदि मकान खाली न हो तो और जगहों की तरह किराए को मकान में रह लेंगे. इसमे न मुझे और न ही तुम्हारी माँ को कोई आपत्ति है.

बात इतने पर ही नहीं रुकी. पिताजी ने आगे भी कहा... इसमें एक बात और भी है कि तुम्हारे घर में रहने या मेरी स्थिरता के लिए मेरी इच्छानुसार घर बनाने पर मुझे उस घर से बँधा रहना पड़ेगा और एक चौकीदार की तरह जिम्मेदारी मुझ पर आ जाएगी. इसलिए भी मैं उस मकान से बँधने में असमर्थ तो हूँ, ही साथ में मानसिक तौर पर भी तैयार नहीं हूँ.

पिताजी की तरफ से बात साफ हो गई. अब भाईयों के बीच का निर्णय था. रीतेश के पास उसके ससुराल में एक बहुत बड़ा प्लॉट था. शायद वह उसकी पत्नी के नाम था. उसने राकेश से बात छेड़ी कि मकान उसी प्लॉट पर बना लिया जाए. राकेश को इसमें कोई आपत्ति नहीं थी. यह तो केवल अभी एक घर बना लेने की बात थी ताकि रिटायरमेंट के वक्त कीमतों से जूझना ना पड़े. केवल बस यही जानना था कि उस प्लॉट पर उसकी कंपनी कर्ज देती है या नहीं. फैसला यही हुआ कि पता कर लिया जाए कि इस पर राकेश को कर्ज मिल जाएगा, तो प्लॉट के खरीदने के पैसे बच जाएंगे. दोनों में सहमति हो गई.

राकेश अपनी कंपनी के वित्त व कार्मिक विभाग के चक्कर लगाता रहा कि – इसे कैसे हल किया जाए. अंततः निर्णय - निष्कर्ष यही निकला कि कर्ज तो मिल जाएगा, बशर्ते कि उस प्लॉट में राकेश की भी भागीदारी हो. राकेश ने यही बात नीलेश को बताई. उसने कहा – ठीक है... तुम्हारी भाभी से बात कर, दो – एक दिन में बताऊंगा. उसके बाद इस विषय पर दोनों में कोई चर्चा ही नहीं हुई.

दोनों के रिशते तो आज भी बहुत ही मधुर हैं. भैया - भाभी राकेश को अपने बेटे सा ही समझते और बरतते हैं किंतु वह प्लॉट और मकान उनके संवादों में कभी नहीं आता.

उन दिनों जब पिताजी ने कहा था कि मुझे तुम्हारे मकान के चौकीदार के रूप में बँधना मंजूर नहीं है तो बात दोनों के दिलों में चुभ गई होगी. वैसे ही जब भाभी से पूछकर बताने की बात जब नीलेश ने राकेश से कहा तो बात राकेश को दुखी कर गई होगी... लेकिन बदलते समाज के नजरिए से देखा जाए तो आज लगता है कि पिताजी और नीलेश कितने दूरदृष्टि रखते थे कि समय से पहले ही असमंजताओं को भाँप लिया और भविष्य के पचड़े में पड़ने से आपने को और अपनों को बचा लिया.

दिनाँक 18022015 - http://www.rachanakar.org/2015/02/blog-post_63.html



एम आर अयंगर.
ब्लॉग – laxmirangam.blogspot.in
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जिला कोरबा (छ.ग.)
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