मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.

मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल  मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.
मन दर्पण

सोमवार, 9 नवंबर 2015

सफर में सफर

सफर में सफर

इस बीच एक बार भुवनेश्वर जाना तय हुआ. चाँपा स्टेशन से एलटीटी – भुवनेश्वर एक्सप्रेस में एसी ।। की टिकट मिली. रात सवा नौ बजे छूटती है – चाँपा से. मैं पौने नौ बजे चाँपा स्येशन पहुँच गया. गाड़ी करीब 2120 बजे आई. बहुत लंबी थी और एसी के बोगी आखिरी में लगे थे. बी 4-3-2-1 और फिर एसी ।।. गाड़ी केवल दो मिनट रुकती थी चाँपा में. बोगी तक जाते - जाते तक ही गाड़ी रुक चुकी थी. बोगी के पहले दरवाजे पर कोई नहीं था. वह अंदर से बंद था. दूसरे दरवाजे पर गया तो देखा लोग सामान धरकर दरवाजे के साथ मजे में बैठे हैं और किसी को दरवाजा खोलने की सुध भी नहीं हो रही है. जब ज्यादा खड़काया तो इशारे से कहा – सामान है नहीं खुल सकता. मैं परेशान और तनावग्रस्त हो गया.

अंततः हार कर पास की बोगी में चढ़ गया कि भीतर ही भीतर निकल जाएंगे. पर हाय री किस्मत – वह जनरल बोगी निकला. बीच का रास्ता बंद था. मेरे चढ़ते ही गाड़ी चल पड़ी.

मैं सोच में पड़ गया कि अब क्या किया जाए. अगला स्टॉप एक घंटे के बाद रायगढ़ था और वहाँ भी गाड़ी दो मिनट ही रुकनी थी. समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए. एक विचार यह भी आ रहा था कि यदि रायगढ़ में दरवाजा नहीं खुल सका, तो आगे सफर ही न किया जाए और किसी अगली लौटती ट्रेन से वापस हो लिया जाए. पर कोशिश तो करनी ही थी.

सोचते - सोचते विचार आया कि आज कल रेलवे ने कई नए नंबर निकाले हैं यात्रियों की सुविधा के लिए. क्यों न उन्हें आजमाया जाए. साथ ही याद आया - टी वी में दिखाया जाने वाला वह विज्ञापन - जिसमें एक लड़की खिड़की के पास बैठी है और कुछ लोग चढ़कर उन्हीं बर्थों पर बैठ जाते हैं. गाड़ी चलने पर शराब की बोतल खोलकर सेवन करने लगते हैं. तभी एक और महिला बोगी मे चढ़ते ही यह देखती हैं और आभास करती है कि लड़की सहमी - सहमी सी बैठी है. वह तुरंत बोगी के अंत में जाकर, वहां के विज्ञापनों में देखकर एक नंबर डायल करती है और थोड़ी ही देर में पुलिस आकर उन शराबखोरों को दबोच लेती है. साथ ही एक संदेश भी देती है. इसके साथ ही मैंने बोगी की दीवारों पर नजर फेरा. वहां ऐसा कोई भी विज्ञापन नहीं था. मुझे लगा कि ऐसे विज्ञापन तो जनरल  बोगी में ज्यादा होने चाहिए. फिर सोचा टिकट पर बहुत कुछ लिखा होता है शायद इस बारे में भी कुछ लिखा होगा. किंतु हाय मेरी तकदीर – मेरे पास टिकट का मोबाईल मेसेज था. परेशानियाँ तो बढ़ती ही जा रही थीं.

थोड़ी देर में खयाल आया कि वापसी की टिकट तो कागजी है शायद उस पर कुछ हो. गाड़ी की मद्धिम रोशनी में बड़ी मुश्किल से टिकट पढ़ पाया. उसमें कुछ नंबर दिए थे. एक - एक कर के मैंने सारे नंबरों (139 व 138 भी उसमें थे) पर फोन लगाया. बहुत कोशिश पर लगा तो किंतु किसी नें उठाया ही नहीं, अंत में आखरी में लिखा नंबर 182 लगाया, जो यात्रियों के साथ आई असामान्य परिस्थितियों के निवारण के लिए था. मेरा अहोभाग्य किसी ने फोन उठाकर अपना परिचय दिया. मैं दिमाग को ठंडा रखकर उसे हालात से अवगत कराया. उसने तो पहले मेरा नाम पता पूछा. फिर गाड़ी संख्या व नाम पूछा.  फिर मेरे टिकट के बारे में जानकारी ली. मैंने अपनी परेशानी बताई कि एक घंटे बाद गाड़ी रायगढ़ में दो मिनट के लिए रुकेगी और यदि बोगी का दरवाजा नहीं खुला तो मुझे रात भर एसी ।। के टिकट के साथ जनरल बोगी में सफर करना पड़ जाएगा. उनने आश्वासन दिया कि मैं परेशान न होऊँ और वह रेलवे पुलिस फोर्स (आरपी एफ) और कमर्शियल विभागों से बात करके इसका कोई रास्ता निकालेंगे. मुझे थोड़ी बहुत साँत्वना तो हुई लेकिन पहली बार से हालातों में फँसने की वजह से कोई निश्चित भरोसा नहीं हो रहा था कि काम होगा या नहीं. समय तो गुजारना ही था.

एक घंटे के बाद ज्यों ही गाड़ी रायगढ़ में रुकी, मैं अपना ब्रीफकेस व पानी की बोतल के साथ उतरा. बगल के एसी ।। बोगी का दरवाजा खुला और टीटीई नीचे उतरते हुए मुझे देखकर पूछ पड़े ए - 1 – 10 ? मेरी हाँ सुनते ही वे कह पड़े – सर आपका बिस्तर लगवा दिया है, आप आराम कर लें. मैंने भीतर जाते - जाते ही कहा, भई पैसेंजर के जॉईन करने के लिए दरवाजे खुलवा भी नहीं सकते. मैं भीतर जाकर अपने बर्थ पर चढ़ गया. शायद अन्य यात्रियों को मेरे समय पर न आने की खबर नहीं थी. हो सकता है कि टी टी ई ने बर्थ इसीलिए किसी दूसरे को नहीं दिया कि फोन पर हाजिर व्यक्ति ने कहीं कोई खबर कर दी थी. मैं तो मन ही मन उनका शुक्रिया अदा कर रहा था. सुबह 7 बजे भुवनेश्वर में उतरना था.

सुबह अटेंडेंट आया और बिस्तर समेटते हुए चाय - पानी माँगने लगा. पहले तो मैं निश्चिंत था कि वह कम से कम मुझसे नहीं माँगेगा क्योंकि उसे रात की मेरी तकलीफों का पता होगा. लेकिन उसने दूसरी बार मेरी ओर मुखातिब होकर माँगा. अब बात साफ थी कि उसे मुझसे कुछ उम्मीद थी.  मेरा गुस्सा फिर उभरने लगा. मैंने उससे पूछा किस बात के लिए चाय - पानी भई – पेसेंजर के लिए दरवाजे भी खोलते नहीं हो. इस ट्रेन में एसी फर्स्ट क्लास तो है नहीं एसी ।। के लिए आपका यह रवैया है फिर औरों के साथ क्या होता होगा. वह बोल पड़ा सर वो तो टीटीई साहब कहीं चले गए थे. वह जानता नहीं था कि मेरे परिवार की तीन पीढ़ियाँ रेल्वे में काम कर रही हैं. आज भी मेरे सगे रेल्वे में हैं. उससे मैंने पूछा – टीटीई के पास तो तीन चार एसी बोगी होंगी टिकट चेक करने के लिए – मुझे रोककर उसने बोला - इसी लिए तो वे कहीं और रह गए थे. मैं आगे बढ़ा – लेकिन तुम एटेंडेंट लोगों के पास तो एक ही बोगी होती है – तुम दरवाजे पर क्यों नहीं थे. आप लोगों के पास पेसेंजर चार्ट भी होता है. यह तो सरासर अपनी ड्यूटी से भागना है. उसकी तसल्ली नहीं हुई – कहा मैंने ही आपका बिस्तर लगाया था. मुझे लगा कि चाय पानी के लिए वह मुझे अपने किए का एहसान जता रहा है. मैं रुक नहीं पाया बोला आपने बिस्तर इसलिए लगाया है कि मैं कहीं अपनी नाराजगी आप पर न दर्शाऊं. गलती तो आप लोगों ने की है और उस पर सेक्यूरिटी को फोन करने पर आपने दरवाजा खोला रायगढ़ में. वह सहम गया – क्या आपने सेक्यूरिटी को फोन कर दिया. सर हमारे तो 2000 रुपए कट जाएंगे. मैने फिर कहा ठीक ही तो है. जिस ड्यूटी की आपको तनख्वाह मिलती है वही जब नहीं करेंगे तो किस लिए तनख्वाह. केवल दो हजार ही तो कटेंगे (मैं जानता था कि रु.2000 तो नहीं हो सकता है कि रुपए200 कट जाएं.  कम से कम अगली बार ऐसा नहीं करोगे.

यह तो फिर भी सँभल गया कि मैं चल फिर रहा था. यदि मेरी पीठ और कमर का दर्द उभरा हुआ होता तो और मुश्किल हो जाती. यदि कोई मुझसे भी बुजुर्ग होता या कोई महिला बच्चों के साथ होती तो उनकी तो हालत खराब ही हो गई होती. बात का बतंगड़ बन चुका होता. और इधर मेरी की गई कोशिशों के बाद ही सही, नंबर लग गया और उधर से जनाब ने सही सहायता की. अन्यथा मैं भी रायगढ़ प्रतीक्षालय से ही लौट गया होता.

मैं रेलवे की दी गई नई सुविधा की सराहना करते - करते - करते भुवनेश्वर पहुँच गया. जहाँ मेरा पुराना साथी प्लेटफार्म पर ही इंतजार कर रहा था. उससे मिलने की खुशी में मैं रात के हिंदी सफर में मिले, अंग्रेजी सफर के एहसासको भूल चुका था.
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