मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.

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शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

सच हुए सपने तेरे ... झूम रे ओ मन मेरे...



सच हुए सपने तेरे ... झूम रे ओ मन मेरे...

आखिरकार केजरीवाल का सपना साकार हुआ. सरकार भार से मुक्त हुए. बिना किसी तैयारी के सरकार बनाना पड़ा. न कोई अनुभव न कोई जानकारी.. एकदम नौसिखिए. एक झटके में सारी पोल खुल गई. कलई निकल गई. लेकिन ठीकरा फोड़ने के लिए सर तो मिल ही गया. उधर विपक्ष चाहेगी कि जिम्मेदारी आप पर आए. पक्ष और विपक्ष दोंनों चाहेंगे कि यह मुद्दा लोकसभा चुनाव के लिए भुनाया जा सके. देखना है भैंस कौन ले जाएगा.


दिल्ली विधान सभा की 70 सीटों में से 28 पर जीत – एक अप्रत्याशित जीत ही थी. जैसा खुद केजरीवाल ने कहा उन्हें ही 12-14 से ज्यादी सीटों की उम्मीद नहीं थी. पर जनता ने छप्पर फाड़ कर दिए. बहुत दिया देने वाले ने तुझको , आँचल ही न समाए तो क्या कीजे.

इतने सीट जीतने पर केजरीवाल घबराए कि  सरकार न बनानी पड़ जाए. सो अपनी सोची समझी चाल के अनुसार – टिक गए कि – जनता ने हमें सरकार बनाने के लिए जनमत नहीं दिया है. उधर आप की बदकिस्मती से भाजपा को भी सरकार बनाने का जनमत नहीं था. यदि होता तो भाजपा सरकार बना लेती और आप विपक्ष में बैठकर सरकार के हथकंडे सीख लेती ताकि अगली बार मौका मिलने पर सरकार सही ढंग से चलाई जा सके. लेकिन ऐसा हो नहीं सका – उप राज्यपाल ने भाजपा के नाकामयाबी के बाद आप को दूसरी बड़ी पार्टी होने के कारण सरकार बनाने का न्यौता दे डाला.

अब आप सरकार बनाने की चाल मे फंसने लगी. आप भी इससे बचने के लिए नए नए हथकंडे अपनाने लगी. बहुत समय तक तो कहती रही जनमत नहीं है. कांग्रेस ने पासा फेंका - निशर्त समर्थन का.. आप टिक गई  कि न हमने समर्थन देना है न लेना है. जब मीडिया ने दबाव बनाया तब फिर चिट्ठी बाजी की गई - मुद्दे भी ऐसे ही बनाए गए थे कि कांग्रेस समर्थन से बिदके. – भरसक कोशिशों के बाद जब थक हार गई - तो लौट कर जनता के पास गई - यह सोचकर कि जितनी सभाएँ उतनी बातें होंगी और उसी में से सरकार न बनाने का रास्ता निकाल लिया जाएगा.

लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ. सारी जन सभाओँ में सरकार बनाने की ही बात की गई. जनता को कहाँ पता था कि सरकार बनाने से आप पर कैसी मुसीबतें आनी है. और इधर आप को अपना आत्माभिमान भी तो बचाना था कैसे कह देती कि हमें सरकार चलाना नहीं आता. सरकार बनाने की सोच भी नहीं आई थी. इसलिए तैयारियाँ भी नहीं की.

अब केजरीवाल हर तरफ से फँस गए और मजबूरी में सरकार बनानी पड़ी. अब वे चाहते थे कि किसी बहाने सरकार गिर पड़े और इसका खामियाजा कांग्रेस या भाजपा को भुगतना पड़े. इसीलिए हर मौके पर कहते रहे मुझे सरकार गिरने का गम नहीं होगा – सी एम की कुर्सी जाने का गम नहीं – पर सही बात कभी नहीं कहा कि सरकार गिरने से मुझे खुशी होगी. क्योंकि सरकार चलाने में तो उनके पसीने छूट रहे थे. उनके उल्टी - सीधी हरकतों के पीछे भी यही मंशा थी कि कांग्रेस बौखला जाए और खामियाजा विपक्ष को भुगतना पड़े. उधर विपक्ष तो आप से ज्यादा अनुभवी है. कैसे आप के जाल में फँस जाती. धीरे धीरे आप अपने तेवर तीखे करती गई कि किसी मोड़ पर विपक्ष गलती करे और समर्थन वापस ले ले.


इसीलिए हर मौके पर केजरी कहते रहे... सरकार गिर जाए तो गिर जाए. जाए .. कोई फर्क नहीं पड़ता. वे तो हर कदम पर चाहते थे कि सरकार गिर जाए ... पर कांग्रेस थी कि गिराती ही नहीं थी. डेढ़ शताब्दी का अनुभव रखने वाली कांग्रेस क्या आप और केजरीवाल को ऐसे ही जाने देती ???

अब लग रहा है कि आप के विधायकों एवं मंत्रियों की बदजुबानी भी इसी इसी प्लानिंग का एक भाग थी – जिससे भड़क कर शायद कांग्रेस के समर्थन की वापसी की उम्मीद की जा रही थी. जो फेल कर दी गई.

इस बीच अपनी साख बचाने या कहें बनाने के लिए पानी की समस्या हल वाला वादा पूरा करने की कोशिश की गई... आधी अधूरी ही सही पर कुछ समय निकल गया. फिर बात आई कुछ नए मुद्दों की - भारती और राखी जी ने बैटिंग सँभाल ली. इसमें अच्छा खासा समय बर्बाद हुआ. ख्वाहिश भी शायद यही थी. लेकिन बकरे की अम्मा  आखिर कब तक खैर मनाती.


पहले पानी का वादा निभाने के लिए कोशिश की गई – आधा अधूरा काम हुआ. पर फिर भी सरकार बच गई. फिर बिजली के दरों की बात आई. वादा पूरा करने के लिए सबसिड़ी दी गई. कंपनियों ने ऐतराज जताया तो लाईसेंस रद्द करने की बात की गई. कांग्रेस भड़की नहीं. बात आगे बढ़ी कांग्रेस के नेताओं पर आरोप शुरु हुए . एफ आई आऱ किया गया. तब जाकर कांग्रेस पर असर हुआ. लेकिन कांग्रेस ने भी समर्थन वापस न लेने की ठान ली थी.

इन सबकी जानकारी केजरीवाल को थी लेकिन आत्माभिमान बीच आ रहा था. पहला शायद सपने में भी सोचा न था कि इतनी सीटें मिल जाएँगी. उस पर दूसरा कि कोई दल समर्थन देगा.   फिर तीसरा कि जनता भी कह देगी कि सरकार बना लो.

सही तो यह होता कि अपने निर्धारित कार्यक्रमानुसार स्थिर रहते – कि समर्थन न लेंगे न देंगे.. तो सरकार बनाने की नौबत ही नहीं आती और न हीं पोल खुलती. या फिर अपनी कमजोरी मानकर कह देते कि सरकार बनाने की हमारी तैयारी नहीं है. राजकाज के मामले में गलतियाँ हो जाएंगी... लेकिन नहीं आत्माभिमान ऐसा होने नहीं देता ... फँस गए न बच्चू... मजबूरी में सरकार बनाई – कामकाज का तरीका पता नहीं – किसके क्या अधिकार व जिम्मेदारियाँ पता नहीं तो ऐसे में सरकार चलाना तो मुशकिल था.


शायद विपक्ष को  पता था कि सरकार चलाने मे आप में क्या कमियाँ हैं और सरकार कैसे गिराई जा सकती है. इसी चाल की तहत कांग्रेस ने भद्दा मजाक कर स्पीकर को अधिकार हीन कर दिया. उधर और तीखा होते हुए आप भी आगे बढ़कर जन लोकपाल पारित करने की कोशिश करने लगी. संवैधानिक तरीकों से अभिज्ञ होते हुए शायद गलत तरीके अपना गई. उपराज्यपाल का समर्थन नहीं मिला..

संवैधानिक तरीका गलत हो या सही - जब तक संविधान में सुधार नहीं कर लिया जाता – अपनाना ही पड़ेगा. गलत को सही करने के बाद ही सही तरीका अपनाया जा सकता था. पर आप ने संविधान को ताक पर रखकर बिल पास कराना चाहा. कांग्रेस व भाजपा को मौका मिल गया और आप की कमी को उजागर करने के लिए एक प्रस्ताव पास कर स्पीकर को अधिकारों से वंचित कर दिया. उधर लोकसभा में तेवर देखते हुए विपक्ष ने विधानसभा में भी हंगामा किया. दोहरे मार से अब आप बौखलाई और.... केजरीवाल को सरकार से बचने का मौका मिल गया. उसने पद से इस्तीफा दिया. अब दौर चलेगा कि विपक्ष का समर्थन न मिलने के कारण जनलोकपाल पारित नहीं हो सका, सो और भी प्रस्ताव पारित नहीं हो पाएंगे – ऐसी सरकार चलाने से क्या फायदा.

ठीकरा फोड़ने के लिए सर तो मिल ही गया. उधर विपक्ष चाहेगी कि जिम्मेदारी आप पर आए. पक्ष और विपक्ष दोंनों चाहेंगे कि यह मुद्दा लोकसभा चुनाव के लिए भुनाया जा सके. देखना है कौन भैंस ले जाएगा.


लक्ष्मारंगम.


केजरीवाल, kejariwal
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