मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.

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मंगलवार, 15 मार्च 2011

मुर्दा नाचा

मुर्दा नाचा
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कल के उन फिल्म के दौर को,
याद करने से दुख होता है कि
हम आज कहाँ हैं ?

समाज का वह दर्पण जिसे
फिल्मी साहित्य के नाम से जानते हैं,
आज बाजारु हो गई है,
जिज्ञासा को परत दर परत ,
नोंच-नोंच कर आवरण रहित कर दिया है,

अर्धनग्नता की कामुता को,
नग्नता ने अश्लील बना दिया है।
हीरो व विलेन में अन्तर उतना ही बचा है,
जितना हीरोन व कैबरे डाँसर में रह गया है।

गानों के वे वर्ण, छंद राग व वे चित्रण,
अब नहीं मिलते,
जिसमें विता का आनंद था,
साहित्य का भी मान था,
राग की सलिलता थी,
और चित्रण न भावों को
आपस में बाँधने वाला माध्यम।
इससे हर तरह से आनंदमय
वातावरण बन जाता था।

सभी पारिवारिक सदस्यों के साथ
फिल्म देखने का,
एक अनूठा आनंद था,

अब या तो प्रेमी प्रेमिका,
या फिर पति पत्नी ही फिल्म को ,
साथ बैठ कर देख सकते हैं,
कॉलेज से भाग कर जाने वाले
छोरे छोरियों की छोड़ो,
दलों का मजा लेने वाले,
दलदल में भी खुश रहते हैं.

और कोई पारिवारिक सदस्य गर
साथ साथ फिल्म देखें तो-
क्या होगा ..
शायद भगवान भी
जानना नहीं चाहेगा।

गीत के बोल बातूनी,
छंद-लय की कहा सुनी, सुनी
ताल बेताल के,
और साज होगा जाज,
तारतम्यता लुप्त,
तौहीन साहित्य का,
सुप्तावस्था भी नयन फोड़,
खड़ी हो जाती है।

उन पुरीने गीतों की,
उनके लय की,
मधुरता और प्रवाह,
मानसिक शांति देती है,
और तन मन को तनाव मुक्त कर,
शवासन प्रदान करती है।
और आज ?
शायद मरघट पर,
आज के गीत बजाए जाएँ तो,
मुद भी खड़े होकर नाचने लगेंगे।
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