शोभित
मैडम,
गुड मॉर्निंग,
मैडम ने पीछे मुड़कर देखा तो एक 65-70 साल का बूढ़ा हाथ जोड़े खड़ा था।
“मैंने पहचाना नहीं।“
मैडम के चेहरे पर शिकन देखकर उसने कहा - मैडम, मैं शोभित। आप हमें स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाती थीं।
संबलपुर के ओड़िया स्कूल में। शायद 1965-66 की बात होगी।
मैडम को फिर भी कुछ याद नहीं आया । शोभित फिर कहने लगा - मैडम संबलपुर, ओड़िया स्कूल में गीता, शारदा, रामू, नारायण - हम सब पाँचवीं में थे। आपकी शादी होने वाली थी इसलिए आपने पढ़ाना छोड़ दिया था। रेलवे लाइन के उस पार आपके मकान में फोटो भी खींचा था, सब का। अभी भी है मेरे पास।
मैडम सहमते हुए बोली बेटा याद नहीं आ रहा है। तुम पाँचवीं की बात कर रहे हो और तुम खुद भी बूढ़े हो गए हो। कितनी पुरानी बात है। फोटो है तो भेजना, शायद कुछ याद आ जाए।
फिर मोबाइल नंबरों का आदान-प्रदान कर वे अपनी अपनी राह चल पड़े।
घर आकर शोभित पुराने एल्बम खोजने में लग गया। बीबी-बच्चे समझ ही नहीं पा रहे थे कि शोभित को हो क्या गया है ? काफी मशक्कत के बाद शोभित के हाथ वह एल्बम लग ही गया जिसमें मैडम और उनके घर मे सारे बच्चों की तस्वीर थी। उसने तुरंत अपने मोबाइल से दोनों तस्वीरें खींच कर मेडम को वाट्स एप पर भेज दिया । साथ में नीचे एक संदेश में बच्चों के नाम चित्र के क्रमानुसार लिख दिए।
देर रात फुर्सत पाकर मैडम ने जब तस्वीर देखी तो उन्हें याद आ गया अपना पुराना मकान और उस तस्वीर की कहानी। रात ही उन्होंने शोभित को एक वाइस मेसेज से इसकी सूचना दी और कहा कल सुबह बात करते हैं।
दोनों को उस सुबह का इंतजार था।
सुबह नाश्ते से बाद मैडम ने शोभित को फोन किया। फोटो पर अपनी राय देते हुए यादगार पलों को साझा किया। शोभित को पता चल गया कि मैडम अब उसे पहचान रहीं हैं और उन बीते दिनों को याद कर पा रही हैं।
फिर दोनों में मिलने की ललक जागी। एक दिन समय लेकर शोभित मैडम के घर पहुँच गया। बहुत सारी बातें हुई, बीते दिनों की, पुराने टीचर्स और साथ पढ़े बच्चों को याद किया। कुछ के फोन नंबर भी लिए दिए गए। कुछ को काल करके दोनों ने बात भी किया। शोभित को अपना बचपन याद आ गया।
अपने बचपन की शिक्षिका से मिलन पर शोभित बहुत खुश था। उसके दिमाग में यही चल रही थी कि इस बंधन को पुनः मजबूत कैसे किया जाए। तरह-तरह के विचारों के बीच कुछ दिन बाद उसे सूझा कि क्यों ना एक पुस्तक मैडम को अंकित किया जाए। यह बाजार से खरीदकर भेंट देने की बात नहीं थी।
वक्त के साध चलते-चलते शोभित पहले पढ़ाई, फिर नौकरी पूरी करने के बाद, अपनी रचनाओं को पुस्तक रूप में प्रकाशित करने लगा था। कविता तो वह 13 वर्ष की उम्र से ही करता था, पर उससे पहले ही मैडम से बिछुड़ चुका था इसलिए मेडम को इसकी जानकारी नहीं थी।
अब तक शोभित की कुल छः पुस्तकें छप चुकी थीं और सातवीं छपने के लिए तैयार थी। उसमें हिंदी भाषा सीखने-सिखाने के कुछ लेख थे। शोभित को लगा कि क्यों न यही पुस्तक मैं मैडम को समर्पित कर दूँ। किंतु समर्पित करना हो तो इस आशय का जिक्र तो पुस्तक की भूमिका में आनी चाहिए और इसके लिए मैडम की स्वीकृति भी चाहिए।
कुछ दिनों बाद मैडम से फोन पर बात करते-करते उसने मैडम से पुस्तक समर्पित करने की मंशा जाहिर किया। मैडम ने बिना किसी प्रतिवाद के स्वीकृति दिया। फिर शोभित ने पुस्तक की भूमिका लिखते समय इसका उल्लेख भी किया।
कुछ समय में पुस्तक प्रकाशित हो गई थी। अब मैडम से बात करके उन्हें समर्पित करने जाना था।
जब शोभित ने इस बारे में मैडम से बात किया कि किस दिन किस समय उनके घर पुस्तक समर्पित करने आया जा सकता है ?
जवाब मिला कभी भी आ सकते हो, पर पहले फोन कर लेना क्योंकि आए दिन मेरे क्लासेस और लेक्चर होते हैं। ऐसा न हो कि तुम आओ और मैं न मिलूँ। शोभित ने हामी भरी और फोन रख दिया।
जब पुस्तक की कापियाँ शोभित को मिली, तब उसे यह भी जानकारी मिली कि गुरुपूर्णिमा नजदीक ही है। उसने गुरुपूर्णिमा के दिन मैडम के घर जाकर पुस्तक समर्पित करने का सोचा और इसीलिए मैडम के फुरसत के वक्त उन्हें फोन किया। मैडम से बात हुई। उन्होंने शोभित को सुझाया कि गुरुपूर्णिमा के दिन तुम्हारे घर के पास ही एक समारोह है गुरु पूर्णिमा के ही उपलक्ष्य में। वे चाह रही थीं कि यदि ऐतराज न हो तो शेभित उसी समारोह में आ जाए और समर्पण का काम भी वहीं कर लिया जाए । यदि नापसंद हो तो शाम को समय वह घर पर भी आ सकता है।
शोभित को यह बात अच्छी लगी। उसने सोचा समारोह में और भी लोग होंगे। उसे लगा कि आगंतुक श्रोताओं को भी पुस्तक की जानकारी मिल जाएगी और पुस्तक ज्यादा लोगों तक पहुँचेगी। यह सोचकर उसने मैडम के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। मैडम ने कहा - "तो ठीक है, मैं एक दो दिन पहले तुम्हें सही जगह और समय बता दूंगी।"
दो दिन पहले मैडम ने जगह और समय की सूचना दी और कहा कि इस सम्मेलन के बाद वहीं तुम अपना समर्पण का कार्यक्रम कर लेना। इस पर सहमति हो गई। मैडम ने प्रबंधक- संचालकों से भी बात कर लिया। सही दिन शेभित बताए जगह पहुँच गया। उसने पुस्तक की 5-6 प्रतियाँ साथ ले लिया था।
कार्यक्रम शुरु हुआ तो विद्वज्जन गुरुओं के बारे में बताने लगे। कुछ ने श्रेष्ठ गुरुओं के कुछ प्रसंग भी बताया । किसी ने गुरु महिमा के गीत गाए तो किसी ने वेद अंश का पाठ किया।
इसी बीच संचालक महोदय ने शोभित का परिचय देते हुए उसे स्टेज पर आमंत्रित किया कि वह इस अवसर पर गुरु के बारे में कुछ कहे।
शोभित को पता ही नहीं था कि उसे ऐसा कोई भाषण देना है। उसे बताया भी नहीं गया था। वह इसके लिए तैयार भी नहीं था। पर अब तो नाम भी पुकारा जा चुका था। वह मना करके माहौल बिगाड़ना भी नहीं चाहता था। उसे अभी मैडम को अपनी पुस्तक भी समर्पित करना था। किंकर्तव्यविमूढ़, मरता क्या न करता, वह स्टेज पर जा पहुँचा और गुरुओं के बारे में कुछ-कुछ बोलता गया। विशेष बात यह थी कि उसने बताया कि गुरु शब्द में गु – अंधकार के लिए है और रु प्रकाश के लिए। इसलिए गुरु का अर्थ हुआ – अज्ञानता के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश तक ले जाने वाला। साथ उसने यह भी कहा कि गुरु का अर्थ है बड़ा - किसी भी क्षेत्र में। जरूरी नहीं कि उम्र में ही बड़ा हो। एक विधा में बड़ा होने पर भी वह दूसरी विधा में छोटा हो सकता है। वैसे हर व्यक्ति, हर दूसरे से कुछ न कुछ सीख सकता है और अकसर सीखता भी है। इसलिए इस जगत में सब गुरु भी हैं और शिष्य भी। ऐसा भी होता है कि कोई किसी के लिए गुरु हो पर दूसरे का शिष्य। लेकिन प्रचलन है कि विशेष तरह से किसी से नियमित शिक्षा पाने पर ही हम उन्हें गुरु कहते हैं। सारा माहौल तालियों की गड़गड़हट से गूंज उठा।
जैसे ही शोभित अपनी बात पूरी करके स्टेज से हटा, आयोजकों ने सुझाया - "आप अपनी पुस्तक का विमोचन समर्पण का कार्यक्रम अभी कर लें"। समर्पण तो ठीक पर विमोचन का कोई प्रस्ताव तो था ही नहीं।
शोभित ने सबसे पहले अपना संक्षिप्त परिचय दिया और बताया कि कब और कैसे मैडम से संपर्क हुआ, कब उनसे पढ़ा। फिर कब कैसे मिले। फिर अपनी रचनावली का संक्षिप्त परिचय कराते हुए मैडम के हाथ में एक पुस्तक दिया और झुक कर चरणस्पर्श किया।
मैडम को पुस्तक देकर प्रणाम करने के बाद शोभित ने मंच पर विराजमान मैडम के अन्य वरिष्ठ गुरुओं को भी प्रणाम करते हुए पुस्तक कि एक - एक प्रति समर्पित किया।
इसके पूरे होते ही वरिष्ठतम गुरुजी खड़े होकर, शोभित द्वारा गुरु - शिष्य परंपरा के मनस्फूर्त निर्वाह पर अभिभूत होते हुए बोले - आज के इस नए जमाने में करीब 55 (से ऊपर के) वर्षों के अंतराल के बाद अपने गुरु को खोज निकालना और 5-6 पुस्तक की रचना करने के बाद भी बेझिझक सरेआम ऐसी सभा में निस्संकोच पादाभिवंदन एक आदरणीय गुण है। यह कहते हुए वे शोभित की तरफ झुके। शोभित असमंजस मैं पड़ गया कि यह क्या हो रहा है?
शोभित ने देखा कि गुरुजी उसे प्रणाम करने दी दिशा में बढ़ रहे हैं। उसने गुरुजी को बोलकर - पकड़कर रोका किंतु वे तैयार ही नहीं थे। अंततः जब किसी तरह उन्हें रोककर पूछा गया कि वह यह क्या कर रहे हैं? तब उन्होंने सुसंयत मन से उत्तर दिया कि मैं शारीरिक शोभित को नहीं उनकी गुरुभक्ति, गुरु-श्रद्धा व गुरु के प्रति समर्पण भाव को प्रणाम करता हूँ।
मंच पर आसीन सभी ने, सभी आगंतुकों और गुरु पूर्णिमा का उत्सव मनाने आए सभी गुरुभक्तों ने अनुमोदन स्वरूप करतल ध्वनि से गुरुवर का स्वागत किया।
तत्पश्चात गुरुवर ने शोभित को फिर से मंच पर बुलाया , बिठाया और सारे मंचासीनों को अपने पास की शोभित की पुस्तक को प्रदर्शित करने को कहकर एक परिचित को तस्वीर खींचने को कहा।
फिर गुरुवर ने शोभित व पुस्तक के बारे में कुछ प्रशंसनीय शब्द कहे और पुस्तक विमोचन संपन्न किया। आगंतुक शोभित की तरफ बढ़ने लगे। कुछ लोगों ने पुस्तक खरीदना चाहा। शोभित के पास जितने बचे थे, वह उसने दे दिए और अन्यों से निवेदन किया कि वे या तो उसके घर से ले लें या पता भेजें तो पुस्तक डाक से भेज दी जाएगी।
अंत में सभी ने आयोजित भोजन का आनंद लिया। सभी सभासद शोभित की भूरी प्रशंसा करते हुए अपने अपने गंतव्य को चल पडे।
उसदिन शोभित और मैडम अति प्रसन्न थे। शोभित इसलिए कि वह अपनी पुस्तक मैडम को समर्पित कर सका, वह भी इस सभा में और मैडम इसलिए भी खुश थीं कि शोभित के आने से सभा में रौनक हो गई थी। उससे पुराने शिष्य से संबंध भी पुनः मजबूत हो रहे थे।
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